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यमुना तीरे कृष्ण (Shree Krishna)




जन्‍माष्‍टमी आ गई... जन्‍माष्‍टमी यानी कन्हैया का जन्मदिवस....वैसे जन्मदिवस नहीं...बल्कि अवतरण दिवस...कन्हैया अवतरित हुए थे...और तभी से लीलाएं करने लगे....तरह-तरह की...
हर किसी के मन को लुभा लेने वाली चंचलता। ऐसा बालसुलभ नटखटपन कि बड़े-बड़े ज्ञानी को भी मोह हो जाए। एक अद्भुत और अद्वितीय चरित्र.. ऐसा कि जो जितना जाने उतना ही उलझता जाए।
कृष्ण का पूरा जीवन ही एक सन्देश है। हर घटना एक अध्याय है जीवन को जीने की कला सीखने के लिए।
सोच रहा हूँ कि कृष्ण आखिर बांसुरी ही क्यों बजाते हैं? बीन क्यों नहीं?
और अगर कृष्ण बीन बजाते तो क्या होता?
कृष्ण बांसुरी बजाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि बांसुरी बजाने से गाय और गोपियाँ निकलेंगी। बांसुरी की मधुर तान से प्रेम-रस छलकेगा चारों ओर। बांसुरी बजाने से प्रेम में बंधे हुए जन, जीवन के आह्लाद का आनंद लेंगे।
कृष्ण को पता है कि बीन बजाने से सांप निकलता है और फिर उस बीन में ये शक्ति भी नहीं कि वह उस सांप को फिर से बिल में भेज सके। कृष्ण की बांसुरी तो सबको अपने ही रंग में नचाती है।
इन सब बातों के बाद भी आज मुझे दुःख है....
मुझे दुःख है कि आज कन्हैया का जन्म-दिन है...
ये दुःख इसलिए नहीं कि कन्हैया से मुझे कोई नाराजगी है....बल्कि ये दुःख तो मुझे कान्हा की यमुना को देखकर हो रहा है...
मुझे दुःख हो रहा है ये सोचकर कि अब मेरे कन्हैया किस कदम्ब की छाँव में बैठकर बांसुरी बजायेंगे??
मैं दुखी हूँ ये सोचकर कि कान्हा किस यमुना के तीर पर अपनी गायें चरायेंगे...?
सोच रहा हूँ कि हम यमुना-पार वाले क्या जवाब देंगे कान्हा को, जब वो पूछेंगे अपनी यमुना के बारे में।
क्या होगा जब कन्हैया अपनी कदम्ब की छाँव खोजने निकलेंगे?
हमने क्या कर दिया है ये सब....? यमुना के तीर पर, जहाँ कदम्ब होते थे...वहां कंक्रीट के जंगल खड़े किये जा रहे हैं...
यमुना किनारे मंदिर-मस्जिद की जंग तो है...लेकिन कान्हा की चर्चा ही नहीं..!!
यमुना-बैंक पर मेट्रो तो है....लेकिन यमुना नहीं....!!
क्या कन्हैया को भी अब मुंह पर रुमाल रखकर पुल के ऊपर से ही यमुना को देखना पड़ेगा?
या फिर उन्हें भी हम मेट्रो में बिठाकर ही यमुना-दर्शन का आनंद देना चाहते हैं?
बड़े-बड़े मठाधीश मिलकर यमुना की छाती पर भव्य मंदिर तो बना गए...लेकिन यमुना-तीर पर कन्हैया के बैठने के लिए एक कदम्ब की भी चिंता नहीं थी उन्हें..अरे भाई मेरे कन्हैया ने कब किसी मंदिर में बैठकर बंसी बजाई थी.!!! वो तो बस यमुना-तीरे घुमा करते थे, बिना मुंह पर रुमाल लगाये ओर बिना मेट्रो में बैठे,,,
लेकिन आज यमुना नदी से नाले में तब्दील हो रही है...और सब जन्माष्टमी की तैयारी में लगे हैं...
जन्‍माष्‍टमी पर मंदिरों में जाकर कन्हैया को माखन का भोग लगाने से कहीं ज्यादा बेहतर है कि हम उनकी यमुना को फिर से उनके खेलने लायक बना दें....यमुना-तीरे, कंक्रीट के जंगल नहीं....कदम्ब के पेड़ हों...और उनके नीचे बैठकर 'कन्‍हैया' फिर से सबके 'मन को मोह' लेने वाली बंसी बजाएं...

