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Tuesday, February 15, 2011

बेहया और बदमिजाज पीढ़ी (Generation Next.???)



अचानक से मन थोडा व्यथित हो गया. एक खबर मिली कि एक लड़के ने दो हत्याएं महज इसलिए कर दी कि लड़की ने उसके प्रेम को अस्वीकार कर दिया था. लड़की के अस्वीकार से क्षुब्ध हुआ वह सीधे उसके ऑफिस पहुँच गया, जहाँ बीच-बचाव की कोशिश करते एक लड़का भी मारा गया और लड़की का भी गला उस उन्मादी युवक ने काट दिया.
जांच पड़ताल होगी. बहुत से बयान आयेंगे-जायेंगे. उस उन्मादी युवक को शायद सजा होगी या शायद अपने रसूख के दम पर वह निश्चिन्त होकर घूमता रहेगा.
वाद का विषय यह नहीं है. जैसा भी होगा वह नया नहीं होगा. दोनों ही तरह की बातें होती रहती हैं. पकडे जाकर सजा पाने वाले भी बहुत हैं... और रसूख और पहुँच के दम पर छुट्टा घूमने वाले भी. विषय है आज के युवाओं के अन्दर पलते इस रोष का. वरन इसे रोष कहना भी गलत ही है. रोष तो एक सकारात्मक शब्द है. यह मात्र उन्माद है. पथभ्रष्ट होते युवा एक गंभीर विषय बन चुके है. एक ऐसा विषय जिस पर कोई चर्चा भी नहीं है. जिस घटना का जिक्र है वह आज के समय में एक सामान्य घटना ही है. यह ऐसा सच है आज के समय का जिस से हर रोज रूबरू होना पड़ता है. हर रोज सुबह अखबार में ऐसी अनगिन घटनाएं देखने को मिल जाती हैं. हर रोज इतना कुछ देखने को मिल जाता है अपनी इस समकालीन पीढ़ी के बारे में कि मन उखड़ जाता है. यह पीढ़ी न अपनी बुद्धि का सही इस्तेमाल करना जानती है ना अपनी शक्ति का.. बुद्धि का इस्तेमाल होता है तो द्विअर्थी संवाद करने में और शक्ति का प्रयोग होता है किसी गरीब और कमजोर पर. बात चाहे पैसा मांगने पर चाय वाले पर चाकू चलाने की हो या फिर कार से छू जाने पर रिक्शे वाले की हत्या कर देने का.. या फिर ऐसी ही किसी नृशंस घटना में उस शक्ति की परिणति होती है.
इसे शक्ति कहा जाए या फिर कायरता का ही नया रूप. जहाँ सच से सामना करने की शक्ति इतनी क्षीण हो गयी है इस पीढ़ी की कि वह उतावलेपन में कोई निर्णय नहीं ले पाने की हालत में रही है.
इस तथाकथित सभ्य और आधुनिक होती युवा पीढ़ी के और भी कई वाहियात रूप देखने को मिलते रहते हैं. शर्म आती है कि हम ऐसी पीढ़ी के समकालीन हैं. ऐसी पीढ़ी जो या तो घोर उन्मादी है या फिर फैशन के नाम पर अपाहिज और दोमुंही पीढ़ी.
ऐसी वाहियात जमात जिसे अपने समाज और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों से कोई सरोकार शेष नहीं है. शर्म आती है जब देखता हूँ कि एक तरफ जब मिस्र जैसे छोटे से अरब देश में जनता सड़क पर उतर कर 30 वर्षों के तानाशाही शासन को उखाड़ फेंकने में लगी है, तब यहाँ की दोगली जमात फेसबुक और ऑरकुट पर चुटकुलेबाजी और तस्वीर बांटने में लगी है. उसे गुस्सा आता है तब, जब लड़की उसका वासनाजनित प्रेम स्वीकारने से मना कर देती है या फिर कोई चाय वाला अपने हक के पैसे मांग लेता है.
जितना वक्त आज की यह तथाकथित आउन नॉर्म्‍स और सिविलाइजेशन को फॉलो करने वाली जमात खुद को संवारने और आइना देखने में बिताती है.. उतना वक्त शायद ही किसी सार्थक कार्य या चर्चा में बिताते हों.. यही कारण तो है कि आज सर्वाधिक युवाओं का देश भारत.. बीमार है.. क्रान्ति और देशभक्ति शब्द गाली जैसे लगते हैं इनके होंठों पर. अब इनका आदर्श भी फिल्मी परदे का अभिनेता होता है. क्रांति के लिए भी इन्हें अब किसी के अभिनय की ही जरूरत पड़ती है. अब ये सड़क पर तभी उतर सकते हैं जब इन्हें कोई ‘रंग दे बसंती’ या फिर ऐसी ही कोई फिल्म दिखाई जाए. कुछ ऐसी फिल्में देखकर ही इनके अन्दर क्रांति जन्म लेती है. और फिर जैसे ही दो शुक्रवार के बाद कोई हिस्स्स्स... या दबंग या तीस मारखां देख लेते हैं.. तुरंत इनके अन्दर की शीला जवान हो जाती है. सारी क्रांति ख़त्म.. इस संवेदन हीन पीढ़ी के मन में अब गजनी में आमिर खान की प्रेमिका के मरने पर तो संवेदना जागती है, लेकिन हर रोज भूख और बेबसी से मरते लाचार किसान और मजदूरों की खबर देख-पढ़कर नहीं जागती है.
बहस के लिए सबके पास इतना वक्त है.. लेकिन सार्थक विमर्श भी होना चाहिए.. इसकी किसी को चिंता नहीं है.. देश हमारा है.. लेकिन इसकी चिंता पडोसी के हाथ में है.. हम सबका चरित्रा यही रहता है.. चिंतन यही रहता है..
चेहरा देखकर तिलक करने की प्रवृत्ति है..
विमर्श के लिए कोई तैयार नहीं है. लोग खुद के प्रति ईमानदार होकर अपनी भूमिका का चयन नहीं कर रहे हैं आज के समय में.. इतने सब के बाद भी जब कोई कहता है कि मेरा भारत महान.. तो सच में कोफ्त होती है. जब यहाँ तरक्की के बड़े-बड़े आंकड़े सुनाये जाते हैं तब यह सब मात्रा आत्मप्रवंचना जैसा ही लगता है. लेकिन हमें सोचना होगा कि आत्मप्रवंचना करने से आत्मसंतुष्टि तो मिल सकती है.. लेकिन सत्य नहीं बदलता है...
देश की हालत क्या है? कितनी बीमार है.. ? ये तो सबको पता ही है.. लेकिन परेशानी यही है कि हम सच को स्वीकारने के बजाय आत्मप्रवंचना में लगे रहते हैं.. हम तो वो जमात है कि जिनके सामने कोई आकर देश के निवासियों को ‘स्लमडाॅग’ कहकर ‘आॅस्कर’ देकर चला जाता है और हम बेशर्मों की तरह ‘जय हो-जय हो’ कहते रहते हैं.
कभी कभी ये सब देखकर ऐसा लगता है कि जैसे बहुत बार थप्पड़ खाने से किसी का चेहरा लाल देखकर भी लोगों को लगता है कि उसके शरीर में खून बहुत है.. लेकिन हमें स्वीकारना चाहिए कि थप्पड़ मारकर गाल लाल कर लेने से ख़ून नहीं बन जाता है... देश की भी यही हालत है... इधर उधर के थप्पड़ से गाल लाल हो जाता है.. और सब लाल चेहरा देखकर खुश हो जाते हैं..
देश के सेहत का सच तो आज भी अस्थि-पंजर बना किसान-मजदूर ही है. और यहाँ के युवा का सच अखबारों की ऐसी ही सुर्खियाँ... बेहया और बदमिजाज पीढ़ी.


