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'ये मंदिर भी ले लो, ये मस्जिद भी ले लो.'

अब हर बात से डर लगने लगा है. हर बात मजहबी होने लगी है. क्या क्या नहीं बाँट दिया हमने. 'इश्वर अल्ला तेरो नाम' की परंपरा में जीने वाले राष्ट्र में कब हर बात ईश्वर और अल्ला के बन्दों के बीच बाँट दी गयी, पता ही नहीं लग पाया. बस पता चला तो यही कि अब सब कुछ बंट चुका है. 
हर बात का मजहबी बंटवारा कर लिया. रंगों ने अपनी तासीर नहीं बदली लेकिन इंसानों से रंग बाँट लिया. हरा है तो मुस्लिम है, केसरिया है तो हिन्दू है. फूलों ने अपनी फितरत नहीं बदली लेकिन हमने फूल बाँट लिए. गुलाब किसी उर्दू शायर के हाथ लग गया तो कमल किसी मंदिर के पुजारी के हाथ. 
क्या-क्या नहीं बाँट लिया इस इन्सान ने. दिशायें बाँट ली. पहनावा बाँट लिया. ढंग बाँट लिया. रहन-सहन बाँट लिया. और फिर एक दिन धरती और आकाश भी बाँट लिया. 
एक लकीर ने दो भाइयों को इतना अलग कर दिया. 
आज किसी को ये नहीं सोचना पड़ रहा है कि यह सब कहने के पीछे मेरा प्रयोजन क्या है. क्योंकि हर किसी को कारण पता है. और दुःख भी यही है कि अब इन सब बातों को सकारण ही कहा जाता है. कोई उन्माद उठने की तैयारी हो रही हो तभी ये बातें भी याद आती हैं. 
आज जब आप ये पढ़ रहे होंगे तो मन में अदालत के फैसले की अपनी-अपनी कल्पना होगी. 
मंदिर-मस्जिद के नाम का शोर मचाया जा रहा है. पिछले कुछ दिनों से ऐसी तैयारी की जा रही है मानो कोई युद्ध होने को है. अथाह सुरक्षा बल झोंक दिए गए हैं. अखबार और चैनल लगातार यही दिखा रहे हैं. हर तरफ स्थिति कुछ ऐसी बन रही है, कि मानो अगर कोई बलवा नहीं हुआ तो आश्चर्य की बात हो जाएगी. कुछ ना कुछ होना अवश्यम्भावी है. 
आज 30 तारीख है. दो दिन बाद ही एक अहिंसा मूर्ति का जन्मदिवस भी है, लेकिन सब भूले हुए हैं. फुर्सत नहीं है कि कुछ देर सकारात्मक चर्चा भी कर लेते. हर व्यक्ति किसी ना किसी तरफ आग्रही होकर बोल रहा है. हर अख़बार चैनल अपने-अपने पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर मुद्दे को तूल दे रहे हैं. जब मामला न्याय का है, न्यायपालिका का है, तब फिर उसे इतना ज्यादा तूल देने का क्या औचित्य. क्या यह न्याय और न्यायपालिका की गरिमा को कम करने जैसा नहीं है. 
कुछ देर में फैसला आ जाने की संभावना है. अपेक्षा यही है हर देश वासी से कि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना... 
धर्म के नाम पर धंधा करने वालों की दुकान बंद कर देने का वक़्त आ गया है. आज भी उसी तरह से अपनी जीवन चर्या में लगे रहकर हमें जवाब देना होगा इन तमाम बातों का. हमें दिखा देना होगा कि देश में शांति युद्ध के सापेक्ष में नहीं है, बल्कि यह स्वतःस्फूर्त शांति है. 

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद
(यह लेख "स्वराज खबर" के 30 सितम्बर के अंक में प्रकाशित हुआ है)

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