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Monday, January 4, 2016

सम-विषम दिल्ली (Odd-Even Delhi)



देश की राजधानी दिल्‍ली इन दिनों सम-विषम के कारण चर्चा में है। स्‍कूली पढ़ाई के दिनों में जिन बच्‍चों ने गणित को हाथ लगाने से तौबा कर ली थी, उन्‍हें भी आजकल गणित के इस मूल पाठ को याद करना पड़ रहा है। 
मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्‍व में आम आदमी पार्टी की सरकार ने राजधानी में पर्यावरण की चिंताजनक स्थिति को देखते हुए तारीख के आधार पर सड़क पर दौड़ने वाली गाडि़यों के निर्धारण की नीति साल की शुरुआत से लागू की है। व्‍यवस्‍था पूरी तरह प्रायोगिक स्‍तर ही लागू हुई है लेकिन चर्चा जोरों पर है। राज्‍य सरकार पहले दिन से ही अपनी पीठ थपथपाने में लगी है तो विरोधी व्‍यवस्‍था की कमियां गिनाने में व्‍यस्‍त हैं। आम जनता की ओर से मिली-जुली प्रतिक्रिया आ रही है। 
इस व्‍यवस्‍था को मुख्‍य तौर पर पर्यावरण की दृष्टि से लागू किया गया है लेकिन आम जनता इस व्‍यवस्‍था के तहत सड़क पर जाम से राहत और बसों के बढ़े फेरे को लेकर ज्‍यादा खुश है। वैसे भी प्रदूषण के इतने कारण हैं कि सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक चुनिंदा निजी गाडि़यों पर रोक लगाकर इस पर बहुत ज्‍यादा काबू पाने की उम्‍मीद करना भी बेमानी सा है। शुरुआती दिनों की रिपोर्ट भी यही कह रही है कि सड़कों पर गाडि़यां तो सम-विषम के हिसाब से ही चल रही हैं, लेकिन प्रदूषण के स्‍तर पर ज्‍यादा फर्क नहीं दिखा है। 

दूसरी ओर विरोधी इस व्‍यवस्‍था को लेकर तमाम तर्क दे रहे हैं। सबसे वाजिब तर्क है दिल्‍ली की परिवहन व्‍यवस्‍था का। सार्वजनिक परिवहन की व्‍यवस्‍था को मजबूत और सुगम किए बिना ऐसी कोई भी व्‍यवस्‍था लंबे समय तक कारगर नहीं हो सकती। केजरीवाल स्‍पष्‍ट कर चुके हैं कि यह अस्‍थायी व्‍यवस्‍था है और सफल रहने पर भी इसे स्‍थायी नहीं किया जा सकता। उनके इस बयान के पीछे की गहराई को समझा जा सकता है। राज्‍य सरकार भले ही अपनी पीठ थपथपाए लेकिन उसे भी इतना अंदाजा है कि हफ्ते-दस दिन के लिए ऐसी व्‍यवस्‍थाओं को लागू करने और उसे स्‍थायी करने में कितना फर्क है। बहरहाल, सड़क पर सार्वजनिक परिवहन के भरोसे चलने वाली जनता जाम मुक्‍त रास्‍ते और बढ़ी बसों से खुश है और उसे यह भी पता है कि यह सिर्फ चार दिन की चांदनी ही है।
- अमित तिवारी 

Wednesday, July 9, 2014

लड़की जैसी लड़की (Girl like a Girl)



'तन्‍मय, तू कुछ बोल क्‍यों नहीं रहा यार?' सौम्‍या ने झुंझलाते हुए कहा। तन्‍मय अब भी चुप था। 'तू आखिर मुझसे शादी क्‍यों नहीं करना चाहता? तू ही तो कहता है कि तू मुझसे बहुत प्‍यार करता है। मैं बहुत अच्‍छी हूं। तब आखिर हम शादी क्‍यों नहीं कर सकते?' कहते-कहते सौम्‍या रुआंसी हो गई। तन्‍मय, 'यार.... तू समझती क्‍यों नहीं? यू आर नॉट अ वाइफ मैटेरियल... अंडरस्‍टैंड दिस।'
सौम्‍या, 'मतलब... तू कहना क्‍या चाहता है?'
तन्‍मय, ' मैं सीधा ही तो बोल रहा हूं यार... तू अच्‍छी फ्रेंड है मेरी... मैं प्‍यार करता हूं तुझसे, लेकिन यू नो... तेरे अंदर वाइफ वाला मैटेरियल नहीं है। वो कहते हैं ना कि तुझमे वो लड़कियों वाली बात नहीं है।' तन्‍मय कहता रहा, 'वो... बस में सफर करते टाइम रुमाल से कभी होंठ, कभी माथे का पसीना पोंछना, शर्माना, पति का खाने पर इंतजार करना, साड़ी पहनकर इतराना... एंड सो ऑन...आई थिंक तू समझ रही है सौमी...'
तन्‍मय अपनी बात पूरी करके आइसक्रीम लेने चला गया था और सौम्‍या अब भी उसकी बातों का मतलब समझने की कोशिश कर रही थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ये वहीं तन्‍मय है जिसने एक दिन सौम्‍या को रोता देखकर कहा था, 'क्‍या यार सौमी... तू ये लड़कियों की तरह रोया ना कर। यू नो तेरी सबसे अच्‍छी बात कौन सी है... तू और लड़कियों जैसी नहीं है... वो बेवजह रोना-धोना, इमोशनली ब्‍लैकमेल करना लड़कों को... यू आर डिफरेंट... और इसीलिए तो मैं तुझसे इतना प्‍यार करता हूं।' गर्लफ्रेंड और वाइफ का फर्क उसे अब समझ आने लगा था।

- अमित तिवारी
दैनिक जागरण 

Sunday, May 11, 2014

क्योंकि वो निर्भया नहीं हैं (They are not nirbhaya)



आबरू की कीमत भी हर जगह बराबर नहीं होती. उसमें भी नफा-नुकसान का अलग-अलग गणित लगाया जाता है. यही वजह है कि मोमबत्तियां लेकर कोई जुलूस आगे नहीं बढ़ रहा है. जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे भी नहीं लगाये जा रहे हैं. मीडिया के पास भी ये सब दिखाने का वक़्त नहीं है. सोफेस्टिकेटेड यूथ के पास इनके समर्थन के लिये मोमबत्तियां जलाने का वक़्त नहीं है. क्योंकि ये सब निर्भया नहीं हैं.
ये उन दलित लड़कियों की दास्तान है, जिनके साथ कुछ गलत होना हमें झकझोरता नहीं है. म्हारा देस हरियाणा के नारे लगाने और खुद को बेहद हिम्मती बताने वाले लोगों की इस कायराना हरकत पर बोलने की हिम्मत किसी में नहीं हो रही है. हिसार में दलित परिवार की लड़कियों का बलात्कार कोई घटना नहीं है. उनकी आवाज को दबाने की कोशिश और उनके परिवार वालों की प्रताड़ना कोई खबर नहीं है. पीड़ित लड़कियां दिल्ली में अपने लिये न्याय मांग रही हैं. और मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं है कि उन्हे कभी कोई न्याय मिलेगा. न्याय उनके लिये  और वो न्याय के लिये बनी ही नहीं हैं. क्योंकि ये सब निर्भया नही हैं.

 - अमित तिवारी
सीनियर सब एडिटर
दैनिक जागरण

Wednesday, August 10, 2011

'रंग दे बसंती चोला' से 'चोली के पीछे क्या है' तक...(Independence Day)



स्वतंत्रता दिवस की जयंती आने वाली है! जयंती इसलिए कह रहा हूँ ताकि इसके जीवित रहने का भान बना रहे. बचपन से ही बड़ा उत्साह सा रहा है इसके प्रति. सुबह-सुबह नहा-धोकर स्कूल के लिए निकल पड़ना..उस दिन स्कूल ज्यादा आनंद दायक लगता था, क्योंकि उस दिन बस्ता ले जाने की पाबन्दी नहीं होती थी, ना ही पढने की और ज्यादा प्रतीक्षित तो वो लड्डू थे जो झंडा फहराने के बाद मिलते थे. थोडा बड़ा होते-होते भाषण देने की लत भी लग गयी थी, इसलिए ऐसे अवसरों का और भी बेसब्री से इंतजार रहने लगा था.
उन दिनों भाषण की तैयारी के बहाने ही सही, बड़े-बड़े देशभक्तों की कहानियां ध्यान से पढ़ा करता था. आश्चर्य होता था भगत सिंह, राजगुरु जैसे दीवानों के किस्से पढ़कर. और गांधीजी के 'सत्य के प्रयोग' ने तो मन ही मोह लिया था. मन में वही क्रांतिकारी तेवर करवट लिया करते थे और 15 अगस्त, 26 जनवरी के आसपास कुछ ज्यादा ही.
बात ज्यादा पुरानी भी नहीं है ये सब, यही कोई आठ-दस साल ही तो हुए हैं उस देशभक्त बचपन को बीते हुए. शनै-शनै अन्दर का देशभक्त खोने लग गया था, भाषण की आदत तो नहीं छूटी थी, मगर अब भाषण में मेरी आत्मा ना होकर एक लोकेशना का मोह ज्यादा रहने लगा था. धीरे-धीरे भाषण का मंच भी खो गया और मोह भी.
लेकिन आज अचानक सड़क पर पुलिस की बढ़ी हुई चहलकदमी देखकर याद आया कि 'दिवस' आने वाला है. एक अजीब सा तुलनात्मक भाव आ रहा है मन में.
खुद की तुलना खुद से करते हुए भी एक अंतर लग रहा है. आज में रह कर देखता हूँ तो वह देशभक्त सा बचपन स्वप्न लगता है और उस बचपन में जाकर देखता हूँ तो आज का सच वहशी लगता है.
और जब ये तुलना बाहर समाज में निकलती है तो दृश्य और भी भयावह हो जाता है. याद आ रही है वो 'मेरा रंग दे बसंती चोला' वाली किताबों में पढ़ी हुई पीढी. विश्वास नहीं होता कि कैसे हमारी ही उम्र के वो नौजवान इतना कष्ट झेल लेते थे देश के लिए?
जाने कैसे देश के लिए जान देने जैसी तत्परता थी उनके भीतर?
उतावलापन सा रहता था उनके मन में देश की स्थिति पर चिंतन करने और उसे सुधारने के लिए.
बेचैन रहते हर वक़्त आम मानुष के लिए. गाते तो देश, नाचते तो देश. खाते-पीते, सोते-जागते सिर्फ देश की बात......बचपन में उनकी कहानी पढ़ते-पढ़ते जोश में आकर गाया करता था 'मेरा रंग दे बसंती चोला,ओ माये रंग दे बसंती चोला....' और फिर मुझ जैसे कई देशभक्त गाने लगते थे अपनी-अपनी आवाज में.

अपनी देशभक्ति के अवसान काल में भी 

 "LOC kargil" फिल्म 

देखने का जज्बा सा जाग पड़ा. हाल पहुँच कर बड़ा सुकून मिला था. अच्छी खासी भीड़ थी देखने वालों की. लगा कि चलो देश मरा नहीं है. दर्शकों में ज्यादातर युवा ही थे, मेरी ही उम्र के आसपास के.
फिल्म चल पड़ी थी, मेरा उत्साह जोर मार रहा था. लेकिन युवा साथी कुछ शांत से लग रहे थे, लड़ाई का सीन शुरू होते ही सबकी चेतना वापस आने लगी थी. लेकिन अचानक हुए शोर से (हूटिंग कहते हैं) मैं थोडा सा चौंक गया था, कारण समझ नहीं आया था शोर का. फिर थोडी देर में पता लगा कि शोर कही गयी बातों पर नहीं हो रहा था, बल्कि तालियाँ तो उन शब्दों पर बज रही थीं जिन्हें "बीप-बीप" की आवाज में डायरेक्टर ने छुपा दिया था, शायद सेंसर के चलते. मगर मैं सोच रहा था कि अब सेंसर कहाँ गया..ना कहते हुए भी कह देने का तरीका भी तो है.
शोध कहते हैं कि सोशल नेट्वर्किंग साइट्स का इस्तेमाल करने वाले ज्यादातर युवा इनके जरिये ऐसे ही नए चलन में आये हुए स्टाइलिश शब्दों का आदान प्रदान करते हैं. "डेल्ही बेली" और "देव डी" की तारीफ इनकी जबान पर है.
बातें तो LOC की भी होती थी, लेकिन "बीप-बीप" की चर्चा ज्यादा थी.
ऐसे ही एक शोध के मुताबिक इन्टरनेट का इस्तेमाल कर रही पीढी का एक बड़ा हिस्सा अश्लील साइट्स के सर्च को प्राथमिकता में रखता है. अछूता मैं खुद भी नहीं रहा इस से. मगर इस सच ने अचानक झकझोर दिया है. मैं सोच रहा हूँ कि हम सब किस ओर बढ़ रहे हैं?
यह युवा पीढी, जिसके कन्धों पर आगे देश की बागडोर होगी, वह कहाँ खोयी हुई है?
पिछले सालों में और भी ऐसा ही बवाल मचा हुआ था 'सच का सामना', स्वयंवर और बिग बॉस जैसे धारावाहिकों को लेकर. 

