...........................

Friday, October 15, 2010

जाने क्यों सच कभी-कभी

जाने क्यों सच कभी-कभी 
कमजोर सा मालुम होता है।
मन मेरा भी कभी-कभी 
इक चोर सा मालुम होता है।।

शब्द शिकायत करते हैं,
कि अर्थ समझ से बाहर है।
कहते हैं जब लब कुछ तो, 
कुछ और सा मालुम होता है।।

जब बोलूं सावन- तो दिल 
सूखी लकड़ी सा लगता है।
पतझर में गम के फूलों 
में जोर सा मालुम होता है।।

जब चाहा बोलूं कुछ तो 
सब चुप-चुप सा लगता है।
जब चुप बैठूं तो दिल में 
इक शोर सा मालुम होता है।।

'संघर्ष' वफाएं करते रहे, 
रिश्तों से, रिश्ते छूट गए।
जब छोड़ चला रिश्ते, रिश्तों में 
भोर सा मालुम होता है।।

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

Wednesday, October 13, 2010

आज फिर कुछ लिखने की रुत आई है...


आज फिर कुछ लिखने की रुत आई है,
आज फिर से ख्वाबों में तन्हाई है।
रिश्तों के तार फिर ख़ामोशी से गुनगुनाये,
दर्द के पोरों से कुछ गम मुस्कुराए।
कुछ नए ज़ज्बात, कुछ पल हैं नए,
कुछ पुराने साज दिल ने फिर सजाये।।
फिर बजी वो यादों की शहनाई है,
आज फिर से ख्वाबों में तन्हाई है। 


फिर वही पल हैं सुनहरे याद आये,
फिर वही सपने हैं पलकों में सजाये।
फिर वही हँसना-मनाना-रूठ जाना,
फिर वही निष्काम चंचल सी अदाएं।।
आज फिर से दिल ने वही नज़्म गाई है,
आज फिर से ख्वाबों में तन्हाई है।

फिर वही हलचल पुरानी, पल नए हैं,
हैं पुराने आज, लेकिन कल नए हैं।
फिर कोई इतना क्यों दिल पे छाया-छाया,
फिर वही खुशबू, मगर संदल नए हैं।।
आज फिर साँसे गुलाबी रंग लाई हैं,
आज फिर से ख्वाबों में तन्हाई है।