- अमित तिवारी 
समाचार संपादक 
निर्माण संवाद
(09266377199) 

Monday, February 14, 2011

यह कैसा प्रेम दिवस है??(Is it Love or Lust?)




आज फिर से प्रेम दिवस का शोर है. एक दिन प्रेम का... सोचकर आश्चर्य होता है कि भला प्रेम का कोई निर्धारित दिन कैसे हो सकता है? प्रेम कोई व्यापार तो नही है कि शुभ मुहूर्त देखकर किया जाए. प्रेम कोई क्षणिक भाव तो नही है जिसे किसी एक दिन के लिए सहेज कर रखा जा सके. आखिर यह कैसे संभव है कि साल भर में किसी एक दिन ही प्रेम की अभिव्यक्ति की जा सकती है.
लेकिन फ़िलहाल ऐसा ही हो रहा है.
कबीर कहते थे कि 'प्रेम न हाट बिकाय'.. लेकिन अब प्रेम हाट में बिकता है. बिक ही तो रहा है लगभग दो हफ्ते से. बाज़ार प्रेम से भरा हुआ है. जिसकी जितने प्रेम की औकात हो वह उतना प्रेम खरीद सकता है. प्रेमिका कीमती प्रेम की प्रतीक्षा में है.
कई प्रेमी उसी कीमत के दम पर ही प्रेम को खरीद लेने के लिए इस दिन का इंतजार करते देखे जा सकते हैं.
यही नही यह दिन अगर प्रेम के इजहार तक ही होता तो भी शायद कोई बात नही थी. अगर इस दिन सिर्फ तोहफों की कीमत और आकार तक ही बात रहती तो भी शायद कोई बात नही थी. सिर्फ चोकलेट और गुलाब की बिक्री और व्यापार की बात होती तो भी शायद कोई बात नही थी. मन मान ही लेता कि कोई बात नही व्यापार ही सही, होने दो इस प्यार को भी. लेकिन अभी बहुत चौंकाने वाले तथ्य सामने आये हैं. ऑनलाइन खुदरा व्यापार यसटुकंडोम के निदेशक शिशिर मिगलानी से एक बातचीत में पता चला कि इस प्रेम दिवस के इर्द-गिर्द कंडोम की बिक्री भी 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ जाती है. इनके ज्यादातर उपभोक्ता युवा होते हैं. इनमे से कई वह होते हैं जो कि इनसे सम्बंधित दिशा-निर्देश भी लेते हैं. अर्थात बहुत से वह होते हैं जो कि पहली बार इस में पड़ रहे होते हैं.
मन स्तब्ध है. किस प्रेम की दिशा में बढ़ रहे हैं युवा? यह प्रेम दिवस है कि वासना दिवस, इस पर भी सोचने की जरूरत है.
अच्छा एक और भी बात बहुत मजेदार है. इस प्रेम दिवस की शुरुआत कैसे हुई? संत वेलेंटाइन की याद में इस दिवस की शुरुआत हुई थी, जैसा कि कहा जाता है. वेलेंटाइन के सम्बन्ध में कोई विशेष प्रमाणिक तथ्य कहीं भी नही मिलते हैं जिस से कि यह सिद्ध हो सके कि उनकी शहादत के केंद्र में किसी प्रकार से प्रेम कारण था. वेलेंटाइन को लेकर कई तरह की कहानियां चलती हैं. उन्ही में से एक है कि तत्कालीन रोमन सम्राट क्लौडीयस द्वितीय ने अपने सैनिकों को विवाह नहीं करने देने की घोषणा की थी. उसका मानना था कि विवाह के बाद सैनिक का ध्यान और उसकी क्षमता कम हो जाता है. वेलेंटाइन चुपके चुपके सैनिको का विवाह कराया करते थे. और सम्राट को पता लगने पर उन्हें मार दिया गया. इस कहानी के कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नही मिलते हैं. इसके अतिरिक्त कुछ कहानियां हैं वेलेंटाइन को लेकर जिनमे ऐसा कुछ भी उल्लेख नही है. न ही उसमे कहीं से भी यह पता लगता है कि वेलेंटाइन कोई बहुत बड़े प्रेम के समर्थक थे. लेकिन समय के साथ साथ उनके उसी विरोध और उनकी शहादत के सम्मान में इस दिवस को मनाया जाने लगा. अब सोच ये रहा हूँ कि यह कैसा प्रेम दिवस है कि जिसका प्रादुर्भाव ही विरोध की कोख से हुआ है? क्या प्रेम का अर्थ विरोध है? क्या प्रेम घृणा के सापेक्ष में ही किया जा सकता है? शायद प्रेम के इसी सापेक्षिक रूप के कारण प्रेम के सापेक्ष में घृणा भी उसी दर से बढ़ रही है लगातार.