जितनी निर्लज्जता के साथ निर्देशकों ने इन्हें पेश किया था, प्रतिभागी हिस्सा ले रहे थे, उतनी ही निर्लज्जता के साथ कुछ बुद्धिजीवी इसके समर्थन का राग भी अलाप रहे थे. तर्क दिया जा रहा था कि आखिर अमेरिका में भी तो यह धारावाहिक चलता है.

भैया अमेरिका में तो शादी की पाँचवीं सालगिरह मनाने की नौबत ही नहीं आती, लेकिन भारत में सात जन्मों का साथ निभता है.
तासीर का फर्क तो समझो अमेरिका और भारत की. वहां "माँ सिर्फ पिता की पत्नी होती है."

इया साल भी कहीं कुछ नया नहीं दिख रहा है. आज भी 'डेल्ही बेली' जैसी फिल्मो के समर्थन में ऐसे ही बेहूदा तर्क दिए जा रहे हैं. 
आश्चर्य है अब देश की चर्चा, मूलभूत समस्यायों की चर्चा करने के लिए किसी के पास समय ही नहीं बचा है.
हर साल की तरह फिर एक बार स्वतंत्रता दिवस आने वाला है. उत्साह हर रोज घटता जा रहा है. अब भगत सिंह पैदा तो होना चाहिए लेकिन हमारे घर में नहीं पडोसी के घर में.

'सरदार भगत सिंह के आखिरी उदगारपढ़ रहा था, यकीन ही नहीं होता कि जिस उम्र में साला हम एक खरोंच से डर जाते हैं, उसी उम्र का वो बन्दा कितनी बेफिक्री से अपने मरने के तरीके सुझा रहा था ब्रिटिश सल्तनत को. हमें बेकार की लफ्फाजियों से फुर्सत नहीं और भगत सिंह पूरी दुनिया को अर्थशास्त्र सिखा रहे थे.
जब सारा देश महात्मा गाँधी का पूजा की हद तक सम्मान कर रहा था तब कैसी बेबाकी और साफगोई से सुखदेव ने उन्हें पत्र लिखकर अपना और क्रांतिकारियों का पक्ष रखा और अपने लिए माफ़ी की बात खारिज कर दी..
पता नहीं किस मिटटी के बने थे वो? या शायद इस पीढी की मिट्टी ख़राब हो गयी है. !!
मंहगाई, भूख, बेरोजगारी, लूट, बलात्कार सब कुछ तो है, बस अगर कुछ नहीं है तो वो है इन बातों पर चिंतन करने और इन्हें ख़त्म करने वाली जमात. 'डेल्ही बेली' पर तो बहस है लेकिन इन जमीनी मुद्दों पर कहीं चूं भी नहीं है.
सब खोजने में लगे हुए हैं चोली के पीछे के राज को..
'रंग दे बसंती चोला' से 'चोली के पीछे क्या है' तक के इस सफ़र में देश कहाँ चला गया और कब चला गया, पता ही नहीं चला.
कब मेरे भीतर का भारत मर गया, मैं सोचकर अनुत्तरित हूँ.
कैसे "वन्दे मातरम" की सेज बनने वाले होंठ "गालियों का गलीचा" बन गए?
कैसे चोले को उस रंग में रंगने की जिद में अड़ा हुआ मन चोली के पीछे का सच खोजने निकल पड़ा?
स्वतंत्रता दिवस कैसे पर्व से जयंती बन गया?


कौन जिम्मेदार है इस वैचारिक और नैतिक पतन का?
है कोई जवाब आपके पास मेरी इस उलझन का?
हो तो जरूर बताइयेगा.....
पड़ताल अभी जारी है..

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
अचीवर्स एक्सप्रेस 

Monday, April 25, 2011

भगवान नहीं रहे...!!! (God is Dead)


सत्यनारायण राजू उर्फ़ सत्य साईं बाबा की मृत्यु हो गयी. बाबा कहना तो उन्हें कमतर करके आंकना होगा. सत्य साईं भगवान नहीं रहे. 
भगवान क्यों हैं? इस पर कोई तर्क नहीं किया जाना चाहिए. क्यूंकि जहाँ आस्था की बात होती है वहां तर्क की गुंजाइश नहीं रह जाती है. ऐसे ही तर्कों से परे सत्य साईं भगवान का भी कारोबार चलता रहा है. 
देश के दोनों बड़े दल इस मुद्दे पर एक हैं. दोनों के सर्वेसर्वा उनकी मौत पर दुखी हैं. प्रधानमंत्री मनमोहन और राष्ट्रपति भी गहरे शोक में डूबे हैं. 
देश के एक और भगवान सचिन भी अपने भगवान के मरने के गम में नाश्ता छोड़कर बैठे हैं. उन्होंने खुद को होटल के कमरे में बंद कर लिया. समाचार चैनलों का कहना है कि भगवान की मौत से पूरा देश दुखी है. 
भगवान ने अपने जीवन काल में बहुत चमत्कार किये. लगभग हर वो चमत्कार जो कोई जादूगर कर सकता है. भारत के महान जादूगर पीसी सरकार ने एक बार उन्हें खुली चुनौती देते हुए कहा था कि वो एक बार उनके सामने अपने चमत्कार करके दिखाएं, वह अपने जादू से भी वह सब करके दिखा देंगे. लेकिन भगवान की हिम्मत नहीं हुई उस चुनौती का सामना करने की. 
वैसे कहा ऐसे भी जा सकता है कि कहाँ भगवान और कहाँ एक जादूगर की चुनौती.. इतनी छोटी चुनौती को स्वीकारते भी कैसे ?
भगवान काफी दिनों से बीमार चल रहे थे. समझ में ये बात नहीं आ रही है कि आखिर उनके भक्त उनके जीवन की रक्षा के लिए किस से प्रार्थना कर रहे थे?
भक्तों का दुःख मंतर-भभूत से दूर कर देने वाले भगवान को अस्पतालों और डॉक्टरों की जरूरत क्यों पड़ गयी? उनके लिए विदेश से डॉक्टर बुलाना पड़ा. 
वो भी ऐसे में जबकि उन्होंने खुद के मरने की उम्र भी 96 साल बताई थी. इस हिसाब से उन्हें अभी 2022 तक तो जीना ही था. तो क्या उनके भक्तों को उनकी भविष्यवाणी पर विश्वास नहीं था, जो सबके सब उनकी प्राणरक्षा में लग गए थे. और फिर क्या कारण रहा कि उन्हें अपनी भविष्यवाणी को झुठलाना पड़ गया? 
शायद कलियुग में बढ़ते पापों से उन्हें बोरियत होने लगी थी, इसलिए अस्पताल में बिस्तर पर पड़े-पड़े उन्होंने अपनी भविष्यवाणी संशोधित कर ली होगी, जिस पर किसी का ध्यान नहीं गया. 
या फिर ऐसा भी हो सकता है कि उन्होंने 11 साल की समाधी ले ली है, जिसे ये मूर्ख डॉक्टर सब मौत मान रहे हैं. 
सत्य साईं भगवान ऐसे बिना बताये कैसे मर सकते हैं.
उनके तमाम भक्तों को इस बारे में सोचना चाहिए कि कहीं यह उनकी समाधी का कोई प्रकार तो नहीं है..???

अच्छा अभी इधर एक और कयास भी लगाया जा रहा है... कि कहीं अस्पताल के वास्तुदोष के कारण ही तो भगवान को नहीं मरना पड़ा है ??? 
यह भी एक गम्भीर सवाल आ गया है.. वास्तुदोष भगवान को भी मार सकता है... 
तो अब इसके बाद वास्तु के जानकार लोगों का बाज़ार थोडा जोर पकड़ेगा.. 
भारत भगवानों का देश है... ज्यादा चिंता की बात नहीं है.. फिर कोई भगवान पैदा होगा.. 
तब तक सभी अस्पतालों के वास्तु-दोष ठीक कर लिए जाएँ ताकि अगले भगवान को वास्तु का शिकार न होना पड़े. 
मैं भी अपने कमरे का वास्तु ठीक करवा लेता हूँ... भगवान की पोस्ट खाली है...
क्यूंकि दुखी मैं भी हूँ... ये सोचकर कि "भगवान नहीं रहे..."


-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद


Tuesday, February 15, 2011

बेहया और बदमिजाज पीढ़ी (Generation Next.???)