-अमित तिवारी 
समाचार संपादक
निर्माण संवाद


Tuesday, October 12, 2010

यूज एंड थ्रो नहीं, सात जन्‍मों का सम्‍बन्‍ध

सभ्यता संकट में है. मानवीय सभ्यता ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण चराचर जगत ही खतरे में है. मानव के लिए मानव का मूल्य शून्य हो गया है. सभी 'वाद' पिट चुके हैं. बात चाहे 'मार्क्सवाद' की हो या 'पूंजीवाद' या 'साम्यवाद' की. किसी भी 'वाद' में जनाकर्षण नहीं शेष है. कोई भी 'वाद' समस्या का हल करता नहीं दिखता है.
कारण स्पष्ट है कि किसी  भी 'वाद' में 'जीवन-मूल्य' की चर्चा नहीं है. हर जगह 'जन-नायक'और 'लोक-नायक' की बात है. लेकिन यह मानवी सभ्यता किसी 'जन-नायक' या लोक-नायक' की नहीं वरन एक 'मित्र-नायक' की प्रतीक्षा में है. अब 'सुपर-पॉवर' नहीं 'सुपर पर्सन' की जरूरत है. वही 'मित्र-नायक' ही 'युग-नायक' बनेगा जिसके अन्दर विश्व से मैत्री और विश्वनाथ से प्रीति का भाव भरा होगा. विश्व भर में व्याप्त हिंसा का निवारण मैत्री और करुणा के भाव से ही हो सकता है. 'वसुधैव कुटुम्बकम' का ध्येय वाक्य हमें विश्व को बाज़ार नहीं वरन परिवार मानना सिखाता है.
हम बाज़ार नहीं बाजारवाद के विरोधी हैं. हमारी संस्कृति ने भी बाज़ार का समर्थन किया है. लाभ की बात हमने भी की है, लेकिन हमने 'शुभ-लाभ' की बात की है. हमारा लाभ भी शुभ से नियंत्रित है. 'लाभालाभ' की संस्कृति नहीं है हमारी. 'जो कमायेगा, वो खायेगा' की संस्कृति से विश्व का कल्याण संभव नहीं है. 'जो कमाएगा, वो खिलायेगा' की संस्कृति को जागृत करना होगा हर मन में. 'जियो और जीने दो' ही नहीं बल्कि 'जियो और जीने की प्रेरणा दो' सीखने की जरूरत है.
बढ़ते उपभोक्तावाद से उत्पन्न हुई समस्यायों का हल उपभोक्तावादी तरीकों से नहीं किया जा सकता है. पेड़ की पत्तियां छांटने की नहीं वरन समस्या को मूल से उखाड़ फेंकने की आवश्यकता है. आतंकवादी को मारने से आतंकवाद नहीं मरता है. 'बुरा व्यक्ति' हो या बुरे व्यक्ति का विरोधी, दोनों के अस्तित्व के लिए बुराई जरूरी है. बात चाहे 'सीआईए' की हो या 'आई एस आई' की, आतंकवाद दोनों की जरूरत है.
विषमता और गैरबराबरी को मिटाए बिना समस्यायों से नहीं लड़ा जा सकता है. बिना किसी 'भागवत व्यक्तित्व' के किसी 'वैश्विक नेतृत्व' की कल्पना बेमानी है. 'बुद्ध' चाहे भारत में हों या अमेरिका में, ऐसा नेतृत्व जिसके भीतर मैत्री, प्रीति और करुणा का भाव भरा होगा, जो संपूर्ण चर-अचर से एकात्म स्थापित कर सकता है, वही इस विश्व को बचा सकेगा. ऐसे किसी भी व्यक्तित्व के लिए एक मात्र मार्ग 'सम्बन्धवाद' ही है. सम्बन्ध-धर्म ही तमाम प्रश्नों का उत्तर बन सकता है.
आज विश्व को 'यूज एंड थ्रो' की नहीं 'सात जन्मो के सम्बन्ध' की दरकार है. तभी यह खुबसूरत दुनिया जीने के लायक बनी रह पायेगी.

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे..



