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यह कैसा प्रेम दिवस है??(Is it Love or Lust?)




आज फिर से प्रेम दिवस का शोर है. एक दिन प्रेम का... सोचकर आश्चर्य होता है कि भला प्रेम का कोई निर्धारित दिन कैसे हो सकता है? प्रेम कोई व्यापार तो नही है कि शुभ मुहूर्त देखकर किया जाए. प्रेम कोई क्षणिक भाव तो नही है जिसे किसी एक दिन के लिए सहेज कर रखा जा सके. आखिर यह कैसे संभव है कि साल भर में किसी एक दिन ही प्रेम की अभिव्यक्ति की जा सकती है.
लेकिन फ़िलहाल ऐसा ही हो रहा है.
कबीर कहते थे कि 'प्रेम न हाट बिकाय'.. लेकिन अब प्रेम हाट में बिकता है. बिक ही तो रहा है लगभग दो हफ्ते से. बाज़ार प्रेम से भरा हुआ है. जिसकी जितने प्रेम की औकात हो वह उतना प्रेम खरीद सकता है. प्रेमिका कीमती प्रेम की प्रतीक्षा में है.
कई प्रेमी उसी कीमत के दम पर ही प्रेम को खरीद लेने के लिए इस दिन का इंतजार करते देखे जा सकते हैं.
यही नही यह दिन अगर प्रेम के इजहार तक ही होता तो भी शायद कोई बात नही थी. अगर इस दिन सिर्फ तोहफों की कीमत और आकार तक ही बात रहती तो भी शायद कोई बात नही थी. सिर्फ चोकलेट और गुलाब की बिक्री और व्यापार की बात होती तो भी शायद कोई बात नही थी. मन मान ही लेता कि कोई बात नही व्यापार ही सही, होने दो इस प्यार को भी. लेकिन अभी बहुत चौंकाने वाले तथ्य सामने आये हैं. ऑनलाइन खुदरा व्यापार यसटुकंडोम के निदेशक शिशिर मिगलानी से एक बातचीत में पता चला कि इस प्रेम दिवस के इर्द-गिर्द कंडोम की बिक्री भी 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ जाती है. इनके ज्यादातर उपभोक्ता युवा होते हैं. इनमे से कई वह होते हैं जो कि इनसे सम्बंधित दिशा-निर्देश भी लेते हैं. अर्थात बहुत से वह होते हैं जो कि पहली बार इस में पड़ रहे होते हैं.
मन स्तब्ध है. किस प्रेम की दिशा में बढ़ रहे हैं युवा? यह प्रेम दिवस है कि वासना दिवस, इस पर भी सोचने की जरूरत है.
अच्छा एक और भी बात बहुत मजेदार है. इस प्रेम दिवस की शुरुआत कैसे हुई? संत वेलेंटाइन की याद में इस दिवस की शुरुआत हुई थी, जैसा कि कहा जाता है. वेलेंटाइन के सम्बन्ध में कोई विशेष प्रमाणिक तथ्य कहीं भी नही मिलते हैं जिस से कि यह सिद्ध हो सके कि उनकी शहादत के केंद्र में किसी प्रकार से प्रेम कारण था. वेलेंटाइन को लेकर कई तरह की कहानियां चलती हैं. उन्ही में से एक है कि तत्कालीन रोमन सम्राट क्लौडीयस द्वितीय ने अपने सैनिकों को विवाह नहीं करने देने की घोषणा की थी. उसका मानना था कि विवाह के बाद सैनिक का ध्यान और उसकी क्षमता कम हो जाता है. वेलेंटाइन चुपके चुपके सैनिको का विवाह कराया करते थे. और सम्राट को पता लगने पर उन्हें मार दिया गया. इस कहानी के कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नही मिलते हैं. इसके अतिरिक्त कुछ कहानियां हैं वेलेंटाइन को लेकर जिनमे ऐसा कुछ भी उल्लेख नही है. न ही उसमे कहीं से भी यह पता लगता है कि वेलेंटाइन कोई बहुत बड़े प्रेम के समर्थक थे. लेकिन समय के साथ साथ उनके उसी विरोध और उनकी शहादत के सम्मान में इस दिवस को मनाया जाने लगा. अब सोच ये रहा हूँ कि यह कैसा प्रेम दिवस है कि जिसका प्रादुर्भाव ही विरोध की कोख से हुआ है? क्या प्रेम का अर्थ विरोध है? क्या प्रेम घृणा के सापेक्ष में ही किया जा सकता है? शायद प्रेम के इसी सापेक्षिक रूप के कारण प्रेम के सापेक्ष में घृणा भी उसी दर से बढ़ रही है लगातार.
माना कि पश्चिम के पास बहुत कुछ ऐसा है भी नही कि जिसके बहाने वो खुद को बहला सकें, इसलिए वो जब इस प्रेम दिवस के पीछे पागल-पागल दिखते हैं तो ज्यादा आश्चर्य नही होता है. वहां देह आधारित प्रेम की ही परम्परा है. पश्चिम में इस देह प्रेम के दिवस को मनाये जाने के कारण हैं. लेकिन भारत में इसको मनाये जाने का कोई भी तो तार्किक कारण नहीं है.
अच्छा मान लीजिये प्रेम दिवस मनाया ही जाना है तो फिर कोई तार्किक दिवस क्यों न हो? कोई ऐसा दिवस क्यों न हो कि जिस के स्मरण मात्र से ही प्रेम आ जाए मन में. कि जिसका प्रादुर्भाव किसी विरोध की कोख से ना हुआ हो. वैसे तो हमारी परम्परा में पूरा बसंत ही प्रेम का प्रतिनिधित्व करता है. वासंती बयार और प्रेम में पगे हुए ना जाने कितनी ही कहानियां और गीत रचे गए हैं यहाँ. होली तो है ही प्रेम पर्व. फिर भी यदि प्रेम दिवस मनाने का मन है तो क्यों न शिवरात्रि को प्रेम दिवस माना जाय. शिव जिनके नाम से ही प्रेम का बोध हो जाता है. जिन्होंने प्रेम ही का संचार किया सम्पूर्ण जगत में. जो अपने भक्त के प्रेम में बसे तो उसके ही हो गए.
लेकिन अब ऐसा कहने में भी खतरा है. यह आधुनिक प्रेम दिवस घृणा का ऐसा मंजर तैयार कर चुका है कि इसकी चर्चा में प्रेम कम घृणा ज्यादा दिखती है. जैसे ही मैं कहता हूँ कि इसे मनाया जाना उद्देश्यविहीन है, तुरंत मुझे किसी संस्कृति के ठेकेदार से जोड़ कर देखा जाने लगेगा. तुरंत मुझे बजरंगी या शिवसैनिक घोषित कर दिया जायेगा. मैं उस वीभत्स विरोध का भी समर्थन नही करता, लेकिन इसको मनाये जाने के औचित्य पर प्रश्न जरूर खड़ा करता हूँ.
इस प्रेम दिवस पर 'कुछ' खरीदने से पहले एक बार प्रेम को जरूर याद कीजिये. क्या कहीं मन के किसी कोने में प्रेम शेष है?? और लगे कि हाँ प्रेम शेष है अभी जीवन में तो फिर इस प्रेम दिवस के औचित्य पर विचार जरूर कीजिये.
हैप्पी वेलेंटाइन डे.