अचानक से मन थोडा व्यथित हो गया. एक खबर मिली कि एक लड़के ने दो हत्याएं महज इसलिए कर दी कि लड़की ने उसके प्रेम को अस्वीकार कर दिया था. लड़की के अस्वीकार से क्षुब्ध हुआ वह सीधे उसके ऑफिस पहुँच गया, जहाँ बीच-बचाव की कोशिश करते एक लड़का भी मारा गया और लड़की का भी गला उस उन्मादी युवक ने काट दिया.
जांच पड़ताल होगी. बहुत से बयान आयेंगे-जायेंगे. उस उन्मादी युवक को शायद सजा होगी या शायद अपने रसूख के दम पर वह निश्चिन्त होकर घूमता रहेगा.
वाद का विषय यह नहीं है. जैसा भी होगा वह नया नहीं होगा. दोनों ही तरह की बातें होती रहती हैं. पकडे जाकर सजा पाने वाले भी बहुत हैं... और रसूख और पहुँच के दम पर छुट्टा घूमने वाले भी. विषय है आज के युवाओं के अन्दर पलते इस रोष का. वरन इसे रोष कहना भी गलत ही है. रोष तो एक सकारात्मक शब्द है. यह मात्र उन्माद है. पथभ्रष्ट होते युवा एक गंभीर विषय बन चुके है. एक ऐसा विषय जिस पर कोई चर्चा भी नहीं है. जिस घटना का जिक्र है वह आज के समय में एक सामान्य घटना ही है. यह ऐसा सच है आज के समय का जिस से हर रोज रूबरू होना पड़ता है. हर रोज सुबह अखबार में ऐसी अनगिन घटनाएं देखने को मिल जाती हैं. हर रोज इतना कुछ देखने को मिल जाता है अपनी इस समकालीन पीढ़ी के बारे में कि मन उखड़ जाता है. यह पीढ़ी न अपनी बुद्धि का सही इस्तेमाल करना जानती है ना अपनी शक्ति का.. बुद्धि का इस्तेमाल होता है तो द्विअर्थी संवाद करने में और शक्ति का प्रयोग होता है किसी गरीब और कमजोर पर. बात चाहे पैसा मांगने पर चाय वाले पर चाकू चलाने की हो या फिर कार से छू जाने पर रिक्शे वाले की हत्या कर देने का.. या फिर ऐसी ही किसी नृशंस घटना में उस शक्ति की परिणति होती है.
इसे शक्ति कहा जाए या फिर कायरता का ही नया रूप. जहाँ सच से सामना करने की शक्ति इतनी क्षीण हो गयी है इस पीढ़ी की कि वह उतावलेपन में कोई निर्णय नहीं ले पाने की हालत में रही है.
इस तथाकथित सभ्य और आधुनिक होती युवा पीढ़ी के और भी कई वाहियात रूप देखने को मिलते रहते हैं. शर्म आती है कि हम ऐसी पीढ़ी के समकालीन हैं. ऐसी पीढ़ी जो या तो घोर उन्मादी है या फिर फैशन के नाम पर अपाहिज और दोमुंही पीढ़ी.
ऐसी वाहियात जमात जिसे अपने समाज और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों से कोई सरोकार शेष नहीं है. शर्म आती है जब देखता हूँ कि एक तरफ जब मिस्र जैसे छोटे से अरब देश में जनता सड़क पर उतर कर 30 वर्षों के तानाशाही शासन को उखाड़ फेंकने में लगी है, तब यहाँ की दोगली जमात फेसबुक और ऑरकुट पर चुटकुलेबाजी और तस्वीर बांटने में लगी है. उसे गुस्सा आता है तब, जब लड़की उसका वासनाजनित प्रेम स्वीकारने से मना कर देती है या फिर कोई चाय वाला अपने हक के पैसे मांग लेता है.
जितना वक्त आज की यह तथाकथित आउन नॉर्म्‍स और सिविलाइजेशन को फॉलो करने वाली जमात खुद को संवारने और आइना देखने में बिताती है.. उतना वक्त शायद ही किसी सार्थक कार्य या चर्चा में बिताते हों.. यही कारण तो है कि आज सर्वाधिक युवाओं का देश भारत.. बीमार है.. क्रान्ति और देशभक्ति शब्द गाली जैसे लगते हैं इनके होंठों पर. अब इनका आदर्श भी फिल्मी परदे का अभिनेता होता है. क्रांति के लिए भी इन्हें अब किसी के अभिनय की ही जरूरत पड़ती है. अब ये सड़क पर तभी उतर सकते हैं जब इन्हें कोई ‘रंग दे बसंती’ या फिर ऐसी ही कोई फिल्म दिखाई जाए. कुछ ऐसी फिल्में देखकर ही इनके अन्दर क्रांति जन्म लेती है. और फिर जैसे ही दो शुक्रवार के बाद कोई हिस्स्स्स... या दबंग या तीस मारखां देख लेते हैं.. तुरंत इनके अन्दर की शीला जवान हो जाती है. सारी क्रांति ख़त्म.. इस संवेदन हीन पीढ़ी के मन में अब गजनी में आमिर खान की प्रेमिका के मरने पर तो संवेदना जागती है, लेकिन हर रोज भूख और बेबसी से मरते लाचार किसान और मजदूरों की खबर देख-पढ़कर नहीं जागती है.
बहस के लिए सबके पास इतना वक्त है.. लेकिन सार्थक विमर्श भी होना चाहिए.. इसकी किसी को चिंता नहीं है.. देश हमारा है.. लेकिन इसकी चिंता पडोसी के हाथ में है.. हम सबका चरित्रा यही रहता है.. चिंतन यही रहता है..
चेहरा देखकर तिलक करने की प्रवृत्ति है..
विमर्श के लिए कोई तैयार नहीं है. लोग खुद के प्रति ईमानदार होकर अपनी भूमिका का चयन नहीं कर रहे हैं आज के समय में.. इतने सब के बाद भी जब कोई कहता है कि मेरा भारत महान.. तो सच में कोफ्त होती है. जब यहाँ तरक्की के बड़े-बड़े आंकड़े सुनाये जाते हैं तब यह सब मात्रा आत्मप्रवंचना जैसा ही लगता है. लेकिन हमें सोचना होगा कि आत्मप्रवंचना करने से आत्मसंतुष्टि तो मिल सकती है.. लेकिन सत्य नहीं बदलता है...
देश की हालत क्या है? कितनी बीमार है.. ? ये तो सबको पता ही है.. लेकिन परेशानी यही है कि हम सच को स्वीकारने के बजाय आत्मप्रवंचना में लगे रहते हैं.. हम तो वो जमात है कि जिनके सामने कोई आकर देश के निवासियों को ‘स्लमडाॅग’ कहकर ‘आॅस्कर’ देकर चला जाता है और हम बेशर्मों की तरह ‘जय हो-जय हो’ कहते रहते हैं.
कभी कभी ये सब देखकर ऐसा लगता है कि जैसे बहुत बार थप्पड़ खाने से किसी का चेहरा लाल देखकर भी लोगों को लगता है कि उसके शरीर में खून बहुत है.. लेकिन हमें स्वीकारना चाहिए कि थप्पड़ मारकर गाल लाल कर लेने से ख़ून नहीं बन जाता है... देश की भी यही हालत है... इधर उधर के थप्पड़ से गाल लाल हो जाता है.. और सब लाल चेहरा देखकर खुश हो जाते हैं..
देश के सेहत का सच तो आज भी अस्थि-पंजर बना किसान-मजदूर ही है. और यहाँ के युवा का सच अखबारों की ऐसी ही सुर्खियाँ... बेहया और बदमिजाज पीढ़ी.


- अमित तिवारी 
समाचार संपादक 
निर्माण संवाद
(09266377199) 

Monday, February 7, 2011

आईने के सामने तकदीर संवारती पीढ़ी !! (This Visionless Generation..!!)




facebook पर आज फैशन के नाम पर चेहरा संवारने में लगी पीढ़ी को लेकर हो रही एक चर्चा हमने देखी. वहां जो कुछ बात हुई.. उसमे से काफी कुछ सार्थक लगा.. वही बातचीत आप सभी से साझा कर रहा हूँ..

Nilus Classes:- हमारे समाज में भी एक अलग समाज बसता है ..
ऐसी कुंदन काया वाले कोमल युवा आजकल व्यापक रूप से देखने को मिलते हैं!!
पता नहीं ये नस्ल आया कहाँ से ...
आते जाते बड़े स्टायल से hi, excuse me, hi, ok, hi करते हैं ..
इनके कान से अक्सर एक तार निकल कर मोबाइल या आई पोट से जुड़ा रहता है
इनको कोई गलती से धक्का मार दे तो ये तुनक कर कहते हैं " how mannerless". kisi ne sahi kaha hai...
''कोहनियों पर टिके हुए लोग..
सुविधाओं में बिके हुए लोग..
बरगद की करते हैं बात..
गमलों में उगे हुए लोग..'

Devansh Nuwal:- .(आप लोग कैसे किसी के पहनावे और उसकी रोजमर्रा की जिंदगी को देखकर ऐसा निर्णय ले सकते हैं. आप लोगों को इनसे कोई परेशानी है तो इसका ये मतलब नही है कि ये बुरे हैं. .. ये उस समाज में रहते हिं जिसके अपने नियम हैं और उसका पालन करते हैं.. आप सब अपने समाज में हैं और आपके अपने तौर-तरीके हैं... वो आपके तौर तरीके का पालन नही करते हैं इसका मतलब ये तो नही है कि वो गलत या बुरे हैं... इस बात से ऐसा नही लगता की आप लोग किसी पूर्वाग्रह में उस समाज को ऐसा कह रहे हैं...)


Nilus Classes:- मै विकृतियों की बात नहीं कर रहा हु ये वो नौजवान हैं जो सोलह श्रींगार करके घर से निकलते हैं...
ये वो हैं जो माँ बाप के लिए मेडिकल से दवाई लाने में इनकी माँ मरती है ... पर जिम जाकर अपनी बॉडी बनाते हैं किसी को इम्प्रेस करने के लिए

Amit Nagpal:-  (आप मुसलमान तो नही बॉस , क्यूंकि 99 % मुस्लिम गंदे बनकर रहने में विश्वास रखते हैं. आपके कहने का मतलब है कि जो साफ़ रहता है वो माँ की दवाई नही लता... जो जिम जाता है वो माँ-बाप की सेवा नही करता.. आपसे इसे बेतुकी बकवास की उम्मीद नही करते हम लोग. )

Nilus Classes:- ये किसने कहा कि 99 % मुसलमान गंदे बनकर रहने में विश्वास करते हैं. सबसे गन्दी तो ये सोच है. मेरे कहने का क्या मतलब आप समझ नही पाएंगे.. मै ये नहीं कह रहा हु की जिम जाने वाले माँ बाप का ध्यान नहीं रखते , मै तो एक मानसिकता की बात कर रहा हु, जहाँ दिखावा हमारे सामाजिक मूल्यों पर भारी पड़ रहा है
बोलने से पहले देख लीजिये की सन्दर्भ क्या है मैंने किसी किसी समुदाय विशेष पर टिपण्णी नहीं की है ...मै उस चलन की बात कर रहा हु जो समाज में फैशन के नाम पर फ़ैल रहा है .. ...

Amit Tiwari:- सही कह रहे हैं नीलू जी..
दरअसल फैशन के नाम एक ऐसी अपाहिज और दोमुंही पीढ़ी तैयार हो रही है, जिसकी पहचान कुछ इसी तरह की बन गयी है.
और इस सब से भी बदतर यह है जो कि आपने अभी यहाँ देखा कि किस तरह से बात के रुख को बदला जा सकता है...!!
कहाँ की बात को कहाँ पहुंचा दिया...?>??
जितना वक़्त आज की यह तथाकथित own norms and civilization को follow करने वाली जमात खुद को संवारने और आइना देखने में बिताती है.. उतना वक़्त शायद ही किसी सार्थक कार्य या चर्चा में बिताते हों... 

Nilus Classes:- बिलकुल यही अर्थ के साथ मैंने ये पोस्ट किया था, मैंने मेट्रो ट्रेन में कुछ लडको का हुलिया और बेशर्मी देखकर दंग रह गया .. कुछ बुजुर्ग थे जो अपने आपको असहज महसूस कर रहे थे .


Amit Tiwari :- जी.... यही कारण तो हैं कि आज सर्वाधिक युवाओं का देश भारत.. बीमार है..
यहाँ के युवा का आदर्श अब फ़िल्मी परदे का कोई अभिनेता होता है.. अब इनके अन्दर क्रांति लाने के लिए भी रंग दे बसंती या और ऐसी ही फिल्मो की जरूरत पड़ती है..
और जैसे ही दो शुक्रवार के बाद कोई हिस्स्स्स.. या दबंग देख लेते हैं.. सारी क्रांति ख़तम..
अब इनके अन्दर संवेदना गजनी में आमिर की प्रेमिका के मरने पर तो पैदा होती है.. लेकिन आत्महत्या करने वाले किसान की खबर देख-सुनकर इनकी संवेदना नहीं जागती है..

Nilus Classes :- असल में हम बड़ी बड़ी बातें तो जरुर कर लेते हैं पर उन छोटी छोटी बातों को जससे समाज खोखला हो रहा है नेगलेक्ट कर जाते हैं , ... अपना वजूद कितना खोखला है उसका एहसास आपने करा दिया

Amit Tiwari :- नीलू जी.. हमारी बात को समझने के लिए आपका धन्यवाद..
दरअसल यह ऐसा सच है जिस से हर रोज रूबरू होना पड़ता है..
हर रोज अखबार में इतना कुछ दिख जाता है अपनी इस पीढ़ी के बारे में कि मन उखड जाता है..
ये पीढ़ी न अपनी बुद्धि का सही प्रयोग करना जानती है न अपनी शक्ति का..
बुद्धि खर्च होती है द्विअर्थी संवाद करने में...और शक्ति आजमाते हैं किसी गरीब और नीरीह पर..
बात चाहे चाय के पैसे मांगने पर चाय वाले पर चाक़ू चलाने की हो.. या फिर कार से छू जाने पर रिक्शा चालक को मार डालने की..
सब का निहितार्थ एक ही निकलता है..
हम सब के सब इसी का हिस्सा हैं..
जहाँ एक ओर मिस्र में जनता विद्रोह सड़क पर कर रही है...
हम facebook पर चुटकुलेबाजी और तसवीरें बांटने में लगे होते हैं..
कोई सही बात कह दी जाय तो टिप्पणी करने वालों का अकाल रहता है...
बहस के लिए सबके पास इतना वक़्त है.. लेकिन सार्थक विमर्श भी होना चाहिए.. इसकी किसी को चिंता नही है..
देश हमारा है.. लेकिन इसकी चिंता पडोसी के हाथ में है..
हम सबका चरित्र यही रहता है.. चिंतन यही रहता है..
चेहरा देखकर तिलक करने की प्रवृत्ति है..
विमर्श के लिए कोई तैयार नही है..
प्रयास होने की सम्भावना कहीं दिखाई नही देती..
वही बात-- "मैं सच कहूँगा और हार जाऊंगा.. वो झूठ बोलकर भी लाजवाब होगा.. "

Nilus Classes :- आपने एक तीर से कई निशाने साधे हैं अमित जी,


Amit Tiwari :-निशाने भी कई नही हैं नीलू जी... निशाना तो बस एक ही है कि कैसे हम सब अपने भीतर के सड़े-गले और बजबजाते सच को समझकर किसी सार्थक बदलाव की ओर कदम बढायें..
"वादे-वादे जायते सत्यबोधः"

Nilus Classes:-  आजकल थोथे चने बहुत हो गए है


Amit Tiwari :-नीलू जी.. आप सही कह रहे हैं कि आजकल थोथे चने ज्यादा हो गए हैं... लेकिन अहमियत सब की होती है.. थोथा चना भी अगर अपने लायक ईमानदार भूमिका चुन ले तो सार्थक हो सकता है... इनका बेहतर इस्तेमाल चूल्हे की आग में किया जा सकता है..
जलते जल्दी हैं थोथे चने..
लेकिन समस्या यही है कि लोग खुद के प्रति ईमानदार होकर अपनी भूमिका का चयन नही कर रहे हैं आज के समय में.. 