माना कि पश्चिम के पास बहुत कुछ ऐसा है भी नही कि जिसके बहाने वो खुद को बहला सकें, इसलिए वो जब इस प्रेम दिवस के पीछे पागल-पागल दिखते हैं तो ज्यादा आश्चर्य नही होता है. वहां देह आधारित प्रेम की ही परम्परा है. पश्चिम में इस देह प्रेम के दिवस को मनाये जाने के कारण हैं. लेकिन भारत में इसको मनाये जाने का कोई भी तो तार्किक कारण नहीं है.
अच्छा मान लीजिये प्रेम दिवस मनाया ही जाना है तो फिर कोई तार्किक दिवस क्यों न हो? कोई ऐसा दिवस क्यों न हो कि जिस के स्मरण मात्र से ही प्रेम आ जाए मन में. कि जिसका प्रादुर्भाव किसी विरोध की कोख से ना हुआ हो. वैसे तो हमारी परम्परा में पूरा बसंत ही प्रेम का प्रतिनिधित्व करता है. वासंती बयार और प्रेम में पगे हुए ना जाने कितनी ही कहानियां और गीत रचे गए हैं यहाँ. होली तो है ही प्रेम पर्व. फिर भी यदि प्रेम दिवस मनाने का मन है तो क्यों न शिवरात्रि को प्रेम दिवस माना जाय. शिव जिनके नाम से ही प्रेम का बोध हो जाता है. जिन्होंने प्रेम ही का संचार किया सम्पूर्ण जगत में. जो अपने भक्त के प्रेम में बसे तो उसके ही हो गए.
लेकिन अब ऐसा कहने में भी खतरा है. यह आधुनिक प्रेम दिवस घृणा का ऐसा मंजर तैयार कर चुका है कि इसकी चर्चा में प्रेम कम घृणा ज्यादा दिखती है. जैसे ही मैं कहता हूँ कि इसे मनाया जाना उद्देश्यविहीन है, तुरंत मुझे किसी संस्कृति के ठेकेदार से जोड़ कर देखा जाने लगेगा. तुरंत मुझे बजरंगी या शिवसैनिक घोषित कर दिया जायेगा. मैं उस वीभत्स विरोध का भी समर्थन नही करता, लेकिन इसको मनाये जाने के औचित्य पर प्रश्न जरूर खड़ा करता हूँ.
इस प्रेम दिवस पर 'कुछ' खरीदने से पहले एक बार प्रेम को जरूर याद कीजिये. क्या कहीं मन के किसी कोने में प्रेम शेष है?? और लगे कि हाँ प्रेम शेष है अभी जीवन में तो फिर इस प्रेम दिवस के औचित्य पर विचार जरूर कीजिये.
हैप्पी वेलेंटाइन डे.

- अमित तिवारी 
समाचार संपादक 
निर्माण संवाद
(09266377199) 

Monday, February 7, 2011

आईने के सामने तकदीर संवारती पीढ़ी !! (This Visionless Generation..!!)




facebook पर आज फैशन के नाम पर चेहरा संवारने में लगी पीढ़ी को लेकर हो रही एक चर्चा हमने देखी. वहां जो कुछ बात हुई.. उसमे से काफी कुछ सार्थक लगा.. वही बातचीत आप सभी से साझा कर रहा हूँ..

Nilus Classes:- हमारे समाज में भी एक अलग समाज बसता है ..
ऐसी कुंदन काया वाले कोमल युवा आजकल व्यापक रूप से देखने को मिलते हैं!!
पता नहीं ये नस्ल आया कहाँ से ...
आते जाते बड़े स्टायल से hi, excuse me, hi, ok, hi करते हैं ..
इनके कान से अक्सर एक तार निकल कर मोबाइल या आई पोट से जुड़ा रहता है
इनको कोई गलती से धक्का मार दे तो ये तुनक कर कहते हैं " how mannerless". kisi ne sahi kaha hai...
''कोहनियों पर टिके हुए लोग..
सुविधाओं में बिके हुए लोग..
बरगद की करते हैं बात..
गमलों में उगे हुए लोग..'

Devansh Nuwal:- .(आप लोग कैसे किसी के पहनावे और उसकी रोजमर्रा की जिंदगी को देखकर ऐसा निर्णय ले सकते हैं. आप लोगों को इनसे कोई परेशानी है तो इसका ये मतलब नही है कि ये बुरे हैं. .. ये उस समाज में रहते हिं जिसके अपने नियम हैं और उसका पालन करते हैं.. आप सब अपने समाज में हैं और आपके अपने तौर-तरीके हैं... वो आपके तौर तरीके का पालन नही करते हैं इसका मतलब ये तो नही है कि वो गलत या बुरे हैं... इस बात से ऐसा नही लगता की आप लोग किसी पूर्वाग्रह में उस समाज को ऐसा कह रहे हैं...)