- अमित तिवारी 
समाचार संपादक 
निर्माण संवाद
(09266377199) 

15 comments:

Atul Shrivastava said...

प्रेम के लिए एक दिन और नफरत के लिए...। दुनिया इतनी छोटी है कि प्रेम के लिए पूरी उम्र कम पडे, फिर एक दिन ही प्‍यार की अभिव्‍यक्ति...।
अच्‍छी पोस्‍ट।
प्रेम को लेकर मेरी एक पोस्‍ट पर नजर डालें और अपने विचार वहां रखें तो अच्‍छा लगेगा।

Ankit Shukla said...

@तिवारी जी... पूरे लेख को लिख के अपने अपना दिमाग लगाया पेन कि इंक खराब की.. जब आप भी जानते है कि पूरा युवा समाज ही इस तरह का हो गया है कि उसे प्रेम दिवस बोले तो वेलेंटाइन डे का बहाना कर के अपने गन्दी सोच वाले विकृत दिमाग की सोची समझी साजिश के तहत अपनी वासना को शांत करने का बहाना मिल जाता है...और इसे आप हम नहीं रोक सकते... जब तुलसी और कबीर कि किसी ने नहीं सुनी तो आपकी हमारी कौन सुनेगा??? तालाब की एक मछली खराब हो तो उसे निकला जा सकता है पर अगर पूरा तालाब ही गन्दा हो तो उसे कोई नहीं साफ कर सकता... जैसे जैसे माँ से मम्मी और मोम का सफर तय हुआ है वैसे ही शाश्वत प्रेम से १४ फेब के प्रेम तक का सफर तय हुआ है... और अब जब "आई लव यू" "सो स्वीट आफ यू" हर हफ्ते नए प्रेमी ("प्राकृतिक पीड़ा शांत होने के बाद") को बोले जाने का का जमाना है जिस से हम और आप सरोकार नहीं रखते उस ज़माने में
"प्रेम न हाट बिकाय" कौन सुनेगा??

