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वो अजन्‍मी मां थी....





22  सितम्बर 2025 , दैनिक भास्कर- मानव जाति खतरे में, दैनिक जागरण- स्त्री संख्या शून्य की ओर, हिंदुस्तान टाइम्स - अब नही मिलेंगी दुल्हनें... 
जी हाँ, चौंकिए मत, मैं कोई समाचार वाचन का अभिनय करने के लिए आपके सामने उपस्थित नहीं हुआ हूँ. और ना ही यह सब किसी नाटक की लिखित पंक्तियाँ... यह सब भविष्य है हमारे इस वर्तमान का... जिस गति से हमारा वर्तमान चल रहा है, क्या आप सबको नहीं लगता कि हम सबको निकट भविष्य में ऐसा ही कुछ पढने देखने को मिलेगा.  
आंकड़े कुछ ऐसा ही कहते हैं.. पिछले कुछ वर्षों में जिस गति से कन्या भ्रूण हत्याओं के मामले बढे हैं, उसका भविष्य तो ऐसे ही किसी समाचार में सिमटा हुआ लगता है. संयुक्त राष्ट्र संघ के एक सर्वक्षण के अनुसार पिछले बीस वर्षों में हिंदुस्तान में 1 करोंड़ से अधिक कन्याओं की भ्रूण में ही हत्या कर दी गयी है. यानि औसतन हर साल पांच लाख कन्या भ्रूण  हत्याएं. 
आंकड़े बताते हैं कि 1981  में  भारत में लिंग अनुपात  प्रति हज़ार पुरुषों पर 960 लड़कियों का था, जो 1991 में 945  तथा 2001 की जनगणना में 927 हो गया. इसमें हरियाणा और पंजाब की स्थिति और भी अधिक शोचनीय है. हरियाणा में यह दर 860 तथा पंजाब के कुछ हिस्सों में तो 780 तक पहुँच गयी है. यह भी कहा जा सकता है कि हरियाणा पंजाब के हाथ लड़कियों के खून से रंगे हैं. 
अस्सी के दशक में जब भ्रूण में पल रहे शिशु के स्वास्थ्य को जान सकने और संभावित बिमारियों को दूर करने का तरीका इजाद हुआ था, उस वक़्त यह  तकनीक एक क्रांतिकारी लहर बन कर उभरी थी. लेकिन किसको पता था कि खाली दिमाग शैतान का घर.... जिस ब्लेड का अविष्कार दाढ़ी बनाने के लिए किया गया, उसका इस्तेमाल लोगों की जेबें तराशने में किया जाने लगा.. ऐसी ही परिणति इस क्रांति की भी हुई. इस खोज के साथ ही माता-पिता के लिए गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग पता करना और कन्या होने कि स्थिति में उसे मार डालना और भी आसान हो गया. आज लगभग 22000 ऐसे केंद्र अस्तित्व में हैं जहाँ इस प्रकार की जाँच तथा सुविधा उपलब्ध है. 30000  से अधिक डॉ. पैसे के लालच में इस पेशे से जुड़े हुए हैं. जान बचाने वाला डॉ. आज एक हत्यारे से अधिक कुछ भी नहीं रहा. धरती पर भगवान् का रूप माने जाने वाले माता-पिता अपने ही अंश को धरती पर आने से पहले महज इसलिए मार डालते हैं कि वह एक लड़की है. 
तिस पर भी  हम बड़ी-बड़ी महिला सशक्तिकरण की बातें करते हैं.. लम्बे-लम्बे भाषण स्त्रियों की मुक्ति और शक्ति के लिए देते हैं. जिस वक्त हम किसी वातानुकूलित से भव्य पंडाल में स्त्री मुक्ति के खोखले दावों के लिए चिल्ला रहे होते हैं... ठीक उसी वक़्त किसी अस्पताल के एक वातानुकूलित से कक्ष में एक भ्रूण को महज इसलिए गर्भ और इस दुनिया से मुक्त किया जा रहा होता है क्यूंकि वह एक कन्या है. ...  आज महिलाएं पुरुषों के कंधे से कन्धा मिलाकर चल रही हैं, लड़कियां हर क्षेत्र में तरक्की कर रही हैं.. आगे बढ़ रही हैं.. मैं कहता  हूँ, यह स्वीकारता हूँ कि लड़कियां आगे हैं... आगे रहेंगी... लेकिन लेकिन स्‍वयं से मेंरा जो प्रश्‍न है वह यही है कि क्या आगे लड़कियां रहेंगी????
जिस गति से आज हमारे समाज में कन्या भ्रूण हत्या के मामले बढ़ रहे हैं... शायद तो आगे लड़कियां नहीं ही रहेंगी.. और  जैसा  कि हम सबको समझाया  जाता  है कि समाज स्त्री  पुरुष  के मेल से ही संभव है. दुनिया की गाड़ी स्त्री पुरुष नाम के दोनों पहियों के संतुलन से ही चलता है.. क्या एक पहिये पर यह समाज चल पायेगा.. 
विज्ञान सब कुछ तो बना सकता है.. लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि विज्ञानं माँ नहीं बना सकता... आज की बेटी ही कल की माँ होगी.. 
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Amit Tiwari
News Editor
Nirman Samvad

हर व्यक्ति चरित्रहीन है...