Nilus Classes:- मै विकृतियों की बात नहीं कर रहा हु ये वो नौजवान हैं जो सोलह श्रींगार करके घर से निकलते हैं...
ये वो हैं जो माँ बाप के लिए मेडिकल से दवाई लाने में इनकी माँ मरती है ... पर जिम जाकर अपनी बॉडी बनाते हैं किसी को इम्प्रेस करने के लिए

Amit Nagpal:-  (आप मुसलमान तो नही बॉस , क्यूंकि 99 % मुस्लिम गंदे बनकर रहने में विश्वास रखते हैं. आपके कहने का मतलब है कि जो साफ़ रहता है वो माँ की दवाई नही लता... जो जिम जाता है वो माँ-बाप की सेवा नही करता.. आपसे इसे बेतुकी बकवास की उम्मीद नही करते हम लोग. )

Nilus Classes:- ये किसने कहा कि 99 % मुसलमान गंदे बनकर रहने में विश्वास करते हैं. सबसे गन्दी तो ये सोच है. मेरे कहने का क्या मतलब आप समझ नही पाएंगे.. मै ये नहीं कह रहा हु की जिम जाने वाले माँ बाप का ध्यान नहीं रखते , मै तो एक मानसिकता की बात कर रहा हु, जहाँ दिखावा हमारे सामाजिक मूल्यों पर भारी पड़ रहा है
बोलने से पहले देख लीजिये की सन्दर्भ क्या है मैंने किसी किसी समुदाय विशेष पर टिपण्णी नहीं की है ...मै उस चलन की बात कर रहा हु जो समाज में फैशन के नाम पर फ़ैल रहा है .. ...

Amit Tiwari:- सही कह रहे हैं नीलू जी..
दरअसल फैशन के नाम एक ऐसी अपाहिज और दोमुंही पीढ़ी तैयार हो रही है, जिसकी पहचान कुछ इसी तरह की बन गयी है.
और इस सब से भी बदतर यह है जो कि आपने अभी यहाँ देखा कि किस तरह से बात के रुख को बदला जा सकता है...!!
कहाँ की बात को कहाँ पहुंचा दिया...?>??
जितना वक़्त आज की यह तथाकथित own norms and civilization को follow करने वाली जमात खुद को संवारने और आइना देखने में बिताती है.. उतना वक़्त शायद ही किसी सार्थक कार्य या चर्चा में बिताते हों... 

Nilus Classes:- बिलकुल यही अर्थ के साथ मैंने ये पोस्ट किया था, मैंने मेट्रो ट्रेन में कुछ लडको का हुलिया और बेशर्मी देखकर दंग रह गया .. कुछ बुजुर्ग थे जो अपने आपको असहज महसूस कर रहे थे .


Amit Tiwari :- जी.... यही कारण तो हैं कि आज सर्वाधिक युवाओं का देश भारत.. बीमार है..
यहाँ के युवा का आदर्श अब फ़िल्मी परदे का कोई अभिनेता होता है.. अब इनके अन्दर क्रांति लाने के लिए भी रंग दे बसंती या और ऐसी ही फिल्मो की जरूरत पड़ती है..
और जैसे ही दो शुक्रवार के बाद कोई हिस्स्स्स.. या दबंग देख लेते हैं.. सारी क्रांति ख़तम..
अब इनके अन्दर संवेदना गजनी में आमिर की प्रेमिका के मरने पर तो पैदा होती है.. लेकिन आत्महत्या करने वाले किसान की खबर देख-सुनकर इनकी संवेदना नहीं जागती है..

Nilus Classes :- असल में हम बड़ी बड़ी बातें तो जरुर कर लेते हैं पर उन छोटी छोटी बातों को जससे समाज खोखला हो रहा है नेगलेक्ट कर जाते हैं , ... अपना वजूद कितना खोखला है उसका एहसास आपने करा दिया

Amit Tiwari :- नीलू जी.. हमारी बात को समझने के लिए आपका धन्यवाद..
दरअसल यह ऐसा सच है जिस से हर रोज रूबरू होना पड़ता है..
हर रोज अखबार में इतना कुछ दिख जाता है अपनी इस पीढ़ी के बारे में कि मन उखड जाता है..
ये पीढ़ी न अपनी बुद्धि का सही प्रयोग करना जानती है न अपनी शक्ति का..
बुद्धि खर्च होती है द्विअर्थी संवाद करने में...और शक्ति आजमाते हैं किसी गरीब और नीरीह पर..
बात चाहे चाय के पैसे मांगने पर चाय वाले पर चाक़ू चलाने की हो.. या फिर कार से छू जाने पर रिक्शा चालक को मार डालने की..
सब का निहितार्थ एक ही निकलता है..
हम सब के सब इसी का हिस्सा हैं..
जहाँ एक ओर मिस्र में जनता विद्रोह सड़क पर कर रही है...
हम facebook पर चुटकुलेबाजी और तसवीरें बांटने में लगे होते हैं..
कोई सही बात कह दी जाय तो टिप्पणी करने वालों का अकाल रहता है...
बहस के लिए सबके पास इतना वक़्त है.. लेकिन सार्थक विमर्श भी होना चाहिए.. इसकी किसी को चिंता नही है..
देश हमारा है.. लेकिन इसकी चिंता पडोसी के हाथ में है..
हम सबका चरित्र यही रहता है.. चिंतन यही रहता है..
चेहरा देखकर तिलक करने की प्रवृत्ति है..
विमर्श के लिए कोई तैयार नही है..
प्रयास होने की सम्भावना कहीं दिखाई नही देती..
वही बात-- "मैं सच कहूँगा और हार जाऊंगा.. वो झूठ बोलकर भी लाजवाब होगा.. "