- अमित तिवारी 
दैनिक जागरण 

गगन जैसी बहन मेरी (Sister Vs Sky)




लिखना बहन पर
या लिखना गगन पर
दोनों ही मुश्किल है...
गगन नीला है क्‍यों?
क्‍यों उसके हाथ चंदन?
गगन का छोर क्‍या है?
क्‍यों उसके शब्‍द वंदन?
वो ऐसा है तो क्‍यों है ?
ये ऐसी है तो क्‍यों है?
गगन सब देखता है!
बहन सब जानती है!
गगन बन छत्र छाए!
बहन आंसू सुखाए!
गगन में चांद तारे!
उस आंचल में सितारे!
ना उसका अंत कोई!
ना इसका छोर कोई!
धरा पर ज्‍यों गगन है!
बस ऐसे ही बहन है!

- अमित तिवारी
दैनिक जागरण

टेलीफोनिक ब्रेकअप (Telephonic braekup)



तन्‍मय का फोन उठाते ही सौम्‍या चिल्‍लाई, 'तू पागल है क्‍या... अकल है कि नहीं...'
तन्‍मय ने चौंकते हुए पूछा, 'क्‍यू... अब क्‍या हुआ?'
सौम्‍या, 'क्‍या हुआ क्‍या... तेरी वजह से कितना बवाल हुआ आज। जब मन करे मुंह उठाकर फोन मिला देता है। कोई टाइम भी तो होना चाहिए...'
तन्‍मय, 'लेकिन हुआ क्‍या? कुछ बता तो।'
सौम्‍या ने बिफरते हुए कहा, 'कुछ नहीं हुआ... जब देखो तब तेरा फोन... भाई ने कितना सुनाया आज... मुझे फोन मत करियो अब कभी जब तक मैं ना करूं... समझा?'
तन्‍मय ने उदासी से कहा, 'समझा तो नहीं... लेकिन कर भी क्‍या सकता हूं...'
सौम्‍या ने खीझते हुए कहा, 'नहीं समझेगा तो नंबर बदल दूंगी। फिर मिलाता रहियो।'
तन्‍मय हुंकारी भरकर चुप हो गया। सौम्‍या ने फोन काट दिया।
कुछ दिन पहले ही सौम्‍या ने कहा था, 'तू मेरा इंतजार ना किया कर। मेरे इंतजार में रहेगा तो कभी बात नहीं होगी... बहुत बिजी हूं मैं। तू खुद ही कर लिया कर फोन।'
फिलहाल तन्‍मय अपने लेटेस्‍ट टेलीफोनिक ब्रेकअप के सदमे में है। सौम्‍या का पता नहीं... अभी तो दो ही दिन हुए हैं। वैसे भी सौम्‍या कहती है कि उसे तो हफ्ते भर किसी की याद नहीं आती।

- अमित तिवारी
दैनिक जागरण


पागल वाला प्यार (mad love)