शायद कम ही लोग जानते 1990 के दशक में गढ़वाल विश्वविद्यालय में हरक सिंह रावत शिक्षक रहते ही राजनीति को अपना पेशा बना चुके थे। तब कवि और पत्रकार आज के  मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक व विपक्ष के नेता हरक सिंह रावत में घनिष्ट दोस्ती होने के कारण कभी -कभी तो यह बात भाजपा और कांग्रेस के भीतर खुसफुसाहट के रुप में कही जाती थी कि उनके और मुख्यमंत्री के बीच कोई गुप्त संधि तो नहीं हैं। राजनीति
 में पुरानी बातो को खूब उछाला जाता है।  हरक सिंह रावत स्कूटर के आगे और उनके पीछे की सीट पर आज के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक हुआ करते थे। लेकिन वक्त ने करवट बदली और उनके स्कूटरिया यार निशंक को भाजपा आलाकमान ने उत्तराखंड को चलाने का जिम्मा सौंप दिया। हरक सिंह के पास विधानसभा के भीतर कांग्रेस को चलाने का भार है। स्कूटर वाली दोस्ती कायम है। इसे कहते हैं सच्ची दोस्ती! सीटें बदल गईं पर दोस्ती नहीं बदली। प्रदेश हैरान है। पौड़ी विधानसभा क्षेत्र से राजनीति शुरु करने वाले हरक सिंह रावत राजनीति के उस्ताद माने जाते हैं। पहले मनोहर कांत ध्यानी फिर बीसी खंडूड़ी की उंगली थाम कर भाजपा की राजनीति में ऐसे जमे कि भाजपा के भीतर कईयों को उनसे खतरा महसूस होने लगा। बीजेपी की नई पीढ़ी के नेताओं में उन्होने सबको पीछे छोड़ दिया। उनकी महत्वाकांक्षाओं को भांप रहे नेताओं ने उन्हे भाजपा से बाहर करवा दिया।भाजपा से निकलकर उन्होने सतपाल महाराज की उंगली थामी और 1996 के लोकसभा चुनाव में उनकी सोशल इंजीनियरी और चुनावी तिकड़मों ने मिलकर भाजपा के जनरल को चित कर दिया। सतपाल महाराज को राजनीति में भी चेले चाहिए या फिर भक्त। वह खुद ही गढ़वाल में ठाकुर राजनीति के कर्णधार होना चाहते थे। हरक सिंह राजनीति में महाराज का संप्रदाय बनाने तो नहीं आए थे। वह गढ़वाल विवि की शिक्षक राजनीति के गुरुकुल में प्रशिक्षित थे। गुरु को गुड़ बनाए रखने व खुद शक्कर बन जाने की टेक्नोलॉजी में दक्ष हरक सिंह सतपाल के कंधे पर सवार होकर राजनीति में लंबी छलांग मारने को आतुर थे। लिहाजा ठाकुर क़ी यह हिट जोड़ी भी टूट गई। हरक सिंह बसपा में गए और वहां भी उन्होने अपना लोहा मनवाया। एक दशक से ज्यादा समय तक राजनीति में घुमक्कड़ की तरह इधर उधर आते जाते रहे हरक फिर कांग्रेस में पहुंचे तो वहां उन्होने डेरा जमा लिया।अदम्य महत्वाकांक्षा और दबंग राजनीति हरक की राजनीति की बुनियादी ताकत है। अपने समर्थकों के लिए किसी से भी भिड़ जाने की उनकी खासियत से ही उनके पास कुछ कर गुजरने वाले समर्थकों की पल्टन है। राजनीति की यह खासियत ही उनकी सीमा भी है।उनके विरोधी भी उतने ही कट्टर हैं जो किसी भी कीमत पर उन्हे आगे नहीं आने देना चाहते। इसीलिए विवादों से उनका पुराना नाता रहा है। पटवारी भर्ती कांड, जेनी कांड समेत कई विवादों से घिरे हरक अब भूमि घोटाले में घिर गए हैं। मुख्यमंत्री के सबसे तगड़े दावेदार माने जा रहे हरक सिंह रावत को दौड़ से बाहर करने के लिए इसे उछाला जा सकता है ।