Nilus Classes :- आपने एक तीर से कई निशाने साधे हैं अमित जी,


Amit Tiwari :-निशाने भी कई नही हैं नीलू जी... निशाना तो बस एक ही है कि कैसे हम सब अपने भीतर के सड़े-गले और बजबजाते सच को समझकर किसी सार्थक बदलाव की ओर कदम बढायें..
"वादे-वादे जायते सत्यबोधः"

Nilus Classes:-  आजकल थोथे चने बहुत हो गए है


Amit Tiwari :-नीलू जी.. आप सही कह रहे हैं कि आजकल थोथे चने ज्यादा हो गए हैं... लेकिन अहमियत सब की होती है.. थोथा चना भी अगर अपने लायक ईमानदार भूमिका चुन ले तो सार्थक हो सकता है... इनका बेहतर इस्तेमाल चूल्हे की आग में किया जा सकता है..
जलते जल्दी हैं थोथे चने..
लेकिन समस्या यही है कि लोग खुद के प्रति ईमानदार होकर अपनी भूमिका का चयन नही कर रहे हैं आज के समय में.. 

-- Haryanaschoolofdramaknl Knl :-  मुझे तो तुम बीमार लगते हो जो इंडिया को बदनाम कर रहे हो. तुम्हे कमेन्ट करना ही बंद कर देना चाहिए. तुम गन्दगी फ़ैलाने लगे हो देश में)


Amit Tiwari :- सम्माननीय बंधुवर आत्मप्रवंचना करने से आत्मसंतुष्टि तो मिल सकती है.. लेकिन सत्य नही बदलता है...
देश की हालत क्या है? कितनी बीमार है.. ? ये तो सबको पता ही है.. लेकिन परेशानी यही है कि हम सच को स्वीकारने के बजाय आत्मप्रवंचना में लगे रहते हैं..
हम तो खुश हो जाते हैं जब कोई हमारे देश के निवासियों को "SLUMDOG " कहता है और फिर पूरी दुनिया के तथाकथित सभ्य लोग ओस्कर देते हैं...
हमारे सच बोलने से देश बदनाम होता है.. लेकिन उस ओस्कर से सम्मान बढ़ा था शायद...

Sachin Sharma:-  Haryanaschoolofdramaknl Knl ,,,,,,, जी....... इस पोस्ट या कोममेंट्स में ऐसा क्या दिखाई दे गया आपको ... जो गंदगी फैला रहा है ..। बोलने से पहले एक बार सोच लेना चाहिए की हम कह क्या रहे है ... बिना बात को समझे कमेंट फेक दिया बस ... भारत हमारा घर है ॥ और घर में कुछ गलत हो रहा हो तो उसकी आलोचना भी की जाती है .॥ उसमे सुधार का प्रयास भी किया जाता है ... सिर्फ खुद को आत्म संतुस्टी देकर जय हो जय हो बोलने से काम नहीं चलता ... और यहा सब अपने लोग है .... विचार विमर्श और विचारो का आदान प्रदान करना ही क्या आपको गंदगी फैलाना लग रहा है .... वाह जी ......वंदे मातरम जय हिन्द

Maahi Singh:- kya galat hai isme?


Amit Tiwari :-सचिन जी.. माही जी.. हमारी बात को समझने के लिए आपका आभार...
दरअसल होता क्या है कि बहुत बार थप्पड़ खाने से किसी का चेहरा लाल देखकर भी लोगों को लगता है कि उसके शरीर में खून बहुत है..
लेकिन हमें स्वीकारना चाहिए कि थप्पड़ मारकर गाल लाल कर लेने से ख़ून नही बन जाता है... देश की भी यही हालत है... इधर उधर के थप्पड़ से गाल लाल हो जाता है.. और सब लाल चेहरा देखकर खुश हो जाते हैं..
देश के सेहत का सच तो आज भी अस्थि-पंजर बना किसान-मजदूर ही है...


उपरोक्त बातों पर आप सभी की टिप्पणियां अपेक्षित हैं..
आप सभी की टिप्पणियों से ही सत्य और स्पष्ट हो सकेगा..


-अमित तिवारी 
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

Friday, January 21, 2011

कुछ इस तरह से प्यार करता हूँ...(I love her....)




मैं उसे कुछ इस तरह से प्यार करता हूँ..
हर घडी उस प्यार को इंकार करता हूँ...

है उसे ये ही शिकायत कि बेवफा हूँ मैं...
पर मैं उस से वफ़ा बे-शुमार करता हूँ..

उसकी करीबी से कभी यूँ डर भी लगता है...
साथ उसके खुद को ही दीवार करता हूँ..

आंसू के मोती को हंसी के तार पर जड़ 
भाव के फूलों से मैं श्रृंगार करता हूँ..

आएगा वो फिर कभी तो रूठकर खुद से  
यूँ अपने हर अफ़सोस को लाचार करता हूँ..

एक दफा मैंने कहा था प्यार है तुमसे..
वो कह गया मैं 'भाव का व्यापार' करता हूँ

-अमित तिवारी
समाचार संपादक 
निर्माण संवाद

Saturday, January 15, 2011

किसको गुनहगार लिखूं ???(Who is Sinner)

प्यार लिखूं, श्रृंगार लिखूं,
या बहते अश्रुधार लिखूं,
रोते-रोते जीत लिखूं या
हँसते-हँसते हार लिखूं.