-- Haryanaschoolofdramaknl Knl :-  मुझे तो तुम बीमार लगते हो जो इंडिया को बदनाम कर रहे हो. तुम्हे कमेन्ट करना ही बंद कर देना चाहिए. तुम गन्दगी फ़ैलाने लगे हो देश में)


Amit Tiwari :- सम्माननीय बंधुवर आत्मप्रवंचना करने से आत्मसंतुष्टि तो मिल सकती है.. लेकिन सत्य नही बदलता है...
देश की हालत क्या है? कितनी बीमार है.. ? ये तो सबको पता ही है.. लेकिन परेशानी यही है कि हम सच को स्वीकारने के बजाय आत्मप्रवंचना में लगे रहते हैं..
हम तो खुश हो जाते हैं जब कोई हमारे देश के निवासियों को "SLUMDOG " कहता है और फिर पूरी दुनिया के तथाकथित सभ्य लोग ओस्कर देते हैं...
हमारे सच बोलने से देश बदनाम होता है.. लेकिन उस ओस्कर से सम्मान बढ़ा था शायद...

Sachin Sharma:-  Haryanaschoolofdramaknl Knl ,,,,,,, जी....... इस पोस्ट या कोममेंट्स में ऐसा क्या दिखाई दे गया आपको ... जो गंदगी फैला रहा है ..। बोलने से पहले एक बार सोच लेना चाहिए की हम कह क्या रहे है ... बिना बात को समझे कमेंट फेक दिया बस ... भारत हमारा घर है ॥ और घर में कुछ गलत हो रहा हो तो उसकी आलोचना भी की जाती है .॥ उसमे सुधार का प्रयास भी किया जाता है ... सिर्फ खुद को आत्म संतुस्टी देकर जय हो जय हो बोलने से काम नहीं चलता ... और यहा सब अपने लोग है .... विचार विमर्श और विचारो का आदान प्रदान करना ही क्या आपको गंदगी फैलाना लग रहा है .... वाह जी ......वंदे मातरम जय हिन्द

Maahi Singh:- kya galat hai isme?


Amit Tiwari :-सचिन जी.. माही जी.. हमारी बात को समझने के लिए आपका आभार...
दरअसल होता क्या है कि बहुत बार थप्पड़ खाने से किसी का चेहरा लाल देखकर भी लोगों को लगता है कि उसके शरीर में खून बहुत है..
लेकिन हमें स्वीकारना चाहिए कि थप्पड़ मारकर गाल लाल कर लेने से ख़ून नही बन जाता है... देश की भी यही हालत है... इधर उधर के थप्पड़ से गाल लाल हो जाता है.. और सब लाल चेहरा देखकर खुश हो जाते हैं..
देश के सेहत का सच तो आज भी अस्थि-पंजर बना किसान-मजदूर ही है...


उपरोक्त बातों पर आप सभी की टिप्पणियां अपेक्षित हैं..
आप सभी की टिप्पणियों से ही सत्य और स्पष्ट हो सकेगा..


-अमित तिवारी 
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

Saturday, January 15, 2011

किसको गुनहगार लिखूं ???(Who is Sinner)

प्यार लिखूं, श्रृंगार लिखूं,
या बहते अश्रुधार लिखूं,
रोते-रोते जीत लिखूं या
हँसते-हँसते हार लिखूं.

ये कह दूं कि उसने मुझसे
वादे करके तोड़ दिए
या फिर मैं ही उसके दिल पर
अपना हर इक वार लिखूं..

जाने मैंने मारा उसको
या फिर खुद ही क़त्ल हुआ..
उसको अपना कातिल लिखूं
या खुद को गद्दार लिखूं

सपनो का वो शीशमहल, मैंने
ही रचा और आग भी दी.
अब जलते उसके सपने लिखूं
या वो आँखें लाचार लिखूं..

खुद ही हर अपराध किया,
और खुद ही न्यायाधीश बना..
न्याय-धर्म निभाऊं अब मैं,
या उसको गुनह-गार लिखूं..

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

Wednesday, January 5, 2011

दुनिया की मुन्नियों एक हो... (Let's think of Munni..)




सदी का पहला दशक बीतने को है. पिछली सदी में तरक्की की जिस गाथा की शुरुआत हुई थी, इस सदी में उसे बखूबी आगे बढाया जा रहा है. साहित्य, शब्द, उपमाओं और उद्धरणों में भी बदलाव लगातार जारी हैं. दो सदी पहले तक हमारा साहित्य संपन्न वर्ग के मनोरंजन का माध्यम मात्र था. राजाओं की बिरदावलियाँ और यशोगान मुख्य उद्देश्य हुआ करते थे. गाँव की चर्चा तभी थी जब उस गाँव में बुद्ध जाते थे. शबरी और भील तभी विषय बनते थे जब उनके पास राम पहुँचते थे. उस से ज्यादा साहित्य के विषयों से गाँव का सम्बन्ध नहीं था. गाँव तभी साहित्य का विषय बन पाता था जब वह आदर्श गाँव हो.
इस परिपाटी में आमूल-चूल परिवर्तन किया प्रेमचंद ने. प्रेमचंद की कहानी के नायक होरी महतो और बुधिया थे, तो नायिका रधिया या संतो. प्रेमचंद के इस प्रयोग का भारी विरोध भी हुआ था. साहित्य में रधिया-बुधिया के प्रवेश पर लोगों ने बहुत नाक-भौं सिकोड़ी थी.
फिर धीरे-धीरे बाजारवाद के रथ पर सवार इस सदी का आगाज हुआ. बाजार ने बेचना सिखाया. हर चीज को बाजार मिला. हर भावना और हर नाम को बाजार मिला. जो अच्छा कहा जाता रहा था उसका भी बाजार और जिस पर लोगों की नाक भौं सिकुड़ती थी उसको भी बाजार. रधिया-संतो पहले उपेक्षित थी, अब बदनाम हो गयी.
मुन्नी का वर्गीय चरित्र वही है. मुन्नी उसी गाँव की रधिया-संतो का ही तो प्रतिनिधित्व करती है. बाजार ने उसकी उपेक्षा और बदनामी को भी अलंकृत कर दिया है. मुन्नी अब ख़ुशी ख़ुशी बदनाम हो रही है और उसकी बदनामी को कुछ इस तरह से प्रायोजित किया जा रहा है कि हर मुन्नी को अपना लक्ष्य वही बदनामी में ही नजर आने लगा है. अब हर मुन्नी खुद को बदनाम करने के लिए तैयार है. उसे ये एहसास दिलाया जा रहा है कि बाजार में जगह पाने के लिए तुम्हे अपनी बदनामी को सार्वजानिक करना होगा.
लेकिन इसमें एक बात पर जरूर गौर किया जाना चाहिए कि आखिर बाजार प्रायोजित इस बदनाम मुन्नी के जरिये भी मुन्नी के वर्गीय चरित्र में कोई बदलाव लाने का प्रयास नही है. मुन्नी अभी भी उन्ही पारंपरिक मूल्यों में बंधकर बदनाम हो रही है. मुन्नी ने यह बदनामी भी अपने लिए नहीं बल्कि अपने प्रेम के लिए स्वीकार की है. अभी भी मुन्नी अपने डार्लिंग के लिए झंडू-बाम हो रही है. और उसे यह बता दिया गया है कि यह समर्पण ही तुम्हारा अंतिम लक्ष्य है. तुम्हे इसके लिए झंडू-बाम भी होना पड़ेगा और बदनाम भी, तभी तुम लगातार इस बाजार में बनी रह सकती हो. बाजार में किसी शर्मीली रधिया के लिए जगह नही है. बाजार का ही असर है कि किसी भी ऑफिस में ऐसी किसी रधिया के लिए कोई जगह नही है जो मुन्नी की तरह अपनी बदनामी को मंच नही दे सकती है.
मुन्नी की प्रतिरोधी शक्ति को ख़त्म कर दिया गया है. उसे डार्लिंग के लिए समर्पित भी होना होगा और बदनाम भी.
मुन्नी के ही साथ-साथ शीला भी जवान हुई है, लेकिन शीला की जवानी में और मुन्नी की बदनामी में बहुत बड़ा अंतर है. शीला शहर का प्रतिनिधित्व कर रही है. उसकी जवानी में स्वायत्तता है. वह अपनी जवानी को स्वतंत्र होकर जी रही है. उसे किसी के लिए बदनाम होने की इच्छा नहीं है. बाजार अपने सामंतवादी और शोषक नजरिये से बाहर नही निकल पाता है. वह शीला को बदनाम नहीं कर रहा है, बल्कि उसकी जवानी को स्वायत्त कर रहा है. उसे अपनी जवानी को जीने की स्वतंत्रता दे रहा है.
लेकिन मुन्नी हो या शीला, हैं दोनों ही बाजार के कब्जे में. क्यूंकि मुन्नी अगर झंडू-बाम है तो शीला एटम-बम है. दोनों किसी मेडिकल कंपनी की एम्.आर. की तरह काम कर रही हैं. मुन्नी की बदनामी से झंडू-बाम की बिक्री बढ़ी है और कल हो सकता है कि शीला की जवानी को भी वियाग्रा जैसी कोई कम्पनी पेटेंट करा ले. क्योंकि शीला के बाद अब हर मुन्नी शीला की जवानी के राज को खोजने के लिए तत्पर हो रही है. उसे भी स्वतंत्र जवानी की इच्छा है. बाजार यही चाहता है.
बाजार का लक्ष्य संस्कारिक अवधारणाओं को तोडना ही रहा है. चाहे मुन्नी को बदनाम करना पड़े, या शीला को जवान करना पड़े, बाजार की नजर अपने लक्ष्य पर केन्द्रित है.
एक समय में मार्क्स ने कहा था कि दुनिया के मजदूरों एक हो. सर्वहारा वर्ग को एक होने के लिए आह्वान किया गया था. तब सर्वहारा का एक वर्गीय चरित्र था. वाम रुझान के नेताओं ने तमाम अरसे तक वही नारा दिया. हालाँकि सर्वहारा को एक नही कर सके. उसका कारण भी था, बाजार ने सर्वहारा वर्ग को बाँट दिया. शहरी मजदूर और ग्रामीण मजदूर एक दूसरे से अलग हो गए. नतीजा यह रहा कि सर्वहारा का अपना कोई निश्चित वर्गीय चरित्र नही रह गया.
इसी तरह नारी समानता और नारी समता के नारों के बीच भी बाजार वही कर रहा है. अब उसे शीला और मुन्नी के बीच में बांटा जा रहा है. लेकिन अब समय आ गया है कि एक नारा दिया जाए. येचुरी और प्रकाश करात को अब 'सर्वहारा एक हो' की जगह 'मुन्नियों एक हो' का नारा देना चाहिए. और हर मुन्नी को यह समझाना होगा की शीला की जवानी में भी उसी मुन्नी की बदनामी के तार छुपे हैं.
बीता साल मुन्नियों के लिए एक सवाल छोड़ गया है. नए साल में हर मुन्नी के सामने अपनी बदनामी और शीला की जवानी में से किसी एक को चुनने का विकल्प बाजार ने रख दिया है.
अब देखना है कि मुन्नियाँ बाजार का विकल्प बनकर रह जाना चाहेंगी या फिर इस नए साल में कुछ नया होगा???