-सुदर्शन सिंह रावत

जीती जा सकती है जंग भूख से ..

जब भारत जैसे देश को चावल - चीनी का आयात करने की आवश्यकता पड़ जाये। जब एक कृषिप्रधान देश में आत्महत्या करने वाले किसानों का आंकड़ा बढ़कर लाखों में पहुँच जाये। जब एकओर बुंदेलखंड जैसे तमाम हिस्सों में भुखमरी का दौर चल रहा हो और दूसरी जगह कहा जाए कि यह हमारी सामयिक समस्यायें हैं जिन्हें सुलझा लिया जायेगा। क्या स्थिति इतनी ही सहज औरसरल है?
किसानों की आत्महत्या का क्रम बरकरार है। खेती किसान के लिए घाटे का सौदा बन रही है। वह खेती करता है, क्योंकि वह कुछ और नहीं कर सकता है। वह जिन्दा है, क्योंकि मरा नहीं है। किसान उत्पाद का वाज़िब दाम न मिलने के कारण बदहाल है और सामान्य निम्नवर्गीय जनसंख्या खाद्यान्नों के बढ़ते मूल्यों के चलते भुखमरी के कगार पर खड़ी है। खेती बिचौलियों के लिए लाभ का माध्यम बन गयी है। उच्चवर्ग तमाम प्रश्नों और समस्याओं से बेखबर। एक ओर सकल घरेलु उत्पाद में कृषि का कम होता योगदान और दूसरी ओर
भुखमरी की विकराल होती समस्या। हाल ही में आई अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान (आईएफपीआरआई) की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत भुखमरी के मामले में 67वें स्‍थान पर है। आईएफपीआरआई और जर्मनी के कंसर्न वर्ल्डवाइड एंड वेल्टहंगरहिल्फे (सीडब्ल्यूडब्ल्यू) के संयुक्‍त तत्‍वावधान में जारी इस रिपोर्ट में 84 देशों की सूची है, जिनमें चीन 9वें, श्रीलंका 39वें और पाकिस्तान 52 वें स्थान पर हैं। इस सूची में देशों में शिशु मृत्यु दर, कुपोषण और भरपेट भोजन न पाने वालों की आबादी को आधार बनाया गया है।
समस्या सिर्फ भारत की नहीं है। भूख एक वैश्विक प्रश्न बन गया है। सयुंक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम ने अपनी एक रिपोर्ट में वर्तमान वैश्विक खाद्य समस्या को भूख की एक शान्त सुनामी का नाम दिया है। रिपार्ट के अनुसार खाद्य समस्या के कारण लगभग 40 मीलियन लोगों को अपना भोजन कम करना पड़ रहा है तथा विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग छठवां हिस्सा भुखमरी की चपेट में है।
तीसरी दुनिया के तमाम देश भुखमरी की हृदय विदारक स्थिति में जीने के लिए अभिशप्त हैं।
जहां एक ओर दुनिया की लगभग 17 फीसदी आबादी भूखी है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण की समस्या-समाधान के नाम पर चीन आदि विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश जैव ईधन का शिगूफा छेड़े हुए हैं। गरीब देशों की आबादी भूखी सोने के लिए विवश है और अमीर देशों की जमात अपने आराम के लिए जैव ईंधन के उत्पाद के लिए लाखों टन खाद्यान्न को जला डाल रही है। रोज लाखों टन मक्के का इस्तेमाल जैव ईंधन बनाने के लिए किया जा रहा है।
यह तस्वीर आखिर क्या बयान करती है। यही नहीं तस्वीर के और भी रुख हैं। भारत के प्रख्यात रिसर्चर और लेखक देवेन्द्र शर्मा ने एक बातचीत के दरम्यान स्थिति को स्पष्ट करते हुए तस्वीर के ऐसे ही एक रुख की ओर इशारा किया था। इस सत्य को स्वीकार किया जाना चाहिए कि विश्व में किसी भी प्रकार से अनाज की कमी नहीं है। एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की कुल आबादी 6.7 अरब है, जबकि विश्व में कुल मिलाकर लगभग 11.5 अरब लोगों की जरूरत का अनाज पैदा हो रहा है। सच यह है कि विश्व का एक भाग अधिक खाद्यान्न का इस्तेमाल कर रहा है, यहां तक की खाद्यान्न का इस्तेमाल जैव ईंधन तक बनाने में कर रहा है, जबकि दूसरी ओर एक बड़ा हिस्सा खाद्यान्न की कमी से जूझ रहा है। कमी खाद्यान्न की नहीं है बल्कि वितरण प्रणाली में कमी है। खाद्यान्न का विश्व में सही वितरण नहीं है। वैश्विक भुखमरी की समस्या से लड़ रहे तमाम वैश्विक संगठनों को यह सत्य स्वीकार करना होगा। खाद्यान्न वितरण पर कारपोरेट जगत तथा उच्च वर्ग के नियंत्रण को कम कर करके यदि खाद्यान्नों का पूरे विश्व में सही वितरण किया जाये तो भूख से यह जंग जीती जा सकती है।

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

हमें आदत नहीं है ...


गुबारों-गर्द चलने की
हमें आदत नहीं है,
गेसुओं पर मचलने की
हमें आदत नहीं है।
हम पत्थर के बुत हैं,
ढल गए जैसा हमें ढाला,
वक़्त-बेवक्त ढलने की
हमें आदत नहीं है।
आगोश-ए-आइनों में ही
रहते हैं हम हर पल,
गाह-चेहरा बदलने की
हमें आदत नहीं है।
हम, गिर-गिर के जो संभले
नहीं उनमे से दुनिया,
गिरने लायक संभलने की
हमें आदत नहीं है।
थे जो हमदर्द, उनसे ही
बहुत से दर्द खाए हैं,
दर्द से दिल दहलने की
हमें आदत नहीं है।
नहीं 'संघर्ष' इस दुनिया
से कोई चाह हमको,
चाह में गम के जलने की
हमें आदत नहीं है।

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

Friday, October 8, 2010

आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी !

चियर्स कह देने से लोग खुश हो सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कि हैप्पी गांधी जयंती कह देने से गांधी जयंती भी हैप्पी हो जाती है. कामनवेल्थ खेलों की व्यवस्था में तमाम खामियों के बाद भी गांधी जयंती काफी हैप्पी हो गयी थी. क्यूंकि देर शाम खुद गृहमंत्री ने यह सुनिश्चित किया कि कामनवेल्थ खेलों के आयोजन की सुरक्षा में कोई कमी न रह जाए. पुलिस/पैरा मिलिट्री के लगभग एक लाख जवान और विशेष कमाण्डो इन खेलों की सुरक्षा में लगाये गए हैं. पूरी दिल्ली-एनसीआर को बंधक बना लिया गया. 'गणतंत्र' का वो 'गण' जो इस राजधानी के लिए किसी आतंकवादी खतरे से भी अधिक इसकी शानो शौकत पर धब्बा थे, उन्हें या तो शहर से निकाल दिया गया है या फिर कहीं छिपा दिया गया है. एक लाख रेहड़ी पटरीवालों को पखवारे भर के लिए गायब कर दिया गया है. दिल्ली के सभी सरकारी स्कूलों को भी पंद्रह दिन के लिए बंद कर दिया गया ताकि खेलों के आयोजन में बच्चे कहीं से बाधक न बने.
अब भला इससे बड़ी विडंबना और बेशर्मी क्या होगी कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र ब्रिटेन के गुलाम रहे दुनिया के 54 देशों के खेल का बढ़-चढ़ कर आयोजन करे. हमें ज्ञात होना चाहिए कि 1930 में ब्रिटेन के गुलाम नौ देशों के साथ शुरू हुआ ‘ब्रिटिश एंपायर गेम’, ‘ब्रिटिश एंपायर कॉमनवेल्थ गेम्स’ से होता हुआ आज ‘कॉमनवेल्थ गेम्स’ बन गया है. और आज भी गुलामी जिंदाबाद. होना तो ये चाहिए था कि लगभग 200 साल तक ब्रिटेन के गुलाम रहे ‘दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र’ भारत की राष्ट्रपति को इसके उदघाटन समारोह में ही इसका उल्लेख करना चाहिए था और ‘ कॉमनवेल्थ गेम्स’ के आयोजन को खत्म करने या अगले गेम से भारत को अलग करने की घोषणा करनी चाहिए थी.
लेकिन जैसा कि ना होना था ना हुआ, और खेल शुरू कर दिए गए. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और सच्चे देशप्रेमी लालबहादुर शास्त्री की पैदाइश के ठीक अगले दिन ब्रिटिश उपनिवेशवाद के गुलाम 54 देशों के कॉमनवेल्थ गेम्स का गांधी के ही देश के रहनुमाओं के द्वारा भव्यता से आयोजन करने पर हर सच्चे हिंदुस्तानियों को शर्म आई होगी.
क्या ऐसा नहीं लगता कि ब्रिटेन के गुलाम रहे हिंदुस्तान की सरजमीन पर कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन स्वाधीनता आंदोलन में शहीद हुए हजारों स्वाधीनता सेनानियों का अपमान है। क्या आजादी के महज छह दशक बाद ही हम अपने स्वाधीनता सेनानियों को भूल रहे हैं?
राष्ट्रीय शर्म को राष्ट्रीय गौरव के साथ जोड़ दिया गया. यही कारण था कि दिल्ली से दूर बैठे लोगों ने टेलीविजन चैनलों पर जब उदघाटन का रंगारंग कार्यक्रम देखा होगा तो उनका राष्ट्रीय स्वाभिमान निश्चित रूप से बल्लियों उछल गया होगा. लेकिन वो इस बात से बेखबर हैं कि जल्द ही ये बल्लियां दिल्ली में रहनेवाले लोगों के सिर पर डंडे बनकर बरसेंगी. अभी यह बात नहीं करते हैं कि जब खेलों का आयोजन खत्म हो जाएगा तो दिल्ली वालों को आनेवाले कितने दशकों तक इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी बल्कि तात्कालिक तौर पर भी वे कीमत चुका ही रहे हैं. दिल्ली में अत्यावश्यक पदार्थों की सप्लाई भी बाधित कर दी गयी है क्योंकि खाने, पीने और जीने के अधिकांश सामान ट्रकों में भरकर सड़कों के रास्ते दिल्ली पहुंचते हैं और दिल्ली सरकार को सड़कों पर ट्रकों की भीड़ नहीं चाहिए इसलिए उसने औद्योगिक गतिविधियों को तो ठप कर ही दिया है ट्रकों के प्रवेश पर भी अधिकांश रोक लगा दिया है. सब्जियों के भाव भी पचास साठ रूपये किलो है. दिल्लीवालों का दिल टटोलिए, सिवाय कोफ्त के और कुछ नहीं निकलेगा.
लोग कष्ट भुगतें तो भुगते. गलती उनकी है. सरकार के लाखों बार कहने के बाद भी आखिरकार शेष दिल्लीवालों ने खेलों में हिस्सेदारी क्यों नहीं की? दिल्ली पुलिस की सावधान करती चेतावनियां भी जारी हो रही हैं. इन सड़कों पर आधी रात तक न जाएं और इस सड़क को आधे दिन के लिए इस्तेमाल न करें. आधी रात और आधे दिन का भेद रख पाना हर ज्ञानी पुरुष के लिए शायद संभव नहीं होगा इसलिए वह पूरे दिन का ही बचाव करने में अपनी भलाई समझ रहा है.
इन सब के बीच सबसे बड़ा परिवर्तन मीडिया के चरित्र में देखने को मिला. जो खेल शुरू होने के दो दिन पहले तक बेड टूटने और सांप निकलने के किस्से बता रहे थे, रातों-रात उन्हें चमत्कार के दर्शन हो गए. अगले ही दिन से उन्होंने हमें बता दिया कि ऐसा खेलगांव तो कहीं बना ही नहीं है. सरकारी उत्साह भी चरम पर दिखा. चिदम्बरम ने लुंगी शर्ट छोड़ टी शर्ट और पैण्ट पहन लिया. शीला दीक्षित की सीटियां रूकने का नाम नहीं ले रहीं. मनमोहन सिंह आदत के अनुसार पूरे खेलों के दौरान मुस्कुराते ही रहेंगे.
यही नहीं इन्कम टैक्स विभाग ने भी पूरे उत्साह के साथ आधे आधे पेज का विज्ञापन देकर कामनवेल्थ खेलों को अपनी शुभकामनाएं दी. क्यों? आप भी सोचिए, दिल्ली वाले तो अगले दस बीस सालों तक इस शुभकामना की कीमत चुकाएंगे ही.
गुलामी की परंपरा निभाते हुए सब कुछ होता रहा. प्रिंस ऑफ वेल्स चा‌र्ल्स ने औपचारिक संदेश पढ़ा और राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल ने कहा 'अब खेल शुरू हों.., और खेल शुरू हो गया. अब भले ही इन बातों को बेमानी कर दिया गया है कि "राष्ट्रों का ये मंडल" पूर्व गुलामों का संगठन है जो खेल के इस महा-उत्सव के जरिये महारानी को शुक्रिया अदा करते हैं। लेकिन एक जमाने में इस पर खूब बात होती थी। 1960 के आसपास हिंदी के श्रेष्ठ कवि नागार्जुन ने महारानी के आगमन को लेकर एक चर्चित कविता लिखी थी।
बाबा नागार्जुन की उस कविता की पंक्तियाँ भी आज हंस उठी हैं ये सब देखकर..