ये कह दूं कि उसने मुझसे
वादे करके तोड़ दिए
या फिर मैं ही उसके दिल पर
अपना हर इक वार लिखूं..

जाने मैंने मारा उसको
या फिर खुद ही क़त्ल हुआ..
उसको अपना कातिल लिखूं
या खुद को गद्दार लिखूं

सपनो का वो शीशमहल, मैंने
ही रचा और आग भी दी.
अब जलते उसके सपने लिखूं
या वो आँखें लाचार लिखूं..

खुद ही हर अपराध किया,
और खुद ही न्यायाधीश बना..
न्याय-धर्म निभाऊं अब मैं,
या उसको गुनह-गार लिखूं..

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

Wednesday, January 5, 2011

दुनिया की मुन्नियों एक हो... (Let's think of Munni..)




सदी का पहला दशक बीतने को है. पिछली सदी में तरक्की की जिस गाथा की शुरुआत हुई थी, इस सदी में उसे बखूबी आगे बढाया जा रहा है. साहित्य, शब्द, उपमाओं और उद्धरणों में भी बदलाव लगातार जारी हैं. दो सदी पहले तक हमारा साहित्य संपन्न वर्ग के मनोरंजन का माध्यम मात्र था. राजाओं की बिरदावलियाँ और यशोगान मुख्य उद्देश्य हुआ करते थे. गाँव की चर्चा तभी थी जब उस गाँव में बुद्ध जाते थे. शबरी और भील तभी विषय बनते थे जब उनके पास राम पहुँचते थे. उस से ज्यादा साहित्य के विषयों से गाँव का सम्बन्ध नहीं था. गाँव तभी साहित्य का विषय बन पाता था जब वह आदर्श गाँव हो.
इस परिपाटी में आमूल-चूल परिवर्तन किया प्रेमचंद ने. प्रेमचंद की कहानी के नायक होरी महतो और बुधिया थे, तो नायिका रधिया या संतो. प्रेमचंद के इस प्रयोग का भारी विरोध भी हुआ था. साहित्य में रधिया-बुधिया के प्रवेश पर लोगों ने बहुत नाक-भौं सिकोड़ी थी.
फिर धीरे-धीरे बाजारवाद के रथ पर सवार इस सदी का आगाज हुआ. बाजार ने बेचना सिखाया. हर चीज को बाजार मिला. हर भावना और हर नाम को बाजार मिला. जो अच्छा कहा जाता रहा था उसका भी बाजार और जिस पर लोगों की नाक भौं सिकुड़ती थी उसको भी बाजार. रधिया-संतो पहले उपेक्षित थी, अब बदनाम हो गयी.
मुन्नी का वर्गीय चरित्र वही है. मुन्नी उसी गाँव की रधिया-संतो का ही तो प्रतिनिधित्व करती है. बाजार ने उसकी उपेक्षा और बदनामी को भी अलंकृत कर दिया है. मुन्नी अब ख़ुशी ख़ुशी बदनाम हो रही है और उसकी बदनामी को कुछ इस तरह से प्रायोजित किया जा रहा है कि हर मुन्नी को अपना लक्ष्य वही बदनामी में ही नजर आने लगा है. अब हर मुन्नी खुद को बदनाम करने के लिए तैयार है. उसे ये एहसास दिलाया जा रहा है कि बाजार में जगह पाने के लिए तुम्हे अपनी बदनामी को सार्वजानिक करना होगा.
लेकिन इसमें एक बात पर जरूर गौर किया जाना चाहिए कि आखिर बाजार प्रायोजित इस बदनाम मुन्नी के जरिये भी मुन्नी के वर्गीय चरित्र में कोई बदलाव लाने का प्रयास नही है. मुन्नी अभी भी उन्ही पारंपरिक मूल्यों में बंधकर बदनाम हो रही है. मुन्नी ने यह बदनामी भी अपने लिए नहीं बल्कि अपने प्रेम के लिए स्वीकार की है. अभी भी मुन्नी अपने डार्लिंग के लिए झंडू-बाम हो रही है. और उसे यह बता दिया गया है कि यह समर्पण ही तुम्हारा अंतिम लक्ष्य है. तुम्हे इसके लिए झंडू-बाम भी होना पड़ेगा और बदनाम भी, तभी तुम लगातार इस बाजार में बनी रह सकती हो. बाजार में किसी शर्मीली रधिया के लिए जगह नही है. बाजार का ही असर है कि किसी भी ऑफिस में ऐसी किसी रधिया के लिए कोई जगह नही है जो मुन्नी की तरह अपनी बदनामी को मंच नही दे सकती है.
मुन्नी की प्रतिरोधी शक्ति को ख़त्म कर दिया गया है. उसे डार्लिंग के लिए समर्पित भी होना होगा और बदनाम भी.
मुन्नी के ही साथ-साथ शीला भी जवान हुई है, लेकिन शीला की जवानी में और मुन्नी की बदनामी में बहुत बड़ा अंतर है. शीला शहर का प्रतिनिधित्व कर रही है. उसकी जवानी में स्वायत्तता है. वह अपनी जवानी को स्वतंत्र होकर जी रही है. उसे किसी के लिए बदनाम होने की इच्छा नहीं है. बाजार अपने सामंतवादी और शोषक नजरिये से बाहर नही निकल पाता है. वह शीला को बदनाम नहीं कर रहा है, बल्कि उसकी जवानी को स्वायत्त कर रहा है. उसे अपनी जवानी को जीने की स्वतंत्रता दे रहा है.
लेकिन मुन्नी हो या शीला, हैं दोनों ही बाजार के कब्जे में. क्यूंकि मुन्नी अगर झंडू-बाम है तो शीला एटम-बम है. दोनों किसी मेडिकल कंपनी की एम्.आर. की तरह काम कर रही हैं. मुन्नी की बदनामी से झंडू-बाम की बिक्री बढ़ी है और कल हो सकता है कि शीला की जवानी को भी वियाग्रा जैसी कोई कम्पनी पेटेंट करा ले. क्योंकि शीला के बाद अब हर मुन्नी शीला की जवानी के राज को खोजने के लिए तत्पर हो रही है. उसे भी स्वतंत्र जवानी की इच्छा है. बाजार यही चाहता है.
बाजार का लक्ष्य संस्कारिक अवधारणाओं को तोडना ही रहा है. चाहे मुन्नी को बदनाम करना पड़े, या शीला को जवान करना पड़े, बाजार की नजर अपने लक्ष्य पर केन्द्रित है.
एक समय में मार्क्स ने कहा था कि दुनिया के मजदूरों एक हो. सर्वहारा वर्ग को एक होने के लिए आह्वान किया गया था. तब सर्वहारा का एक वर्गीय चरित्र था. वाम रुझान के नेताओं ने तमाम अरसे तक वही नारा दिया. हालाँकि सर्वहारा को एक नही कर सके. उसका कारण भी था, बाजार ने सर्वहारा वर्ग को बाँट दिया. शहरी मजदूर और ग्रामीण मजदूर एक दूसरे से अलग हो गए. नतीजा यह रहा कि सर्वहारा का अपना कोई निश्चित वर्गीय चरित्र नही रह गया.
इसी तरह नारी समानता और नारी समता के नारों के बीच भी बाजार वही कर रहा है. अब उसे शीला और मुन्नी के बीच में बांटा जा रहा है. लेकिन अब समय आ गया है कि एक नारा दिया जाए. येचुरी और प्रकाश करात को अब 'सर्वहारा एक हो' की जगह 'मुन्नियों एक हो' का नारा देना चाहिए. और हर मुन्नी को यह समझाना होगा की शीला की जवानी में भी उसी मुन्नी की बदनामी के तार छुपे हैं.
बीता साल मुन्नियों के लिए एक सवाल छोड़ गया है. नए साल में हर मुन्नी के सामने अपनी बदनामी और शीला की जवानी में से किसी एक को चुनने का विकल्प बाजार ने रख दिया है.
अब देखना है कि मुन्नियाँ बाजार का विकल्प बनकर रह जाना चाहेंगी या फिर इस नए साल में कुछ नया होगा???