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

Tuesday, November 30, 2010

.. और वह चिरनिद्रा में सो गई (And she Passed away)




जैसे ही उसे चिंकी की खट्टी-मीठी गोलियों का राज़ और उस तथाकथित पुजारी के सच का पता चला, उसने मन ही मन अपना फैसला कर लिया, और मौका मिलते ही पत्थरों के जरिये अपना न्याय कर दिया. लेकिन अपने न्याय के कारणों को बताने के लिए उसके पास शब्द नहीं थे, इसीलिए उस रात उसे पिता के दो-चार थप्पडों के साथ ही भूखा ही सोना पड़ा.
ऐसी बहुत सी घटनाएं शशि के साथ अक्सर होती रहती थीं. गलत और अन्यायपूर्ण कृत्य देखना उसे पसंद नहीं था.
और सही?! सही तो शायद कहीं होता ही नहीं! कहानियों में अक्सर सुनती थी कि कहीं स्वर्ग है, जहाँ सब कुछ सही होता है, वहां सिर्फ अच्छे लोग होते हैं....! और अक्सर वो उस स्वर्ग कि कल्पना में खो जाया करती थी.
जब कहीं नारी समता की बातें पढ़ती तो उसे अपना गाँव मानो नरक लगने लगता था. बहुत जिद के बाद उसे शहर में आगे पढ़ने की इजाजत मिल पायी थी. मगर ये क्या!!! यहाँ भी तो उसका गाँव ही दिखाई दे रहा था चारो तरफ...थोडा रंग-बिरंगे शालीन कपडों में. यहाँ भी समता की वो ऊँची-ऊँची बातें सिर्फ बातों में ही थी, व्यवहार में नहीं. बड़ी मुश्किल से सामंजस्य बिठा पा रही थी वो. कभी-कभी सोचती थी कि या तो ये दुनिया गलत है या फिर वो गलत दुनिया में आ गयी है!!
बड़ी दीदी की शादी में उसने विरोध करने की कोशिश की भी, लड़का शराबी था, अनपढ़ और गंवार भी.
"लड़की हो लड़की की तरह जीना सीख लो, उतना ही बोलो जितना पूछा जाये."पिता ने सख्त लहजे में कहा. वो चुप हो गयी.
इस बार छुट्टियों में घर पहुंची तो बड़ी दीदी को आया देखा, रो रहीं थीं, माँ ने समझाते हुए दीदी को कहा था:-"बेटी कुछ भी हो जाए, ससुराल से लड़की की अर्थी ही उठती है. कैसे भी करके वहीँ रह लेना, नहीं रह पाओ तो आग लगा कर जल जाना, मगर मायके की ओर मत देखना." दीदी चली गयी.
मगर वो पूरी रात नहीं सो पायी, उसे लगा कि वो शायद सच में इस दुनिया के लायक नहीं है. फिर वो चिरनिद्रा में सो गयी,. अब वो स्वर्ग में है..जहाँ सब कुछ अच्छा है. वो शायद उसी दुनिया के लिए बनी थी, क्योंकि इस दुनिया में तो हमने उसे कभी चैन से सोने ही नहीं दिया, जब तक वो सो नहीं गयी.
आखिर हम कब जागेंगे? अभी और कितनी 'शशियाँ' चिरनिद्रा में सोने के लिए मजबूर की जाती रहेंगी?

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

'स्‍त्री-सम्‍मान और मैं' - मेरा अन्‍तर्मन (My Conscience)


अकारण ही... आज अकारण ही मन अपने अन्‍दर के खालीपन को स्‍वीकारना चाह रहा है। शब्‍द - अर्थ और फिर अर्थ्‍ा के भीतर के अर्थ। कितना ही छल भरा है मन में।
सच को स्‍वीकारने का साहस होता ही कब है। कब स्‍वीकार पाया हूँ अपने अर्थों के भीतर के अर्थ को। कई मर्तबा स्‍वीकार भी किया, तो ऐसी व्‍यंजना के साथ, कि सुनने वालों ने उस स्‍वीकारोक्ति को भी मेरी महानता मानकर मेरे भीतर के उस सत्‍य को धूल की तरह झाड़ दिया।
ऐसा ही एक सत्‍य है, 'स्‍त्री-सम्‍मान और मैं'। स्‍त्री होना ही पूर्णता है। स्‍त्री स्‍वयं में शक्ति का रूप है। स्‍त्री - शक्ति का सम्‍मान करना ही नैतिकता है। स्‍त्री का अपमान करना, निष्‍कृष्‍टतम् पाप है।
इन बातों का ऐसा प्रभाव हुआ, कि मैं भी स्‍त्री-शक्ति को विशेष रूप से खोजकर, उनका सम्‍मान करने लगा। अक्‍सर सड़क किनारे से गुजरते हुये ये ख्‍याल आ जाता था कि काश कोई सुन्‍दर स्‍त्री-शक्ति लड़खड़ाये, और मैं दौड़कर उसकी सहायता और सम्‍मान कर सकूं। काश यह मुझ अकेले की बात होती. 
सोच रहा हूँ कि आखिर स्‍त्री-सम्‍मान के लिये इतनी बातों और इतने प्रयासों की आवश्‍यकता ही क्‍यूँ आन पड़ी ?और फिर इनका अपेक्षित परिणाम क्‍यूँ नहीं मिला ? क्‍यूँ स्‍त्री - सम्‍मान की सहज भावना नहीं पैदा हो पाई इस मन में ? क्यों सहायता से पहले सूरत देखने की इच्छा आ जाती है? क्‍यूँ मुझ जैसे अधिकतर युवाओं में 'सुन्‍दरतम् स्‍त्री-शक्ति का अधिकतम् सम्‍मान' की भावना बनी रही ?
क्‍यूँ शक्तिहीन और सौन्‍दर्यविहिन के प्रति सहज सम्‍मान-भाव नहीं जागृत हो सका मन में ?
इन प्रश्‍नों का उत्‍तर अभी भी अज्ञेय ही है।
भीतर के इस सत्‍य का कारण, समाज से चाहता हूँ।
उत्‍तर अभी प्रतिक्षित है।

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

(तस्वीर गूगल सर्च से साभार)

दोधारी तलवार: कैसे बचेगी पूजा??(Double-edged sword)




पूजा, हरीश की पत्नी. एक सुन्दर-सुशीला गृहिणी. पिछले कुछ दिनों से पड़ोस में रहने वाले लड़के, विनय के आचरण से थोडा परेशान सी थी. जब विनय की हरकतें बढ़ने लगी, तो एक दिन पूजा ने परेशान होकर अपने पति हरीश को सारी बात से अवगत कराया.
पति-पत्नी इस बात को लेकर परेशान थे. फिर उन्होंने अपने पहचान के एक विश्वसनीय व्यक्ति रामबाबु से इस बात को लेकर विमर्श किया. रामबाबु ने पूजा से कहा,"अरे, ये भी कोई बात है...? ये बताओ, जब उसने तुम्हे पहली बार परेशान किया, तब तुमने उसे डांटा था?"
"जी..नहीं तो....मैंने सोचा शायद खुद ही मान जाए..लेकिन जब नहीं माना, तो फिर मैंने इनको बता दिया.." पूजा ने मासूमियत से जवाब दिया..
"यही तो...तुम सब भी ना...अरे तुमने उसे ढंग से डांटा तो होता..उसकी क्या मजाल, दुबारा तुम्हे कुछ बोल देता..बिना मतलब हरीश को परेशान कर दिया...ये कोई हरीश को बताने वाली बात थी!!? इस से तो तुम खुद भी निबट सकती थीं..." रामबाबू ने पूजा को समझाते हुए कहा.
यद्यपि फ़िलहाल जो समस्या बन गयी है, उसका कोई हल नहीं है उनके पास....

(2)
पूजा, हरीश की पत्नी. एक सुन्दर-सुशीला गृहिणी. पिछले कुछ दिनों से पड़ोस में रहने वाले एक लड़के, विनय के आचरण से कुछ परेशान थी. पूजा ने एक दो बार उसे डांटा भी. फिर जब एक दिन उसकी हरकत ज्यादा बढ़ गयी, तो पूजा ने गुस्से में आकर उसे थप्पड़ मार दिया. विनय हतप्रभ सा वहां से चला तो गया, लेकिन उस थप्पड़ के लिए बदले की भावना उसके मन में आ गयी थी. उसने मोहल्ले के कुछ असामाजिक तत्वों के माध्यम से पूजा के दामन पर कीचड उछालने का प्रयास किया. बात बढ़ने लगी तो पूजा ने हरीश को सभी बातों से अवगत कराया. पति-पत्नी दोनों परेशान थे. फिर उन्होंने अपने एक पहचान के विश्वसनीय व्यक्ति रामबाबू के साथ बैठकर इस बात पर विमर्श किया.
"हम्म..क्या कर दिया तुमने...? ये बताओ जब उसने पहली बार तुम्हे परेशान किया था, तब तुमने हरीश को बताया था..?" रामबाबू ने पूजा से पूछा.
"जी नहीं तो..मैंने ही डांट दिया था उसे.. मैंने सोचा मान जायेगा.. फिर उस दिन जब हरकत ज्यादा हो गयी, तो गुस्से में मैंने थप्पड़ मार दिया...मुझे क्या पता था कि. ..." पूजा ने सफाई देते हुए कहा.
"यही तो...तुम सब भी ना...बोलो, हरीश को क्यों नहीं बताया...? दो चार फिल्में देखकर तुम लोगों को हिरोइन बनने का शौक लग जाता है...तुम्हे क्या लगता है, ये आजकल के बच्चे तुम्हारे थप्पडों से डर जायेंगे क्या?? हरीश को बताया होता शुरुआत में ही, तो ये दिन तो ना देखना पड़ता..अब बोलो...क्या होगा?" रामबाबू ने पूजा को समझाते हुए कहा.
यद्यपि जो समस्या सामने आ गयी है, उसका कोई हल नहीं है उनके पास..

अब मैं ये सोच रहा हूँ, कि पूजा को करना क्या चाहिए?
उसका तो कोई भी कदम समाज के हिसाब से ठीक नहीं है..
इस दोधारी तलवार से बचने के लिए पूजा क्या करे??
आखिर कब तक पूजा को ही हर बात का दोषी ठहराया जाता रहेगा?
है कोई जवाब इस समाज के पास?

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

Monday, November 22, 2010

प्रेम के नए सृजनात्‍मक तौर तरीके (Creative techniques of Love)


