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जाने क्यों सच कभी-कभी

जाने क्यों सच कभी-कभी 
कमजोर सा मालुम होता है।
मन मेरा भी कभी-कभी 
इक चोर सा मालुम होता है।।

शब्द शिकायत करते हैं,
कि अर्थ समझ से बाहर है।
कहते हैं जब लब कुछ तो, 
कुछ और सा मालुम होता है।।

जब बोलूं सावन- तो दिल 
सूखी लकड़ी सा लगता है।
पतझर में गम के फूलों 
में जोर सा मालुम होता है।।

जब चाहा बोलूं कुछ तो 
सब चुप-चुप सा लगता है।
जब चुप बैठूं तो दिल में 
इक शोर सा मालुम होता है।।

'संघर्ष' वफाएं करते रहे, 
रिश्तों से, रिश्ते छूट गए।
जब छोड़ चला रिश्ते, रिश्तों में 
भोर सा मालुम होता है।।

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

5 comments:

निर्मला कपिला said...

शब्द शिकायत करते हैं,
कि अर्थ समझ से बाहर है।
कहते हैं जब लब कुछ तो,
कुछ और सा मालुम होता है।।
ेअमित जी लाजवाब रचना है। बधाई।

mansha said...

जब चाहा बोलूं कुछ तो
सब चुप-चुप सा लगता है।
जब चुप बैठूं तो दिल में
इक शोर सा मालुम होता है।



hmmm.............lajwaab rachna hai jiiiii............aise hi likhte rahiye...amit ji

HARMINDAR said...

sach ek khab hai...
sach ek aaina hai..
sach parda hai..
sach bass ek dilasa hai..
or kuch nahi .....shabdo ka ek khel hai..
sach, sach, sach, wastav me kuch nahi jo apka DIL kahe wahi sach hai...

संजय भास्कर said...

ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

संजय भास्कर said...

आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी......आपको फॉलो कर रहा हूँ |

कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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