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

Friday, December 31, 2010

वह क्षीर सिन्धु है 'मेरी बहन' (My Sister)

जब भी चाहा शब्द खोजना,
अर्थ कहीं खो जाता है । 
जब चाहा कि सपने देखूं..
सपना खुद सो जाता है ।।
         उस पर कलम चलाऊं कैसे
         शब्द नही हैं उस लायक ।
         वह प्रेम-पर्व का उच्च शिखर
         मैं धरती का अदना गायक ।।
प्रस्थान बिंदु है वह मेरी
मेरे गीतों की स्वर्ण-तान ।
प्रारंभ वही और अंत वही
है मूल्य मेरा, उसकी मुस्कान ।।
                  
                      ना बाँध सकूँ शब्दों में उसे
                      ना पंक्ति कोई भी पूरी हो ।
                      वो मुझमे है, मुझमे ही रहे
                      न मुझसे, मेरी दूरी हो ।।
धरती सा धीर कहूं उसको
या चंचल जैसे मलय पवन ।
हर रिश्ता घुलकर पूर्ण हुआ
वह क्षीर सिन्धु है 'मेरी बहन' ।।

यद्यपि आज ऐसा कुछ भी नही है जिस से इस कविता का सरोकार स्थापित हो सके. वैसे भी तस्वीर कुछ ऐसी बन चुकी है कि बहन को याद करने का मतलब या तो राखी का त्यौहार हो या फिर भैया-दूज का. उसके अलावा भाई-बहन के प्रेम और रिश्ते पर चर्चा नही होती. 
किसी प्रकार की चर्चा का आधार मैं स्वयं भी नही बना रहा हूँ. ये सवाल जरूर है मन में कि आखिर इस रिश्ते का सच बस इतना सा ही तो नही है ना.... 
बस आज ऐसे ही कुछ पलों को सोचते-सोचते यह कविता बन गयी. कविता पर निस्संदेह अधिकार मेरा नही है, इस कविता पर अधिकार तो इस रिश्ते का ही है, उसी 'क्षीर सिन्धु सी बहन का है'. उसी के कहने पर यह आप सभी से साझा कर रहा हूँ.
बाकी सबसे बड़ा सत्य तो यही है कि उतनी प्यारी कविता शायद ही कभी लिख सकूँ, जितना प्यारा यह रिश्ता है. 

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

Wednesday, December 22, 2010

हमारे प्रधानमंत्री 'नर्वस' नहीं होते हैं क्‍योंकि वो 'नारी-वश' हैं ... !!