एक वक़्त हुआ करता था कि जब हर जगह फर्स्ट हैण्ड का बोलबाला और मांग हुआ करती थी. उस वक़्त में प्रेमी-प्रेमिका भी फर्स्ट हैण्ड ही खोजे जाते थे. प्रेम में कोई विशेष रासायनिक-भौतिक शर्ते नहीं हुआ करती थीं. उस वक़्त में लड़कियां अपनी सहेलियों को बताया करती थीं कि मेरा प्रेमी तो किसी लड़की की तरफ आँख उठाकर देखता भी नहीं. मुझसे पहले उसने किसी लड़की के बारे में सोचा भी नहीं. लड़के भी कुछ इसी तरह अपनी प्रेमिका की तारीफ करते थे.. 
उस वक़्त में लड़कों को किसी लड़की से प्रेम सम्बन्ध शुरू करने के लिए कुछ ख़ास मशक्कत नहीं करनी होती थी. लड़की के सामने कुछ साधू जैसे बनके रहो. उसकी सहेलियों की तरफ भी नज़र उठाकर नहीं देखना. ये सब कुछ अच्छे लड़कों की पहचान होती थी. किसी तरह उस लड़की से दोस्ती के बाद जब बात धीरे धीरे प्रेम के इजहार तक पहुंचती थी तो बस कुछ गिने-चुने ही संवाद हुआ करते थे. वो बिल्कुल शराफत से कहा करता था कि -'प्रिये तुम मेरी जिंदगी की पहली और आखिरी लड़की हो, मैंने तो कभी तुम्हरे सिवा किसी दूसरी लड़की कि तरफ आँख उठाकर देखा भी नहीं कभी. तुम्ही मेरा पहला और आखिरी प्रेम हो.' हर लड़के को ये संवाद याद हुआ करते थे. 
कई बार तो हम में से कई लड़के हर बार यही संवाद बोल कर काम चला लेते थे. बीसवीं बार भी हम यही कहते थे. हम जब भी करते पहला और सच्चा प्रेम ही करते. हमारी गिनती कभी भी पहले से आगे नहीं बढती थी. ना ही कभी हमारे प्रेम की सच्चाई कम होती थी. हमेशा उतना ही सच्चा प्रेम करते थे. 
हमारी बीसवीं प्रेमिका भी हमें इतना ही पहला और सच्चा मानती थी जितना कि हमारी पहली प्रेमिका ने माना था. 
सब कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था. सबके पास पहले और सच्चे प्रेमी प्रेमिका हुआ करते थे. लेकिन फिर अचानक से ग्लोबलाइजेशन (वैश्वीकरण) के कारण बाज़ार ने अपनी तस्वीर बदल ली. सेकंड पार्टी और थर्ड पार्टी का चलन बढ़ने लगा. अब लोगों को लगने लगा कि नयी 'मारुती -800 ' लेने से बढ़िया है कि अगर उसी रेट में कहीं से बढ़िया सेकंड हैण्ड एस-कोडा या होंडा सिटी मिल जाए तो क्या बुराई है. जैसे जैसे बाज़ार ने अपनी रंगत बदली तो हर जगह की रंगत बदलने लगी. बल्कि अब तो बाज़ार की हालत तो ये गयी कि कोई नयी कार भी ले तो लोगों को लगता है कि झूठ बोल रहा है. 
अब प्रेमी भी कुछ ऐसे ही खोजे जाने लगे. अब धीरे धीरे ये हालत हो गयी कि अगर कोई लड़का कहता कि मैंने तुम्हारे सिवा किसी की ओर नज़र उठा के देखा ही नहीं, तो लड़की उसकी आँखें टेस्ट करवाने निकल पड़ती कि कहीं नज़रें कमजोर तो नहीं हैं. जैसे ही कोई बंदा ऐसा साधू जैसा दिखता है तो लड़की सोचती है कि या तो फरेब कर रहा है, नहीं तो कोई रासायनिक-भौतिक कमी होगी. कॉलेज में पहुँच चुका लड़का किसी भी लड़की के फेर में ना पड़ा हो, ऐसा तो सोचकर भी आश्चर्य होने लगा. अब तो कोई लड़का बेचारा सही का भी साधू हो तो भी शक की ही नज़र से देखा जाने लगा. लड़कों के सामने भयानक मंदी का दौर छा गया. 
बाज़ार की मांग के हिसाब से नयी रणनीतियां जरूरी हो गयी थीं. अब तो पहली और आखिरी कहना जैसे कोई गुनाह सा हो गया था. 
अंततः नयी रणनीतियां भी सामने आ ही गयीं. अब लड़कों ने पहली-आखिरी कहना छोड़ दिया. अब वो खुद ही अपने पहले प्रेम के किस्से सुनाने लगे. इसके लिए बाकायदा प्लाट तैयार किया जाने लगा. 
पहले लड़की से दोस्ती करो. उसकी सहेलियों वगैरा से भी कोई खास डरने की जरूरत नहीं रही. सबसे खुल के बोलो बात करो. फिर एक दिन यु ही अचानक से किसी बात के बीच में गंभीर हो जाना. बस इतना कहना- "... तुम जब ऐसे कहती हो ना.. तो.. अक्चुअली (दरअसल) ... खैर छोड़ो... " बस इतना कहकर चुप हो जाना. अब लड़की भला ऐसे कैसे छोड़ दे?? एक दोस्त होने के नाते पूछना तो पड़ेगा ही. वो भी उत्सुकता के वशीभूत होकर जिद करती है-"बताओ तो क्या बात है. अपने दोस्त को भी नहीं बताओगे?" एक दो बार टालकर फिर लड़का अपनी कहानी बता देता है, बात के बीच में एक दो बार आँख पर रुमाल या हाथ जरूर फेर लेता है.  और फिर उस दिन वो बिना कोई और बात किये कुछ उदासी के साथ विदा लेके चल देता है. 
इस सब में दो-तीन तरह के सेन्ट्रल आईडिया की कहानी होती है. या तो पहले वाली कहानी की लड़की दुनिया से गुज़र गयी, या फिर किसी दूसरे शहर चली गयी,  या उसकी शादी हो गयी या फिर आखिर विकल्प ये कि बेवफाई कर गयी. लड़के के ही किसी दोस्त के साथ वफ़ा निभाने लगी. लड़का बेचारा एक दम दूध का धुला हुआ उसकी बेवफाई में तड़प रहा होता है. उसे सहानुभूति की सख्त जरूरत होती है. हालाँकि वो सहानुभूति से भी इंकार करता है. वो कहता है कि उसने उसके बाद किसी दूसरी लड़की की तरफ देखा ही नहीं. दिल या मन जो भी हो.. वो करता ही नहीं .. 
अब तो किसी और लड़की के बारे में सोचता भी नहीं है. ऐसा ही और भी कुछ-कुछ. इस सब में एक बात पक्की है कि पहली कहानी वाली लड़की किसी भी हालत में उस शहर में नहीं होती है जिस शहर की लड़की को कहानी बताई जा रही होती है. 
हालाँकि सुनने वाली लड़की इतना दिमाग नहीं लगाती है. वो भावनाओं में बह रही होती है. उसे दो बातें समझ में आ जाती हैं, एक तो ये कि लड़के में कोई कमी नहीं है, वो प्रेमी बनने की काबिलियत रखता है. दूसरा ये कि लड़का बहुत सही भी है. ईमानदार है, जो कि उसने अपनी पिछली बात खुद ही बता दी. कुछ भी नहीं छिपाया. विश्वास के काबिल है. दिल का मारा है. किसी लड़की ने बेवफाई की है. और फिर इस तरह से सहानुभूति के रूप में नए प्रेम का सृजन होता है. कभी कभी लड़का पहली कहानी में खुद को भी दूध का धुला नहीं साबित करता है. बल्कि वो कहता है कि वो गलत था, लेकिन अब उसे अपनी गलती का एहसास है और वो प्रायश्चित की आग में जल रहा है. उसकी तो हंसी भी गम को छुपाने का तरीका है. इस सब में बड़े-बड़े शायरों की मेहनत भी बहुत काम आ जाती है. कुल मिलाकर इस तरह से एक नए प्रेम का सृजन होता है.
यही नहीं...
नए प्रेम के सृजन का एक और भी बहुत तेजी से उभरता हुआ और कामयाब तरीका भी आ गया है. ये वो तरीका है जो कि हमने यहाँ इस्तेमाल किया है. 
अब ये भी एक सफल तरीका है कि लड़की के सामने खुद ही लड़कों की बुराई कर दो. सामने वाले की चादर को इतना गन्दा साबित कर दो कि तुम्हारी चादर खुद चमकदार लगने लगे. क्यूंकि ऐसा हुआ है. कभी कभार इस तरह की बात करने के बाद लड़की उल्टा हमसे ही प्रेम करने की इच्छुक हो बैठी. तो हमसे भी सावधान रहिये. 
हालाँकि यह सब पूर्ण सत्य नहीं है. लेकिन पूर्ण असत्य भी नहीं है. बस कहने का प्रयास यही है कि किसी पर भी विश्वास कीजिये.. लेकिन अन्धविश्वास नहीं.. 
FAITH IS GOOD... BUT BLIND FAITH IS HARMFUL..

अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

Tuesday, November 16, 2010

युवा : अंतहीन भटकाव की ओर ..


"युवा-शक्ति राष्ट्र की क्षमता का पैमाना होती है"
यह उक्ति स्वतः ही किसी राष्ट्र के युवाओं की महत्ता को व्यक्त करती है. युवा-शक्ति राष्ट्र की शक्ति का प्रतीक मानी जाती है. राष्ट्र के समृद्धि का द्योतक मानी जाती है. ऐसे में यदि किसी राष्ट्र की कुल जनसँख्या की पचास प्रतिशत से अधिक युवा-शक्ति हो, तो उस राष्ट्र का विश्व के समृद्ध और अग्रणी राष्ट्रों में सम्मिलित ना होना, लगातार कई दशकों से विकासशील राष्ट्र कहा जाते रहना, निश्चय ही उस राष्ट्र की युवा-शक्ति तथा उसकी क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाता है. ऐसा ही एक अनुत्तरित प्रश्न लग गया है अपने राष्ट्र हिंदुस्तान के युवाओं पर भी. 
पचास प्रतिशत से अधिक युवाओं का भारत देश आज भ्रष्ट राष्ट्रों की सूची में गिना जाता है. भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी जैसी ना जाने कितनी लिप्साओं में हमारा राष्ट्र अग्रणी माना जाता है. आज युवाओं का एक बड़ा वर्ग बड़ी शान से कहता है - "सौ में नब्बे बेईमान, फिर भी मेरा भारत महान" और फिर इस मसखरी पर खीसें-निपोरने वाले मसखरों की एक लम्बी फेहरिस्त है. इन सबके बीच राष्ट्र भाव कहाँ लुप्त हो जाता है, इस बात का किसी को भान ही नहीं रहता. 
आज का युवा वर्ग राष्ट्र की अवधारणा से शून्य हो चुका है. आज युवा नैतिकता शब्द का अर्थ जानने-समझने की इच्छा नहीं रखता. उसे इस बात से सरोकार नहीं है कि राष्ट्र की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर क्या है, लेकिन उसे भली-भांति पता है कि बॉलीवुड में इस वर्ष किस श्रेणी की कितनी फिल्में बन रही हैं. 
उसे नहीं पता कि इस वर्ष सरकार ने गन्ने के लिए कितना मानक मूल्य निर्धारित किया है, लेकिन उसे बड़े-बड़े मल्टीप्लेक्स में टिकट की कीमत पता है. उसे इस बात से मतलब नहीं होता कि हर रोज कितने गरीब भूख से बेहाल होकर दम तोड़ देते हैं, लेकिन उसे पता होता है कि ऐश्वर्या अपनी सुन्दरता के लिए खाने में क्या परहेज करती है. उसे नहीं पता कि उसके मुंह में निवाला पहुंचाने के लिए किसान कितनी  मेहनत करता है, लेकिन उसे पता है कि अपने शरीर-सौष्ठव को बनाए रखने के लिए ऋतिक रोशन कितने घंटे व्यायामशाला में रहता है. 
आज युवाओं के अंतर्मन से घटती नैतिकता, विचारों में बढती पाशविकता बहुत गहरा प्रश्न खड़ा करती है कि 'क्या युवा दिशाहीन हो गया है ?' 
कदापि नहीं!! युवा दिशाविहीन नहीं है, अपितु उसने एक गलत दिशा अख्तियार कर ली है. यदि कोई चौराहे पर खड़ा दिशाविहीन सा ये सोच रहा हो कि किस मार्ग पर जाना चाहिए तो उसे समझाकर सही दिशा दिखाई जा सकती है, परन्तु यदि कोई गलत मार्ग पर आगे बढ़ गया हो तो उसे सही रस्ते पर लाना दुष्कर होता है और आज युवा गलत मार्ग पर बहुत आगे बढ़ गया है.
आज युवाओं का बड़ा वर्ग दैहिक सुख, समृद्धि तथा मन के पाशविक विचारों की उत्तेजना में कुछ भी कर जाने को तत्पर है. जिसका साक्ष्य हर रोज समाचार पत्रों की सुर्खियाँ हैं जिनमे चोरी, लूट-पाट, मार-पीट, हत्या और बलात्कार जैसे समाचार वर्तमान निष्‍कृष्‍टता की निम्नतम हद को स्पष्ट करते हैं, जिनमे लिप्त एक बड़ा वर्ग युवाओं का ही है.
वर्तमान में नशाखोरी भी युवाओं में पसंदीदा शगल बन चुका है. सिगरेट के लम्बे कश में धुएं के छल्ले बनाकर राह चलती बालाओं पर फब्ती कसना, नशे में डूबकर देर रात पार्टियाँ करना आज के युवा की शान है. ऐसे में यदि इन सब महान उपलब्धियों के बाद हिंदुस्तान भ्रष्ट राष्ट्रों में शुमार है, तो क्या गलत है?
परन्तु यह सबकुछ लिखने का उद्देश्य मात्र लिखना ही नहीं है, बल्कि यह लिखना भी तभी सार्थक है कि यदि पढ़कर हम यह सोच सकें कि इन सबका कारण क्या है? क्यों है? और फिर उस कारण को दूर करने का प्रयास करें. 
जो भी हो इन सबके लिए दोषी हम स्वयं ही हैं. ये सब कुछ पढने-देखने वाले हम सब इसी युवा-पीढ़ी का हिस्सा हैं. हम सब या तो गलत हैं या फिर गलत के मूक-दर्शक. यदि हम अपने स्तर पर प्रयास करें तो परिवर्तन भी संभव है. यदि हम समाधान का हिस्सा नहीं हैं तो फिर हम खुद ही एक समस्या हैं.