अंत में..

अगर कोई भी एक व्यक्ति जो १४ फेब से शिवरात्रि तक का सफर तय कर लेता है आपके लेख और हमारी इस टिपण्णी को पढ़ के तो दोनों लोग गंगा नहाने चलेगे :-D

संजय भास्कर said...

@ AMIT JI SAHI KAHA AAPNE .BIKUL SAHI
लेकिन अब प्रेम हाट में बिकता है. बिक ही तो रहा है लगभग दो हफ्ते से. बाज़ार प्रेम से भरा हुआ है. जिसकी जितने प्रेम की औकात हो वह उतना प्रेम खरीद सकता है. प्रेमिका कीमती प्रेम की प्रतीक्षा में है.

Amit Tiwari said...

@अतुल जी आपका आभार...

@हाँ अंकित .. बात तो सही कह रहे हो कि जब कबीर-तुलसी को किसी ने नही सुना तो हमें कौन सुनेगा...लेकिन फिर सवाल ये भी तो है कि आँखें बंद करके बैठा भी तो नहीं जा सकता ना...
और फिर वही बात कि अगर इन सब बातों के पढने से किसी एक ने भी 14 फ़रवरी से शिवरात्रि तक का सफ़र तय कर लिया तो सार्थक हो जायेगा लिखना..

@संजय भाई बात तो सही ही है... लेकिन आखिर कब तक ऐसा होगा??
और क्या ऐसा होना चाहिए... ये सवाल बना ही रहेगा..

"पलाश" said...

मुझे तो समझ नही आता कि प्रेम मनाने की चीज है या निभाने की ।
जब तक हम प्यार निभाना नही सीखते , केवल बाजार ही सिर्फ इन दिवसों पर खुश होता राहेगा और हमारे लिये नये नये दिवस मनाने को देता रहेगा
http://aprnatripathi.blogspot.com/

शिवकुमार ( शिवा) said...

सच्चा प्रेम यदि हो तो हर दिवस प्रेम दिवस है ।
वैलेंटाईन डे की हार्दिक शुभकामनायें...

सतीश सक्सेना said...

प्रेम दिवस है मगर प्यार कहीं नहीं दिखता !

पहली झलक में ब्लॉग और लेखन अच्छा लगा , लगता है अपनी जगह बनाने में कामयाब रहोगे ! हार्दिक शुभकामनायें !!

Amit Tiwari said...

@Palash- सही कह रही हैं अपर्णा जी... प्रेम मनाने के लिए नही निभाने के लिए होता है.. लेकिन बाज़ार ने पूरी तस्वीर को बदल कर रख दिया है. जिस तरह से अब हर दिवस, हर रिश्ता बाज़ार के हिसाब से निर्धारित हो रहा है... इस पर कुछ रूककर विचार करना चाहिए...

@शिवकुमार जी धन्यवाद..

@सतीश जी इस प्रेम और शुभकामना के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद...

Neha Mishra said...

प्रेमिका कीमती प्रेम की प्रतीक्षा में है.
nice 1...

Nidhi Sharma said...

बहुत अच्‍छा..
सच में प्रेम का यह बदलता स्‍वरूप चिन्‍ता का कारण है।

મલખાન સિંહ said...

दिलों के मिलन के लिए कोई दिन निश्चित नहीं होता. दिल तो कभी भी मिल सकते हैं. वैसे अगर दिन बना ही दिया गया है तो ठीक है, जिसे अच्छा लगे, वो मना सकता है.

mansha said...

nice article ji..fir se very nice....:-)

par koi samjhe tab na.......par tum apni koshish me lage raho...koi na koi 10 me se 1 to samjhega hi

SALIL GEWALI said...

I heartily appreciate ur well-written meaningfully sensible article. The hallowed love and even Sex has been abused and desecrated by the media and thereby corrupted our culture and society.