आओ रानी हम ढोएंगे पालकी
यही हुई है राय जवाहरलाल की
रफू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी !

आओ शाही बैंड बजाएं,
आओ वंदनवार सजाएं,
खुशियों में डूबे उतराएं,
आओ तुमको सैर कराएं
उटकमंड की, शिमला-नैनीताल की
आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी

तुम मुस्कान लुटाती आओ,
तुम वरदान लुटाती जाओ,
आओ जी चांदी के पथ पर,
आओ जी कंचन के रथ पर,
नज़र बिछी है, एक-एक दिक्पाल की
छ्टा दिखाओ गति की लय की ताल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !

सैनिक तुम्हें सलामी देंगे,
लोग-बाग बलि-बलि जाएंगे,
दृग-दृग में खुशियां छलकेंगी
ओसों में दूबें झलकेंगी
प्रणति मिलेगी नये राष्ट्र की भाल की
आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी !

बेबस-बेसुध सूखे-रुखड़े,
हम ठहरे तिनकों के टुकड़े
टहनी हो तुम भारी भरकम डाल की
खोज खबर लो अपने भक्तों के खास महाल की !
लो कपूर की लपट
आरती लो सोने की थाल की
आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी !

भूखी भारत माता के सूखे हाथों को चूम लो
प्रेसिडेंट के लंच-डिनर में स्वाद बदल लो, झूम लो
पद्म भूषणों, भारत-रत्नों से उनके उदगार लो
पार्लमेंट के प्रतिनिधियों से आदर लो, सत्कार लो

मिनिस्टरों से शेक हैंड लो, जनता से जयकार लो
दायें-बायें खड़े हजारी आफिसरों से प्यार लो
होठों को कंपित कर लो, रह-रह के कनखी मार लो
बिजली की यह दीपमालिका फिर-फिर इसे निहार लो

यह तो नयी-नयी दिल्ली है, दिल में इसे उतार लो
एक बात कह दूं मलका, थोड़ी सी लाज उधार लो
बापू को मत छेड़ो, अपने पुरखों से उपहार लो

जय ब्रिटेन की, जय हो इस कलिकाल की !
आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी!
रफू करेंगे फटे-पुराने जाल की !
यही हुई है राय जवाहरलाल की !
आओ रानी हम ढोएंगे पालकी !