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

Thursday, October 21, 2010

क्या होगा ?-(2)

मेरे किस्से (क्या होगा--(१)???) की पाकीजा अचानक एक सुबह मुझे टाऊन पार्क के बेंच पर बैठी मिल गयी. कुछ उदास सी लग रही थी. मैं पास गया तो उसने बिना पूछे ही मुझे बताना शुरू कर दिया कि जब चेहरा जलने और सुंदर ना रहने के बावजूद भी नज़रों ने उसका पीछा नहीं छोडा तो एक दिन उसने परेशां होकर अपनी इहलीला समाप्त कर ली.
मैंने कहा:-'तो ठीक है फिर अब उदास क्यों हो?'
वो बोली:-'मैं इसीलिए उदास हूँ कि आखिर मैंने ऐसा कदम क्यों उठा लिया, मरने जैसा? मैं नाराज़ हूँ अपने आप से कि आखिर इससे हुआ क्या?'
मैंने कहा:-'अरे भई, ठीक ही तो किया तुमने, एक अबला पाकीजा अपने पाक दामन को बचाए रखने के लिए मरने के सिवाय और कर भी क्या सकती है! और वो तुमने किया. तब फिर उदास होने या फिर खुद से नाराज़ होने वाली क्या बात है इसमें?'
मेरी बात सुनकर उसकी आवाज कुछ तेज़ हो गयी थी.
उसने कहना शुरू किया:-"आखिर क्यों? क्यों नहीं कर सकते हम और कुछ? कब तक हम ये कायराना कदम उठाते रहेंगे? आखिर मेरे मरने से भी किस्सा ख़त्म तो नहीं हुआ ना! आखिर आज भी तो पाकीजाओं के दामन उसी डर में जी रहे हैं, जिसमे जीते-जीते मैंने मरने जैसा कदम उठा लिया. क्या हो गया इससे?
अब पाकिजायें अबला नहीं बनी रह सकतीं. अब वो अपना चेहरा नहीं जलायेंगीं; बल्कि उन गन्दी नज़रों को देखने के काबिल ही नहीं छोडेंगी.
अब हमारे हाथ हमारे लिए फांसी का फंदा नहीं तैयार करेंगे बल्कि ये कारन बनेंगे उन् रावणों के संहार का जो सीता को महज सजावटी सामान समझकर उससे अपने महल की शोभा बढ़ाना चाहते हैं.
अब हम अबला नहीं बनी रह सकतीं."
कहते-कहते उसकी आँखें लाल हो आई थीं, मुझे लगा कि उसकी आँखों में कोई क्रांति जन्म ले रही है. उसकी बातों में एक दृढ़ता सी झलक रही थी और इस दृढ़ता से मुझे सुकून मिल रहा था.
तभी अचानक दरवाजे पर हुई किसी दस्तक से मेरी आँखें खुल गयीं, अख़बार वाला अख़बार दे गया था.
अखबार उठाते ही मेरी नज़र एक समाचार पर पड़ी -"लोकलाज के भय से एक बलात्कार पीडिता ने आत्महत्या की."
पाकीजा की सुखद बातों का भ्रम टूट चूका था.
मन यह सोचकर व्यथित है कि आखिर ये पाकीजायें कब तक अबला बनीं रहेंगी?
पाकीजाओं की इस कहानी का अंत क्या होगा???

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

Tuesday, October 19, 2010

पर्दा-बेपर्दा नाटक

पर्दा नाटक 
दृश्य -1 
महाराज 12 वर्षों के बाद वन से लौटे हैं. हर तरफ प्रसन्नता का माहौल है. मंच पर हर ओर दिए जल रहे हैं. लेकिन ये क्या..!! रनिवास से रोने की आवाजें आ रही हैं. 
महाराज- 'रानी! तुमने हमारे साथ विश्वासघात किया है. यह बालक हमारा नहीं है. तुमने हमारे प्रेम का अपमान किया है. '
महारानी- 'नहीं महाराज! यह सत्य नहीं है. कुंवर आपका ही पुत्र है. हमने आपके साथ कोई विश्वासघात नहीं किया है.' 
महाराज- 'हम कैसे विश्वास कर लें इस झूठ पर!!! रानी तुम पुत्रविहीन ही रहती, लेकिन कम से कम पर-पुरुष का पुत्र तो ना जनतीं..'
महारानी विलाप कर रही हैं. 

दृश्य - 2 
महारानी कुलदेवता के मंदिर में विलाप कर रही हैं.
महारानी- 'हे कुलदेवता! यह कैसा लांछन हमारे चरित्र पर आपने लगा दिया है? मैंने महाराज की प्राप्ति की कामना की थी. पुत्र की इच्छा की थी.. लेकिन इस मूल्य पर तो नहीं!!!
अब तुम्हें ही मेरे सतीत्व को सिद्ध करना होगा. आज अगर तुमने स्वयं मुझ पर लगे इस आरोप को नहीं हटाया तो मैं यहीं आपके मंदिर में अपने प्राण त्याग दूंगी.'
इतना कहकर महारानी ने वही मंदिर के पाषाणों पर अपना सर पटकना प्रारंभ कर दिया.
अंततः कुलदेव को प्रकट होना ही पड़ता है. कुलदेव स्वयं महारानी को सौभाग्य का वर देते हैं.

दृश्य - 3 
महाराज ने कुलदेव के मंदिर में साक्षात कुलदेव को देखा. राजन को अपनी भूल का एहसास हुआ. पश्चाताप के मारे वो रानी के पैरों में गिर पड़े. 
कुलदेव ने राजन को ज्ञान दिया. सब ख़ुशी-ख़ुशी महल लौट आये.

दृश्य - 4 
पूरे साम्राज्य में ढोल-नगाड़े की आवाजें गूंज रही हैं. महाराज ने कुंवर को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. 
पूरे साम्राज्य में कुंवर की तस्वीर छपे सिक्के बांटे गए. हर ओर खुशहाली लौट आई.

पर्दा गिरता है. लोग तालियाँ बजाते हैं. हर दर्शक अपने-अपने विचारों के हिसाब से नाटक का विश्लेषण करता है. 

बेपर्दा नाटक 
दृश्य - 1 
साजिद पूरे दो साल बाद शहर से आया है. 
आते ही अपनी नन्ही औलाद को गोद में लेकर झुलाने की बजाय उसने रुबीना पर इल्जाम लगाना शुरू कर दिया. 
साजिद- 'कुलटा! तूने ये क्या किया? मेरे साथ धोखा किया तूने' 
रुबीना- 'नहीं साजिद ये सच नहीं है. ये राहिल तुम्हारी ही औलाद है. मेरा यकीन करो.'
साजिद- 'दूर हट बेहया.. अरे तू कुछ भी जनती, मगर पराये मर्द की औलाद तो ना जनती..'
कहकर साजिद ने उसे लात से पीछे धकेल दिया. रुबीना रोती रह गयी.

दृश्य - 2 
रुबीना अपने कमरे में अकेली रो रही है. उसके हाथों में उसका खुदा है, जिसे नासमझ लोग जहर कहते हैं. अब उसे इसी से उम्मीद है. उसे यकीन है कि उसका खुदा उसे धोखा नहीं देगा.
अगले ही पल उसने उस जहर को अपने ज़ेहन में उतार लिया. 

दृश्य - 3 
रुबीना का स्याह शरीर फर्श पर पड़ा है. उसके कदमो में भी कोई है. कौन? राहिल.. उसे नहीं पता कि उसकी माँ का शरीर इतना रंगीन क्यों हैं. उसे तो स्याह-सफ़ेद का फर्क भी नहीं पता. 

दृश्य - 4 
शहनाई की आवाज आ रही है. साजिद ने दूसरा निकाह कर लिया है. हर ओर ख़ुशी है. ढोल-नगाड़े बज रहे हैं. 
लेकिन कहीं दूर से एक और भी आवाज आ रही है. राहिल की, जो अपनी माँ के कब्र पर बैठा रो-रोकर उसे बुला रहा है. उसे नहीं पता कि वहां से कोई लौटकर नहीं आता.
शाम गहराती जा रही थी. इस ओर ख़ुशी के दिए जल रहे हैं. राहिल के रोने की आवाज लगातार जारी है. कुछ देर में कुछ जंगली जानवरों की आवाज भी आने लगती है. थोड़ी देर बाद राहिल की आवाज खामोश हो गयी. 
वो शायद खुदा के फ़रिश्ते हैं जो उस मासूम को इस बेरहम दुनिया में रोता नहीं देखना चाहते थे. उन्हें पता है कि अगर वो इस दुनिया में रहेगा भी तो नाजायज होने का दर्द उसका जीना हराम कर देगा. शायद यही सोचकर वो जंगली जानवर के भेष में आये फ़रिश्ते उसे उस दुनिया में ले गए जहाँ उसकी माँ है. 
खुदा के पास...

इस बार पर्दा नहीं गिरता है. क्यूंकि इस सच और हमारे बीच कोई पर्दा है ही नहीं. 
मैं अचंभित हूँ. कोई मेरी इस कहानी पर तालियाँ भी नहीं बजाता. कोई चर्चा भी नहीं कर रहा है इस किस्से की. 
शायद किसी के पास वक़्त ही नहीं है बेपरदे के इस किस्से को देखने का...
और फिर वैसे भी ये किसी राजा-रानी की कहानी थोड़े ही है....!! 


- अमित तिवारी
संचार संपादक
निर्माण संवाद

क्या होगा? -(1)

यूं ही अचानक बैठे-बैठे मन में एक प्रश्न उठ रहा है, क्या होगा?
प्रश्न जितना छोटा है, उतना ही बड़ा इसका आयाम है. इस प्रश्न में घर, समाज, देश, दुनिया सब समाहित हो जाता है.
किस्से की शुरुआत होती है 'पाकीजा' से, एक साधारण परिवार की सुन्दर लड़की. और कभी-कभी तो लगता है कि ये जो दो शब्द हैं, 'साधारण' और 'सुन्दर' यही उसके जीवन के सबसे बुरे शब्द हैं, क्यूंकि आज की दुनिया में 'साधारण' परिवार की लड़की का 'सुन्दर' होना ही सबसे बड़ा अभिशाप है. पाकीजा इस अभिशाप से भला कैसे बच सकती थी? इसी का कारण था कि पाकीजा जैसे ही अपने घर से बाहर निकलती, तमाम वहशी नज़रें उसका पीछा करना शुरू कर देतीं. फिर दूर-दूर तक, चेहरे बदलते, गर्दनें बदलतीं मगर नज़रें नहीं बदलतीं.! ये नज़रें तब तक उसका पीछा करती थी जब तक कि वो फिर से घूमकर वापस घर की चारदीवारी में आकर बंद ना हो जाती.
ये रोज का सिलसिला था. इस रोज-रोज के दौर से परेशां होकर एक दिन पाकीजा ने एक गंभीर कदम उठा ही लिया, उसने अपने ही हाथों तेजाब से अपना चेहरा जला लिया. उसने सोचा कि अब वो सुंदर नहीं रहेगी, तो नज़रें उसका पीछा भी नहीं करेंगी.
मगर अफ़सोस!!!  ऐसा कुछ नहीं हुआ, नज़रों ने उसका पीछा करना नहीं छोडा, क्यूंकि वो अभी भी एक लड़की है. हाँ एक नयी बात जरूर हो गयी है कि अब कुछ हाथ भी सहानुभूति के नाम पर उसकी ओर बढ़ने लगे.
अब मैं ये सोच रहा हूँ कि बचपन में नैतिक शिक्षा की किताब में पढाई जाने वाली बड़ी-बड़ी नैतिकता की बातों का क्या होगा?
मनुष्य और मानवता जैसी अवधारणाओं का क्या होगा?
और सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि 'पाकीजा' का अगला कदम क्या होगा?
क्या वो खुद को मार लेगी?
और क्या उसके मर जाने से किस्सा ख़त्म हो जायेगा?
कभी नहीं!!!
क्यूंकि ये किस्सा किसी एक 'पाकीजा' का नहीं है!! ये किस्सा उन तमाम पाकीजाओं का है जिनके पाक दामन पर हर रोज गन्दी नज़रों के छींटे पड़ते रहते हैं और हर रोज एक छोटा सा प्रश्न खडा करते हैं- "क्या होगा??"

जारी.....

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

Sunday, October 17, 2010

एक अनुभव वैश्यालय का...