'क्या यार... तू हमेशा ये लव यू, लव यू ना कहा कर। कोफ्त होने लगती है', सौम्या ने कहा।
तन्मय, 'तुझसे तो मेरा प्यार भी नहीं पचता..., मैं क्या करूं।'
सौम्या, 'मुझसे नहीं झेला जाता इतना प्यार-व्यार किसी का भी। और तू भी ना इतना प्यार मत किया कर मुझसे। किसी दिन गुस्सा आ गया तो छोड़ दूंगी तुझे भी। फिर रोता रहियो अपना प्यार लेके।'
तन्मय, 'हां, तुझे क्या फर्क पड़ता है। लेकिन मैं क्या करूं, मुझे तोे तेरे गुस्से पर भी प्यार ही आता है।' 
सौम्या, 'ओह... डायलॉग...'
तन्मय, 'डॉयलॉग नहीं यार... सच में। तुझे बहुत प्यार करता हूं। तेरे-मेरे रिश्ते में, मेरे पास है भी क्या? गुस्सा, चा‍हत, जरूरत, इच्छा... सब तेरे ही तो हैं... मेरे पास बस मेरा ये प्यार ही तो है। जब नहीं रहूंगा पास, तब तुझे याद आएगी। और मैं तो ये भी नहीं कह सकता कि तुझे छोड़ जाउंगा। मेरे बस का तो ये भी नहीं है। फैसला करने का तो अधिकार तेरे पास है।'
सौम्या, 'चल पागल... इमोशनल ना हो...। बाद में बात करती हूं।'
सौम्या ने खिलखिलाहट के साथ फोन काट दिया।
तन्मय अब भी अपने पागलपन पर हंस रहा है।

- अमित तिवारी
दैनिक जागरण 

नहीं मंजूर है तुझे खोना (never like to miss you)



तेरा चेहरा, तेरी आंखें
तेरे होठों की चहक।
तेरा हंसना तेरा गाना
तेरे कंगने की खनक।।

तेरे पैरों की महावर
तेरे बिछुए तेरी पायल।
तेरे बालों का वो गजरा
तेरी मेंहदी से दिल घायल।।

तेरे फूलों से लब खिलना
तेरे छूने की वो नरमी।
दुखों के सर्द मौसम में
तेरी सांसों की वो गरमी।।

तेरी बातें तेरा हंसना
तेरा दिखना तेरा होना।
मुझे मंजूर है सब कुछ
नहीं मंजूर है खोना।।

- अमित तिवारी
सीनियर सब-एडिटर
दैनिक जागरण

लड़की जैसी लड़की (Girl like a Girl)



'तन्‍मय, तू कुछ बोल क्‍यों नहीं रहा यार?' सौम्‍या ने झुंझलाते हुए कहा। तन्‍मय अब भी चुप था। 'तू आखिर मुझसे शादी क्‍यों नहीं करना चाहता? तू ही तो कहता है कि तू मुझसे बहुत प्‍यार करता है। मैं बहुत अच्‍छी हूं। तब आखिर हम शादी क्‍यों नहीं कर सकते?' कहते-कहते सौम्‍या रुआंसी हो गई। तन्‍मय, 'यार.... तू समझती क्‍यों नहीं? यू आर नॉट अ वाइफ मैटेरियल... अंडरस्‍टैंड दिस।'
सौम्‍या, 'मतलब... तू कहना क्‍या चाहता है?'
तन्‍मय, ' मैं सीधा ही तो बोल रहा हूं यार... तू अच्‍छी फ्रेंड है मेरी... मैं प्‍यार करता हूं तुझसे, लेकिन यू नो... तेरे अंदर वाइफ वाला मैटेरियल नहीं है। वो कहते हैं ना कि तुझमे वो लड़कियों वाली बात नहीं है।' तन्‍मय कहता रहा, 'वो... बस में सफर करते टाइम रुमाल से कभी होंठ, कभी माथे का पसीना पोंछना, शर्माना, पति का खाने पर इंतजार करना, साड़ी पहनकर इतराना... एंड सो ऑन...आई थिंक तू समझ रही है सौमी...'
तन्‍मय अपनी बात पूरी करके आइसक्रीम लेने चला गया था और सौम्‍या अब भी उसकी बातों का मतलब समझने की कोशिश कर रही थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ये वहीं तन्‍मय है जिसने एक दिन सौम्‍या को रोता देखकर कहा था, 'क्‍या यार सौमी... तू ये लड़कियों की तरह रोया ना कर। यू नो तेरी सबसे अच्‍छी बात कौन सी है... तू और लड़कियों जैसी नहीं है... वो बेवजह रोना-धोना, इमोशनली ब्‍लैकमेल करना लड़कों को... यू आर डिफरेंट... और इसीलिए तो मैं तुझसे इतना प्‍यार करता हूं।' गर्लफ्रेंड और वाइफ का फर्क उसे अब समझ आने लगा था।

- अमित तिवारी
दैनिक जागरण 

खामोशी का अर्थ नहीं हम उनको भूल गए (Can't Forget)



खामोशी का अर्थ नहीं,
हम उनको भूल गए..
उन्होंने कैसे सोच लिया,
कि बागों से फूल गए..

कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं,
जो टूट नहीं सकते...
कुछ दामन ऐसे होते हैं,
जो छूट नहीं सकते..

कुछ लम्हे ऐसे होते हैं,
जो जीवन बन जाते हैं...
कुछ पल ऐसे हैं, जिनको
ये पल लूट नहीं सकते..

कुछ नजरें ऐसी होती हैं,
जो नजरों में उतर जाती हैं..
कभी-कभी कुछ बातें
दिल में, घर कर जाती हैं..

कभी किसी का आना भी,
तनहा कर जाता है..
कभी किसी की यादें दिल
में खुशियाँ भर जाती हैं...

ब्याज तो हर इक रिश्ते
का हम चुकता कर आये...
लेकिन शायद लगता है
हम बिन मूल गए..

खामोशी का अर्थ नहीं,
हम उनको भूल गए..

- अमित तिवारी
दैनिक जागरण

तुम ही तो हो (Priytama)



कभी तुमसे कहा तो नहीं,
कि तुम ही मेरा जीवन हो।
मेरी खुशियों की तुलसी का,
एक तुम ही तो आँगन हो।।
तुम्हें पाना है जग पाना,
तुम्हारा प्यार धड़कन है।
इसी में बंध के जीना है,
ये वो प्यारा सा बन्धन है।।
नहीं दुख सुख की बातें हैं,
कि जो है प्यार ही तो है।
तुम्हारी बांह में सिमटा,
मेरा संसार ही तो है।।
तुम्हारा हूँ तो खुद का हूँ,
तुम्ही से आस पलती है।
लो मैने कह दिया तुमसे,
तुम्ही से सांस चलती है।।

- अमित तिवारी
सीनियर सब एडिटर
दैनिक जागरण

क्योंकि वो निर्भया नहीं हैं (They are not nirbhaya)



आबरू की कीमत भी हर जगह बराबर नहीं होती. उसमें भी नफा-नुकसान का अलग-अलग गणित लगाया जाता है. यही वजह है कि मोमबत्तियां लेकर कोई जुलूस आगे नहीं बढ़ रहा है. जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे भी नहीं लगाये जा रहे हैं. मीडिया के पास भी ये सब दिखाने का वक़्त नहीं है. सोफेस्टिकेटेड यूथ के पास इनके समर्थन के लिये मोमबत्तियां जलाने का वक़्त नहीं है. क्योंकि ये सब निर्भया नहीं हैं.
ये उन दलित लड़कियों की दास्तान है, जिनके साथ कुछ गलत होना हमें झकझोरता नहीं है. म्हारा देस हरियाणा के नारे लगाने और खुद को बेहद हिम्मती बताने वाले लोगों की इस कायराना हरकत पर बोलने की हिम्मत किसी में नहीं हो रही है. हिसार में दलित परिवार की लड़कियों का बलात्कार कोई घटना नहीं है. उनकी आवाज को दबाने की कोशिश और उनके परिवार वालों की प्रताड़ना कोई खबर नहीं है. पीड़ित लड़कियां दिल्ली में अपने लिये न्याय मांग रही हैं. और मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं है कि उन्हे कभी कोई न्याय मिलेगा. न्याय उनके लिये  और वो न्याय के लिये बनी ही नहीं हैं. क्योंकि ये सब निर्भया नही हैं.

 - अमित तिवारी
सीनियर सब एडिटर
दैनिक जागरण
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