कुल जमा अगर जोड़ा जाए तो जब से मेजबानी मिली है तब से खेलगांव बनाने और दिल्ली को सजाने के नाम पर दिल्ली और देश ने करीब 80 हजार करोड़ रुपये खर्च कर दिये हैं. शायद इसलिए कि भारत का नया उभरता मध्यवर्ग और उनके नौनिहाल दुनिया के मानचित्र पर टहलें तो कह सकें कि सबसे आगे होते हैं हिन्दुस्तानी. लेकिन ये हिन्दुस्तानी किस कीमत पर आगे होने की कोशिश कर रहे हैं, इसकी विवेचना की इजाजत नहीं है हमें. वैसे भी शीला दीक्षित हमें बता ही चुकी हैं कि खेलों के आयोजन के बाद दिल्ली में जो सुविधाएं निर्मित की गयी है उसका उपयोग तो दिल्लीवाले ही करेंगे. इसलिए धैर्य रखें और खेलों को सफल बनाने में सहयोग करें.
बेहतर है कि दिल्ली वाले इस जूठन का शांति से इंतजार करें. सदिच्छा से इनके खेलों के सफल होने की दुआ करें. पिछले दो-तीन दिन से अखबार तो हर रोज आपको सोना और सोने पे सुहागा की खबरें दे ही रहे हैं. सोने की चमक से खुश रहिये. अभी अघोषित आपातकाल का दौर है. बीत जायेगा. खेलों में हिस्सा लेने वाले चले जायेंगे. अपना-अपना सोना-चांदी समेटे सब अपने ठिकाने होंगे. सब धीरे-धीरे और खेलों में जीतने-हरने के सिलसिले में लग जायेंगे. तब फिर वैसे भी दिल्ली वालों को अकेले ही याद करना होगा इन खेलों को.
भूल तो सकते नहीं. जब-जब 'महंगाई डायन' खाएगी, तब-तब इस 'गुलामी डायन' की याद आएगी. जिन घरों में इन दिनों में दोनों जून की रोटी नसीब नहीं हो पा रही होगी.. वो अगले कई महीनो तक हर रोटी के टुकड़े के साथ इस आपातकाल को याद करेंगे. जब-जब टेक्स की बढ़ी हुई दरें सामने आएँगी 'आयकर विभाग' का शुभकामना सन्देश याद आयेगा.
तब तक इस अघोषित आपातकाल की जय हो......

Wednesday, October 6, 2010

'चर्चा-घर' में चर्चा करें ...

सम्माननीय पाठकों 'पुनर्जन्म' ब्लॉग पर आज से 'चर्चा-घर' को जोड़ा गया है.
'चर्चा-घर'  'पुनर्जन्म' ब्लॉग पर आने वाले पाठकों के बीच बातचीत का एक माध्यम है.
इसके माध्यम से पाठक एक दूसरे से सीधे संवाद स्थापित कर सकेंगे. यह ब्लॉग पर छपे किसी भी विषय पर चर्चा करने के लिए एक आसान तरीका होगा.
लेकिन चर्चा-घर में Login करने को लेकर पाठकों को कुछ समस्या का सामना करना पड़ा है.
जैसा कि तस्वीर में दिख रहा है, sign in के नीचे chatroll , facebook , guest लिखा है. आप guest या facebook से login कर सकते हैं. कभी कभी guest पर क्लिक करने पर उसके नीचे लिखे site के लिंक पर क्लिक हो जाता है. इस असुविधा के लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं. थोडा सा ध्यान से क्लिक करने पर यह असुविधा नहीं होगी. और login के बाद आप चर्चा-घर में लिख सकते हैं.

facebook पर क्लिक करने पर आपको अपनी facebook id से login करना होगा. login करने के बाद जैसे ही popup विंडो बंद हो जाए, पुनः facebook पर क्लिक कर लीजिये. ऐसा करते ही आप चर्चा-घर में लिख सकेंगे. जो कि हर ऑनलाइन पाठक को दिखाई देगा.
'चर्चा-घर' में facebook से login करने पर एक recommend करने का विकल्प भी दिखाई देगा, कृपया उसे recommend करके, share this विकल्प का भी चयन कर लें.. ऐसा करने से 'चर्चा-घर' का लिंक आपके facebook wall पर भी दिखाई देगा.

