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बौखलाया विपक्ष कहीं बिहार को बीहड़ ना बना दे (Mandate-less opposition also may be harmful for Bihar)






बिहार के चुनाव परिणाम कई मायने में अलग रहे हैं. पहली बार विकास के नाम परिणाम आया लगता है. भाजपा, जिसमे एक मुर्दनी सी छाई थी पिछले काफी अरसे से, उसमे नयी जान आ गयी, तो वहीँ बाकी दलों में मुर्दनी छा गयी.
कांग्रेस के जनाजे को उठाने के लिए तो चार कंधे मिल गए हैं, लेकिन दुःख तो मुझे पासवान के बारे में सोचकर हो रहा है. लोजपा की अर्थी उठाने के लिए तो चार कंधे भी नहीं मिल पाए. लोजपा का तो जनाजा भी तीन कंधो पे उठता दिख रहा है. लालू की लालटेन बिना तेल की हो गयी है. सूखी बत्ती जल रही है, कब बुझ जाए कुछ पता नही.
लेकिन फिलहाल बिहार एक गहरे संवैधानिक संकट में भी फंस गया है. किसी भी दल के पास विपक्षी दल बनने कि योग्यता नहीं बची है. नीतीश को इतनी अच्छी तरह भी नहीं जीतना चाहिए था. अब विपक्ष विहीन विधानसभा से बिहार किस दिशा में जायेगा?
नीतीश की इस भारी जीत ने स्वयं नीतीश के लिए संकट खड़े कर दिए हैं. यह जनादेश नीतीश से बहुत अधिक अपेक्षा को दर्शा रहा है. लालू या पासवान से किसी को उम्मीद थी भी नहीं. लालू जब सत्ता में थे तब भी उनसे बहुत अधिक उम्मीद नहीं थी किसी को. उनकी असफलता से किसी प्रकार से भी राजनीति की परिभाषा में कोई बदलाव नही आने वाला था, ना आया. कारण स्पष्ट है कि लालू का कद किसी परिभाषा को बनाने या बिगाड़ने के लायक था ही नही. लालू की असफलता भी उनकी नीजी असफलता ही बन कर रह गयी. लेकिन नीतीश के मामले में ऐसा नहीं है. नीतीश ने जनता से कहा था कि वो बिहार बना रहे हैं, और अगर जनता चाहती है कि ये काम चलता रहे तो उन्हें फिर से मौका मिलना चाहिए. जनता ने उनमे अपना भरोसा भी दिखा दिया है. और अब इस भरोसे में किसी भी तरह की चूक सिर्फ नीतीश ही नहीं पूरे बिहार और साथ साथ लोकतान्त्रिाक प्रक्रिया की असफलता के रूप में गिना जायेगा. अभी तक नीतीश ने जो भी विकास बिहार में किया था वह सब पूरी तरह से बाजार के हित में होने वाले विकास थे. निर्माण कार्यों को वास्तविक विकास नहीं कहा जा सकता है. यह विकास की प्रक्रिया का एक आवश्यक अंग आज के समय में भले ही है, लेकिन फिर भी सड़क और पुल निर्माण को वास्तविक विकास नहीं माना जा सकता है. नीतीश की इस दूसरी पारी में जनता को उनसे वास्तविक विकास की उम्मीद रहेगी. अब नीतीश से जिस विकास की अपेक्षा है वह बाजारोंमुख विकास नही है. बल्कि अब जिस विकास की उम्मीद उनसे है उसके होने से बाजार को कोई सीधा लाभ नहीं होगा. ऐसे में नीतीश के लिए यह एक गंभीर चुनौती हो जाएगी कि अगर बाजार उनके वास्तविक विकास में उनके साथ नही खड़ा हुआ तो वो क्या करेंगे. अब नीतीश को ऐसी किसी भी स्थिति से निपटने के लिए भी तैयार रहना होगा.
विपक्षविहीन सदन भी एक छुपा हुआ खतरा दिखा रहा है. अब विपक्ष बुरी तरह से बौखलाया हुआ है. और सबसे बुरी बात ये है कि उसके पास सदन में जगह नहीं है अपने विरोध को जाहिर करने के लिए. अब बहुत संभावना है कि यह बौखलाया हुआ विपक्ष अपने विरोध को सड़कों तक लेकर चला आये. और यह बात तो हर सामान्यजन जानता है कि जैसे ही घर की बातें घर की दीवारों को पार करके बाहर निकलती हैं, घोर अराजकता का जन्म होता है. बिहार की राजनीति में भी यही खतरा दिखाई दे रहा है. कहीं यह घबराया और लुटा-पिटा विपक्ष सदन के पटल पर रखे जाने वाले विरोध को सड़क पर ना ले आये. किसी भी सत्तापक्ष के लिए यह सबसे कठिन पल होता है. सदन और सड़क के विरोध के अंतर को समझना होगा.
इस बार के परिणाम में कुछ और भी बातें सोचने की हैं. इस बार के चुनाव में पहली बार बिहार में सभी वामपंथी दल एकजुट होकर लड़े थे और आश्चर्यजनक रूप से एक सीट पर सिमट गए. वामपंथी दलों की यह हार बहुत से प्रश्न खड़ा करती है. क्या नक्सल का खतरा समाप्त हो गया है? या फिर अब बौखलाए हुए नक्सली और भी उत्पात मचाएंगे? या कि नक्सल समर्थकों ने भी इस बार मिलकर इन सरकारी लाल झंडे वालों को सबक सिखाने के लिए नीतीश का समर्थन किया है.
और फिर यह भी सोचने का विषय है कि बिहार की यह बयार अगर बंगाल तक पहुंची तो बुद्धदेव भट्टाचार्य के लिए कैसा संकट खड़ा होने वाला है?
यह अप्रत्याशित जनादेश देखने में जितना सुखद और प्रिय लग रहा है, इसमें उतना ही गंभीर संकट छुपा है.
नीतीश को संसद से लेकर सड़क तक समस्याओं से जूझते हुए विकास की डगर को तय करना है. और जब कि सदन विपक्ष विहीन हो गया है, ऐसे में मीडिया की जिम्मेदारी भी कई गुना बढ़ जाती है. मीडिया को भी अब नीतीश-पुराण बंद करके एक स्वस्थ विपक्ष की तरह से भूमिकाएं बनानी होंगी. जब तक मीडिया एक स्वस्थ आलोचक की भूमिका में नहीं आ जाता है तब तक बिहार के लिए संकट बना रहेगा.
और फिर मीडिया के चरित्रा को लेकर अब गंभीर चुनौती होगी जब कि नीतीश बिहार में उस वास्तविक विकास की नींव रखेंगे जिसकी चर्चा हमने शुरू में की है कि वो विकास बजारोंमुख नही होगा, तब क्या मीडिया बिहार की जनता के पक्ष में खड़ा हो पायेगा या फिर बाजार की शक्तियों के सामने घुटने टेक देगा. ‘रहा न कुल कोई रोवनहारा’ जैसे विपक्ष को लेकर नीतीश कितने संतुलन के साथ विकास कर पाएंगे यह उनके स्वयं के सामने एक बहुत बड़ा प्रश्न है. पूरे राष्ट्र को यह आशा करनी चाहिए कि बिहार अब निर्माण कार्यों से आगे बढ़कर वास्तविक विकास की यात्रा पर बढ़ सके. अब नीतीश की असफलता बिहार को कई दशक पीछे कर देगी.

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

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