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आज तीन दिन के बाद...



यहाँ का हर फूल गूंगा क्यूँ है?
मेरी अंगूठी में उदास मूंगा क्यूँ है?
वो पंछी क्यूँ रो रहा है?
उसके दिल में क्या हो रहा है?
दाना- लाना- चुगना- खाना
और फिर रात के होने का इंतजार
यह सब कुछ पहले कभी नहीं सोचा..
जो सोचा आज तीन दिन के बाद..

सांझ में इतनी उदासी क्यूँ है?
हर सुबह इतनी बासी क्यों है?
दिन ढलना, सांझ होना,
बेवजह हँसना, बेवजह रोना.
यह सब कुछ पहले कभी नहीं सोचा..
जो सोचा आज तीन दिन के बाद..

अहा! खारे पानी की वो मिठास
सख्त दाढ़ी की छुवन का वो एहसास
मैंने कभी समन्दर नहीं देखा..
कभी उस दिल को छूकर नहीं देखा
ये सब कुछ मैंने पहले तो कभी नहीं सोचा
जो सोचा है मैंने आज तीन दिन के बाद

हाँ मैंने सोचा है ये सब आज...
जब सुनी है पिता की आवाज
आज तीन दिन के बाद.......

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद


7 comments:

डॉ. मोनिका शर्मा said...

अहा! खारे पानी की वो मिठास
सख्त दाढ़ी की छुवन का वो एहसास
मैंने कभी समन्दर नहीं देखा..
कभी उस दिल को छूकर नहीं देखा
ये सब कुछ मैंने पहले तो कभी नहीं सोचा
जो सोचा है मैंने आज तीन दिन के बाद

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अमित.... बहुत सुंदर ...पिता का प्यार अप्रदर्शित रहता है... इसलिए समझने में देर लगती है....यूं ही लिखते रहें... शुभकामनायें

चैतन्य शर्मा said...

पापा को लेकर कितनी प्यारी कविता लिखी है....
फोटो तो बहुत ही अच्छा लगाया है...

Akshita (Pakhi) said...

पापा होते ही इत्ते प्यारे हैं..सुन्दर कविता.

नवरात्र और दशहरा...धूमधाम वाले दिन आए...बधाई !!

mansha said...

bahut khoob...............touchy lines..........keep it up

संजय भास्कर said...

बहुत खूबसूरत ब्लॉग मिल गया, ढूँढने निकले थे। अब तो आते जाते रहेंगे।

meetu srivastava said...

सांझ में इतनी उदासी क्यूँ है?
हर सुबह इतनी बासी क्यों है?
दिन ढलना, सांझ होना,
बेवजह हँसना, बेवजह रोना.
यह सब कुछ पहले कभी नहीं सोचा..
जो सोचा आज तीन दिन के बाद..

waah waah ....itni khoobsurat shuruvat kavita ki to kavita kyu n sundar hogi ....
man ko bhav-vihval kar diya aapki is kavita ne ... bahut sundar

Amit Tiwari said...

धन्‍यवाद मीतू जी.. आप हमारे ब्‍लॉग तक आए.. पहले तो इसके लिए ही आपका आभार.. और फिर कविता की प्रशंसा के लिए धन्‍यवाद..

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