उन शातिर आँखों का मतलब समझते ही मैंने सौ-सौ के पांच नोट उसकी ओर बढा दिए और साथ ही अपनी 'पसंद' की ओर इशारा भी कर दिया था.
कुछ ही पलों में मैं अपने ख्वाबों की जन्नत में था. आज मैं अपने साथ के उन तमाम रईसजादों की बराबरी पर आ गया था, जिनके मुहँ से अक्सर मैं ऐसे किस्से नई-नई शब्द व्यंजनाओं के साथ सुना करता था. मेरे दिमाग में तमाम शब्द बन बिगड़ रहे थे; कल अपनी इस उपलब्धि की व्याख्या करने के लिए. हालांकि पहली बार होने के कारन मैं कहीं न कहीं थोडा असंयत सा अनुभव कर रहा था.
दरवाजे पर दस्तक होते ही जब मैंने नजरें उठाई तो अपलक निहारता ही रह गया. मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मैं अपनी सफलता के इतने निकट हूँ.
"फास्ट फ़ूड या मुगलई!?" अपने आप को सहज दिखाने का प्रयास करते हुए मैंने मजाकिया लहजे में कहा.
"नाम क्या है आपका?" सुस्पष्ट आवाज और सधे हुए वाक्य-विन्यास के साथ किये गए इस प्रश्न ने मुझे चौंका दिया.
"ज..जी..वो..सौरभ...सौरभ शुक्ला..."
"घबराइये मत, पहली बार आये हैं?"
"न....हाँ.."
"कहाँ रहते हैं?"
"यहीं......दिल्ली में."
"क्या करते हैं?"
"पढाई...इंजीनियरिंग...." मैं यंत्रवत सा उत्तर देता जा रहा था.
"परिवार ?"
"इलाहाबाद में, ....मम्मी-पापा."
"कितने पैसे दिए हैं बाहर?"
"पांच सौ..."
"कमाते हैं?"
"नहीं, ...पापा से लिए थे .....नोट्स के लिए..." मैंने अपराध स्वीकारोक्ति के लहजे में कहा.
अगले ही पल मेरे सामने पांच सौ का नोट रखा था. इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से मैं स्तब्ध रह गया.
उन होंठों की जुम्बिश अभी भी जारी थी, "हम अपने ग्राहकों से ज्यादा बात नहीं करते, ना ही हमें उनकी निजी जिंदगी में कोई दिलचस्पी होती है, फिर भी आप से दुआ कर रहे हैं, बचे रहिये इस जगह से. हमारी तो मजबूरी है, हमारी तो दुनिया ही यहीं है. पर आपके सामने पूरी दुनिया है. परिवार है. परिवार के सपने हैं, उन्हें पूरा कीजिये..
वैसे हम सिर्फ कह सकते हैं....आगे आपकी मर्जी..जब तक आप यहाँ हैं, हम आपकी खरीदी हुई चीज़ हैं..आप जो चाहे कर सकते हैं.."
मैं चुपचाप नजरें नीचे किये चलने को हुआ.
"पैसे उठा लीजिये, हमें लगेगा हमारी नापाक कमाई किसी पाक काम में इस्तेमाल हो गयी. वैसे थोडी देर रुक कर जाइए, ताकि हमें बाहर जवाब ना देना पड़े..!"
मैं रुक गया और थोडी देर बाद पैसे लेकर बाहर आ गया, लेकिन अपनी नम आँखों से मैंने अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर दी थी. मेरे जीवन में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आ चुका था. मुझे लगा शायद मैं ईश्वर से साक्षात्कार करके लौटा हूँ.
खैर जो भी था अच्छा था.
सच ही तो है, कहीं भी सब कुछ बुरा नहीं होता.

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद


Tuesday, October 12, 2010

यूज एंड थ्रो नहीं, सात जन्‍मों का सम्‍बन्‍ध

सभ्यता संकट में है. मानवीय सभ्यता ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण चराचर जगत ही खतरे में है. मानव के लिए मानव का मूल्य शून्य हो गया है. सभी 'वाद' पिट चुके हैं. बात चाहे 'मार्क्सवाद' की हो या 'पूंजीवाद' या 'साम्यवाद' की. किसी भी 'वाद' में जनाकर्षण नहीं शेष है. कोई भी 'वाद' समस्या का हल करता नहीं दिखता है.
कारण स्पष्ट है कि किसी  भी 'वाद' में 'जीवन-मूल्य' की चर्चा नहीं है. हर जगह 'जन-नायक'और 'लोक-नायक' की बात है. लेकिन यह मानवी सभ्यता किसी 'जन-नायक' या लोक-नायक' की नहीं वरन एक 'मित्र-नायक' की प्रतीक्षा में है. अब 'सुपर-पॉवर' नहीं 'सुपर पर्सन' की जरूरत है. वही 'मित्र-नायक' ही 'युग-नायक' बनेगा जिसके अन्दर विश्व से मैत्री और विश्वनाथ से प्रीति का भाव भरा होगा. विश्व भर में व्याप्त हिंसा का निवारण मैत्री और करुणा के भाव से ही हो सकता है. 'वसुधैव कुटुम्बकम' का ध्येय वाक्य हमें विश्व को बाज़ार नहीं वरन परिवार मानना सिखाता है.
हम बाज़ार नहीं बाजारवाद के विरोधी हैं. हमारी संस्कृति ने भी बाज़ार का समर्थन किया है. लाभ की बात हमने भी की है, लेकिन हमने 'शुभ-लाभ' की बात की है. हमारा लाभ भी शुभ से नियंत्रित है. 'लाभालाभ' की संस्कृति नहीं है हमारी. 'जो कमायेगा, वो खायेगा' की संस्कृति से विश्व का कल्याण संभव नहीं है. 'जो कमाएगा, वो खिलायेगा' की संस्कृति को जागृत करना होगा हर मन में. 'जियो और जीने दो' ही नहीं बल्कि 'जियो और जीने की प्रेरणा दो' सीखने की जरूरत है.
बढ़ते उपभोक्तावाद से उत्पन्न हुई समस्यायों का हल उपभोक्तावादी तरीकों से नहीं किया जा सकता है. पेड़ की पत्तियां छांटने की नहीं वरन समस्या को मूल से उखाड़ फेंकने की आवश्यकता है. आतंकवादी को मारने से आतंकवाद नहीं मरता है. 'बुरा व्यक्ति' हो या बुरे व्यक्ति का विरोधी, दोनों के अस्तित्व के लिए बुराई जरूरी है. बात चाहे 'सीआईए' की हो या 'आई एस आई' की, आतंकवाद दोनों की जरूरत है.
विषमता और गैरबराबरी को मिटाए बिना समस्यायों से नहीं लड़ा जा सकता है. बिना किसी 'भागवत व्यक्तित्व' के किसी 'वैश्विक नेतृत्व' की कल्पना बेमानी है. 'बुद्ध' चाहे भारत में हों या अमेरिका में, ऐसा नेतृत्व जिसके भीतर मैत्री, प्रीति और करुणा का भाव भरा होगा, जो संपूर्ण चर-अचर से एकात्म स्थापित कर सकता है, वही इस विश्व को बचा सकेगा. ऐसे किसी भी व्यक्तित्व के लिए एक मात्र मार्ग 'सम्बन्धवाद' ही है. सम्बन्ध-धर्म ही तमाम प्रश्नों का उत्तर बन सकता है.
आज विश्व को 'यूज एंड थ्रो' की नहीं 'सात जन्मो के सम्बन्ध' की दरकार है. तभी यह खुबसूरत दुनिया जीने के लायक बनी रह पायेगी.

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

जीती जा सकती है जंग भूख से ..

जब भारत जैसे देश को चावल - चीनी का आयात करने की आवश्यकता पड़ जाये। जब एक कृषिप्रधान देश में आत्महत्या करने वाले किसानों का आंकड़ा बढ़कर लाखों में पहुँच जाये। जब एकओर बुंदेलखंड जैसे तमाम हिस्सों में भुखमरी का दौर चल रहा हो और दूसरी जगह कहा जाए कि यह हमारी सामयिक समस्यायें हैं जिन्हें सुलझा लिया जायेगा। क्या स्थिति इतनी ही सहज औरसरल है?
किसानों की आत्महत्या का क्रम बरकरार है। खेती किसान के लिए घाटे का सौदा बन रही है। वह खेती करता है, क्योंकि वह कुछ और नहीं कर सकता है। वह जिन्दा है, क्योंकि मरा नहीं है। किसान उत्पाद का वाज़िब दाम न मिलने के कारण बदहाल है और सामान्य निम्नवर्गीय जनसंख्या खाद्यान्नों के बढ़ते मूल्यों के चलते भुखमरी के कगार पर खड़ी है। खेती बिचौलियों के लिए लाभ का माध्यम बन गयी है। उच्चवर्ग तमाम प्रश्नों और समस्याओं से बेखबर। एक ओर सकल घरेलु उत्पाद में कृषि का कम होता योगदान और दूसरी ओर
भुखमरी की विकराल होती समस्या। हाल ही में आई अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान (आईएफपीआरआई) की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत भुखमरी के मामले में 67वें स्‍थान पर है। आईएफपीआरआई और जर्मनी के कंसर्न वर्ल्डवाइड एंड वेल्टहंगरहिल्फे (सीडब्ल्यूडब्ल्यू) के संयुक्‍त तत्‍वावधान में जारी इस रिपोर्ट में 84 देशों की सूची है, जिनमें चीन 9वें, श्रीलंका 39वें और पाकिस्तान 52 वें स्थान पर हैं। इस सूची में देशों में शिशु मृत्यु दर, कुपोषण और भरपेट भोजन न पाने वालों की आबादी को आधार बनाया गया है।
समस्या सिर्फ भारत की नहीं है। भूख एक वैश्विक प्रश्न बन गया है। सयुंक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम ने अपनी एक रिपोर्ट में वर्तमान वैश्विक खाद्य समस्या को भूख की एक शान्त सुनामी का नाम दिया है। रिपार्ट के अनुसार खाद्य समस्या के कारण लगभग 40 मीलियन लोगों को अपना भोजन कम करना पड़ रहा है तथा विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग छठवां हिस्सा भुखमरी की चपेट में है।
तीसरी दुनिया के तमाम देश भुखमरी की हृदय विदारक स्थिति में जीने के लिए अभिशप्त हैं।
जहां एक ओर दुनिया की लगभग 17 फीसदी आबादी भूखी है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण की समस्या-समाधान के नाम पर चीन आदि विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश जैव ईधन का शिगूफा छेड़े हुए हैं। गरीब देशों की आबादी भूखी सोने के लिए विवश है और अमीर देशों की जमात अपने आराम के लिए जैव ईंधन के उत्पाद के लिए लाखों टन खाद्यान्न को जला डाल रही है। रोज लाखों टन मक्के का इस्तेमाल जैव ईंधन बनाने के लिए किया जा रहा है।
यह तस्वीर आखिर क्या बयान करती है। यही नहीं तस्वीर के और भी रुख हैं। भारत के प्रख्यात रिसर्चर और लेखक देवेन्द्र शर्मा ने एक बातचीत के दरम्यान स्थिति को स्पष्ट करते हुए तस्वीर के ऐसे ही एक रुख की ओर इशारा किया था। इस सत्य को स्वीकार किया जाना चाहिए कि विश्व में किसी भी प्रकार से अनाज की कमी नहीं है। एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की कुल आबादी 6.7 अरब है, जबकि विश्व में कुल मिलाकर लगभग 11.5 अरब लोगों की जरूरत का अनाज पैदा हो रहा है। सच यह है कि विश्व का एक भाग अधिक खाद्यान्न का इस्तेमाल कर रहा है, यहां तक की खाद्यान्न का इस्तेमाल जैव ईंधन तक बनाने में कर रहा है, जबकि दूसरी ओर एक बड़ा हिस्सा खाद्यान्न की कमी से जूझ रहा है। कमी खाद्यान्न की नहीं है बल्कि वितरण प्रणाली में कमी है। खाद्यान्न का विश्व में सही वितरण नहीं है। वैश्विक भुखमरी की समस्या से लड़ रहे तमाम वैश्विक संगठनों को यह सत्य स्वीकार करना होगा। खाद्यान्न वितरण पर कारपोरेट जगत तथा उच्च वर्ग के नियंत्रण को कम कर करके यदि खाद्यान्नों का पूरे विश्व में सही वितरण किया जाये तो भूख से यह जंग जीती जा सकती है।

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

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