पाठकों से अनुरोध है कि 'चर्चा-घर' के अतिरिक्त भी किसी post पर आपकी टिप्पणियां अवश्य प्रार्थनीय हैं.
आपकी टिप्पणियां हमारे उत्साह को बढाती हैं.

धन्यवाद...
-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद
('पुनर्जन्म' ब्लॉग मोडरेटर)

लहरों ने पुकारा...

मत छोड़ तू पतवार, लहरों ने पुकारा.
मत तीर पर रुक यार, लहरों ने पुकारा..


क्या कहें कि स्वप्न सब साकार हैं.!
टल गया सर से व्यथा का भार है.!
क्या कहें कि सूर्य पहुंचा हर तिमिर में.!
क्या कहें कि मिट गया अंधियार है.!
कर स्वप्न सब साकार, लहरों ने पुकारा... 
मत तीर पर रुक यार....


क्या फूल अब बेख़ौफ़ होकर बोलते हैं ?
क्या महक हर सांस में लब घोलते हैं ?
क्या कहीं कोई कली टूटी नहीं ?
क्या दर्द में अब भी सभी दिल डोलते हैं ?
है प्रश्न का अम्बार, लहरों ने पुकारा... 
मत तीर पर रुक यार.....


क्या कहीं कश्ती कोई डूबी नहीं है ?
आग में बस्ती कोई डूबी नहीं है ?
क्या कहीं कोई सिसकता शव नहीं है ?
ममता कहीं सस्ती कोई डूबी नहीं है ?
करनी है कश्ती पार, लहरों ने पुकारा...
मत तीर पर रुक यार...


क्या चिता सीता की ठंडी हो गयी है ?
कृष्ण की गीता भी शायद सो गयी है.!
आज हर मीरा लिए विष-प्याल बैठी,
बांसुरी क्यों श्याम की चुप हो गयी है ?
कर प्रश्न हर निस्तार, लहरों ने पुकारा...
मत तीर पर रुक यार....


द्रौपदी फिर दांव में खेली गयी है.!
हर गली हर गाँव में खेली गयी है.!
अब मुझे ही चीर उसका है बढ़ाना.!
यह शपथ उर में मेरे ले ली गयी है.!
कर चेतना संचार, लहरों ने पुकारा..
मत तीर पर रुक यार....


है लहू सब ओर, कैसे मैं अधर का पान कर लूं ?
है तिमिर घनघोर, कैसे प्रेमिका बांहों में भर लूं. ?
कैसे करूं मैं प्रेमलीला, छोड़कर कर्त्तव्य सारे.!
शबनमी बूंदों में कैसे मैं निखर लूं.?
लक्ष्य है मझधार लहरों ने पुकारा
मत तीर पर रुक यार....


-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद
(तस्वीर गूगल सर्च से साभार)

Tuesday, October 5, 2010

काली सुबह लिखूं... उजाली रात पर लिखूं...

हालात पर लिखूं या ज़ज्बात पर लिखूं
दुनिया के वाहियात खयालात पर लिखूं
या लिखूं मैं यार-तुम और जाम की बातें,
काली सुबह लिखूं, उजाली रात पर लिखूं


या लिखू कि देश घायल सा पड़ा है,
या कहूँ कि नौजवां है नींद में,
या कि कुछ पल फिर तकूँ मैं राह में
एक नए सूरज कि इक उम्मीद में...


हीर राँझा की नयी अठखेलियाँ
फिर सीरी-फरहद का रोमांस हो,
फिर कहानी का धरातल हो नया
फिर से लिखने का नया इक चांस हो..


देश दिल धड़कन ज़माना
सब है अपना, पन बेगाना..
प्यार दिल एहसास थकता..
हर घडी विश्वास थकता..


क्या किस्सा छोडूं, कौन सी बात पर लिखूं...
काली सुबह लिखूं उजाली रात पर लिखूं...


-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद
(तस्वीर गूगल सर्च से साभार)
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...