आज कुछ पुराने गाने सुन रहा था. तभी एक गाना चल पड़ा 'पानी रे पानी तेरा रंग कैसा..' बहुत तारीफ किया करते हैं लोग इस गाने की. सालों पहले से सुनता रहा हूँ कि पानी जैसा होना चाहिए. जिस में मिला दो उसी के जैसा हो जाता है. पहले समझ नहीं आता था, लेकिन जब से समझ आने लगा है मेरे मन ने कभी इस गाने को स्वीकार नहीं किया. 
आज फिर इसे सुनकर वही प्रश्न मन में आ गया. क्या मनुष्य का चरित्र, उसका व्यवहार पानी जैसा होना चाहिए? जिसमें मिले उसी के जैसा हो जाए!! 
कोई हमसे प्रेम से बोला और हम प्रेम से बोल पड़े... कोई नफरत से बोला तो नफरत कर बैठे... किसी ने गाली दी तो गाली देने लगे... 
आखिर हमारा अपना चरित्र क्या है?? हमारा अपना कोई व्यवहार भी है या नहीं? पानी जैसा कैसे बना जा सकता है?? पानी तो चरित्रहीन है... और यही कारण है कि अगर पानी एक बार कीचड़ में मिल जाए तो फिर कीचड़ ही हो जाता है... बल्कि इतना ही नहीं... पानी तो सूखी मिट्टी में मिलकर उसे कीचड़ में बदल देता है... तब फिर भला पानी जैसा होने की बात भी कैसे कही जा सकती है??
लेकिन आज कुछ ऐसा ही है... हर व्यक्ति पानी जैसा ही होता जा रहा है... अगर चरित्र और चरित्रहीनता को संकीर्ण अर्थ में ना लिया जाए तो यह कहा जा सकता है कि हर व्यक्ति चरित्रहीन हो गया है... किसी के पास अपनी कोई पहचान, अपना कोई चरित्र नहीं है... हर व्यक्ति जीवन में बहुत से रूप और बहुत सी भूमिकाओं में जीता है... और आश्चर्य कि हर रूप में उसके चरित्र का मूलभूत गुण बदल जाता है... एक भाई के रूप में हम यह तो नहीं बर्दाश्त कर पाते हैं कि कोई हमारी बहन को गलत नज़र से देखे... लेकिन दूसरे ही पल हम खुद ऐसे लोगों में शामिल हो चुके होते हैं जो किसी को घूर रहा हो... बहन की ससुराल में गए हुए भाई का चरित्र घर में अपनी पत्नी के लिए वैसा नहीं रहता... कोई 'माँ' की गाली दे तो हम गुस्से में उसे भी वही सब सुनाने लगते हैं...  
सबसे बड़ा खेद का विषय है कि समाज जिनको बुरा कहता है, ऐसे बुरे लोगों का तो एक चरित्र होता है... लेकिन अच्छाई का कोई चरित्र नहीं मिलता... 
सोचता हूँ कि आखिर हम सब के हिसाब से, सबके व्यवहार के अनुसार बदल जाते हैं तो फिर ऐसा क्यों नहीं हो कि हमारा चरित्र निश्चित हो और हमारे संपर्क में आने वाला बदले खुद को... या कि ठीक है जो जैसा है वैसा व्यवहार करे... 
क्या हम कभी भी स्वयं का कोई सकारात्मक गुण बता सकते हैं... हमारी तो अच्छाइयां भी निषेध के शब्दों के बिना नहीं रह सकती हैं... कोई अगर अच्छा है तो बस इतना कि वह बुरा नहीं है... यह तो कह सकते हैं कि हम झूठ नहीं बोलते... लेकिन यह कहने का साहस नहीं है कि हम सच बोलते हैं... हर अच्छाई मौकाविहीन ब्रह्मचर्य जैसी है... ब्रह्मचारी हैं क्यूंकि मौका नहीं मिला... 
फूल के जैसा क्यों नहीं बना जा सकता है... कोई भी, किसी भी मानसिकता के साथ जाए, फूल अपनी सुगंध ही देता है सबको... 
आखिर बुद्ध भी तो हैं एक उदाहरण... गाली देने वाले को भी प्रेम से ही जवाब दिया... पत्थर मारने वाले पर भी स्नेह ही बरसाया... 
कुछ न कुछ तो बन जाने का प्रयास हर ओर है ही... क्यों ना हमारी दौड़ बुद्ध की ओर हो जाए... 
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