Let me share my article as well :

Since time immemorial, love, especially the one between man and woman, has never failed to be intriguing, with tales of Romeo-Juliet and our very own Heer-Ranjha being immortalized as symbols of powerful emotions. And, of late, the much-hyped culture of celebrating Valentine’s Day has added a new dimension to it. Perhaps a stream of romantic imageries and fantasies makes an ordinary shepherd a poet and an ironsmith a philosopher!
The charm of love gets more intense when it is rightly supported by mutual understanding, tolerance and a bit of elementary sacrifice. The age-old wisdom — that one should be giving than wanting in love — aptly defines the love emotion. A true lover is a generous and kind soul who spontaneously showers the warmth of love without any expectation in any aspect. Rightly, a lover is not a beggar. However, one cannot but doubt if love still holds the same ethics as in the past and provides people with a sense of joy. The question is: Is immodesty being camouflaged in the guise of love?
Looking at the outrageous display of sexuality all around us — television soaps, celebrity hype, films etc — one would conclude that a very perverse order has been put in place in the name of ‘love’. This has not added to love in the real sense, but has encouraged obscenity. To cite an example, the much-hyped ‘love marriage’ of celebrity couple Britney Spears and Kevin Federline did not last at all. The point is that the lifestyle of celebrities is emulated by their fans without recourse to reasoning, and the younger generation only expects glitz and glamour in love — the ‘‘expectation meter’’ being such that no room is left for compromise, as a result of which many relationships are formed and then broken in the quest for the perfect one, which seldom exists.
Well, here’s wishing all a happy Valentine’s Day — a day cherished by those struck by the cupid, and those who would want the strengthening of the bond of love, complete with a sense of understanding, discipline and purity. Let this day serve to inspire each loving sweetheart to be more truthful to their beloved, and refrain from adhering to cheap modernity — which only serves to defile pure love.
--- Salil Gewali

SALIL GEWALI said...

Desecration of LOVE

I am afraid , mindless rape, molestation and kinky practice are pretty ritually in the news. It is understandable, people are fast becoming lecherous, more candidly, thirsty for flitting bodily lust.
Here I am, however, do not want to point the accusing finger at the culprit alone. I feel, in this family of a nation, the public are mere children where the parents are the administrative machinery. It is downright incorrect to call a baby a spoilt brat if it is freely allowed to grow in the midst of ills. It is the guardians, who in fact must create an ideal environment and guard their wards from going stray or else they may be held responsible for any ill-conduct of a child.
So is the case in the macro-mode. In the light of this sleazy development our honorable concerned authorities are quietly heaving a sigh of contentment and complacence by having been assured of hefty revenue. Thus, they unashamedly allow any ignoble stuff to happen. The closest testimony, ------- our home TVs are boldly booming with the blizzard of shows and features craftily spiced up to give a real thrill to a sex-nerve. Scantily-clad voluptuous divas shaking seductively are the stream of sights in view round the clock. Well, who on earth do not get provoked and aroused and thus start thinking otherwise while viewing a bewitching go-go girls making ample suggestion of sensuality?
Yes, indeed, in this hi-tech age such kind of entertainments have become a part of our daily feast , perhaps intended, to give a full play to the five senses . Why to blame the sex-cell which the Almighty has designed to feed on such food though, contrary to the practice, solely for other purpose which, of course, is indispensable, inevitable and binding for the existence to sustain .
Further, in this shambolic and rumpus world who has the nerve to retell the high-pitched proclamation from the ancient gurus and seers that this transcendental sex urge is coyly, lovingly and submissively expressed inside the thick veil of privacy? Truly, the Holy Gita, too, ordains that sex is utterly for procreation and the love be supremely held in esteem, or else the mankind may reduce to a beast.
Sadly, no especial emphasis on morals, no inhibition, nor even rationing, it is damning indulgence and sheer abuse of the faculties of the nature given senses. Please note, aberration in behaviour, weakening of mental and intellectual aptitude and degeneration in moral ethos are obviously due to unrestrained indulgences in sense gratification.
It is no exaggeration, these days promiscuity and adultery, pre-marital sex and the popular sex- for-a- fling, prevalent in the film world, are making inroad into a section of high society which have gradually and discreetly been stalking the middle class society as well. No wonder, all these damaging consequences are the result of ill-conceived myopic plans and schemes and, more importantly, belief in hedonism, consumerism and short term benefit.
Here I tend to assume that our administrative machinery, instead of striving to inspire us to become a responsible, disciplined, cultured, virtuous, compassionate and patriotic citizen, has seemingly gone otherway round by mere promoting the entertainment industries to produce and air a torrent of sensual items being heedless of ominous consequences.
Alas ! more dangerous times are sure to come where the body of humanity may reduce to a savage hole unless and until a new turn is ordained.

-----------------Salil Gewali

pratishtha said...

dunia me sacche prem ki paribhasha janane vale rare hai..aaj ki generation se ye apekcha rakhana bekar hai ...ek sarthak prastuti..aabhar

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