मनमोहन एक निहायत ईमानदार व्यक्ति हैं. निष्ठावान प्राणी हैं. वफादार तो हैं ही. उनकी वफादारी और निष्ठा पर संदेह नही किया जा सकता है. उनकी वफादारी तो जैसे.....!!
कुछ ऐसी ही तस्वीर बनाई हुई है हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री की कांग्रेसियों ने. सच भी है. जिस वफादारी और निष्ठा से वो अपना काम कर रहे हैं, उस पर संदेह किया भी नही जाना चाहिए. हमें अपने मन से यह संदेह मिटा देना चाहिए कि वो देश के प्रधानमंत्री हैं. हमें ये संदेह भी नही रखना चाहिए कि वो किसी भी हाल में कांग्रेस प्रा. लि. कंपनी के प्रति अपनी वफादारी में कमी ला सकते हैं. वो अपनी मुखिया के प्रति पूर्ण निष्ठावान हैं. इस निष्ठा के लिए वो बाकि किसी भी निष्ठा की बलि चढ़ा सकते हैं. और लगातार चढ़ा भी रहे हैं.
हमें अपने इस शक्तिशाली प्रधानमंत्री पर गर्व करना चाहिए. इनकी शक्ति का नमूना इन्होने कई बार दिखाया है, लेकिन हम देखने को तैयार ही नही होते हैं. जिस दिन अमेरिका से परमाणु संधि करने गए थे और बुश से हाथ मिलाया था उसी दिन अमेरिका के 8 बैंक दिवालिया हो गए. मैं तो खैर मनाता हूँ कि मैडम ने गले मिलने के लिए नही कहा था, वरना अमेरिका सेल पे आ गया होता. !!
ऐसे में हमारी अर्थव्यवस्था रखी है, ये क्या कम बड़ी बात है. शक्तिशाली इतने कि पाकिस्तान के भेजे दस आतंकी मर भी नही पाए थे कि शाम को चिट्ठी लिख दी कि हमारे वाले 20 और लौटा दो.
मीडिया में भी प्रधानमंत्री के धैर्य और शालीनता की लगातार प्रशंसा होती रहती है. मीडिया लगातार कहता आ रहा है कि चाहे देश में कुछ भी हो जाए लेकिन अपने प्रधानमंत्री नही हिल सकते हैं. कभी किसी भी परेशानी में इन्हें परेशान होते नही देखा गया है. हमेशा वही खिलता-मुस्कुराता चेहरा है.
कहा जाता है कि प्रधानमंत्री कभी नर्वस नही होते हैं. अब भला ये भी कोई बात है. प्रधानमंत्री जी नर्वस हो भी कैसे सकते हैं, वो तो वैसे भी "नारी-वश" हैं. जो "नारी-वश" हो गया है वो नर्वस हो भी कैसे सकता है. लेकिन ये मीडिया वाले उन्हें लगातार परेशां करते रहते हैं.
मनमोहन जी तो इतने निष्ठावान है कि उस निष्ठा में वो ये भी भूल गए हैं कि वो देश के प्रधानमंत्री हैं. उन्हें लगता है कि वो तो बस गाँधी परिवार की जागीर को कुछ दिन तक सँभालने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं, एक कार्यकारी राजा की तरह. युवा युवराज जैसे ही गद्दी सँभालने लायक हो जायेंगे ये तुरंत उन्हें गद्दी सौंपकर भार-मुक्त हो जायेंगे.
देश को इस भ्रम से बाहर आ जाना चाहिए कि वो कोई प्रधानमंत्री हैं. ऐसी बातों से भ्रम की स्थिति बनती है. लोग बिना वजह उनसे अपनी झूठी सच्ची उम्मीदें बाँध लेते हैं. यह उनके साथ अन्याय है. देश को उनकी नाकारा-नालायक और नाजायज ईमानदारी को स्वीकार लेना चाहिए.
उनसे कभी ये प्रश्न नही किया जाना चाहिए कि उनकी इस नाकारा ईमानदारी से देश को क्या मिलने वाला है?
हमें उनकी इस नाजायज ईमानदारी की मनमोहनी तान पर मंत्र-मुग्ध होकर मान जाना चाहिए.

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

Tuesday, December 21, 2010

"खादी महज एक वस्त्र नहीं, विचार है" (Handlooms in 21st century)





जीवन की तीन बुनियादी जरूरतें हैं - रोटी, कपडा और मकान और विडंबना देखिये कि समाज को रोटी देने वाला किसान भूखा है, सभ्यता को वस्त्रों से अलंकृत करने वाला बुनकर नग्न है और मकान बनाने वाला मिस्त्री सड़क पर सोने के लिए अभिशप्त है.
इसी विचित्र विडम्बना में हम 21 वीं सदी में हथ-करघा के स्वरुप, संकट और संभावनाओं की चर्चा करने के लिए विवश हैं.
हथ-करघा का सवाल महज अतीत को पुचकारने के लिए नहीं है, बल्कि यह आज की एक जरूरी जरूरत बन चुका है. यह उन बुनियादी सवालों का हिस्सा है जिनके साथ हम सदी-दर-सदी की यात्रा करते हुए सूचना क्रान्ति के इस विस्फोटक युग तक आ पहुंचे हैं. हमने बेहतर जीवन के लिए बदलावों का स्वागत किया. परिवर्तनों को स्वीकारते रहे. बाजारवाद के रथ पर सवार जगतीकरण की उद्घोषणा के साथ आई इस सदी का हमने आगे बढ़कर स्वागत किया. उम्मीद थी कि शायद इसके बहाने हर घर में विकास का दीप जलाया जा सकेगा. लेकिन ऐसा नही हुआ, बहुत जल्द ही जगतीकरण का विद्रूप चेहरा सामने आ गया. इसका उजागर हुआ चेहरा सभी मानवीय अवधारणाओं को धता बता गया.
इसकी अमानवीयता का सबसे बड़ा शिकार वही हाथ हुए जिन्होंने सदैव इस सभ्यता को सजाने और संवारने का काम किया. हथ-करघा कभी भी महज एक आर्थिक अभिव्यक्ति नहीं रहा है. बुनकर कभी भी किसी मिल के मजदूर नहीं समझे गए. हमारे यहाँ के बुनकरों ने तो मनुष्य की नग्न सभ्यता को वस्त्र देने का काम किया. उस वक़्त कोई मशीन नहीं थी, कोई पॉवर-लूम नही था, हमारे बुनकरों के हाथ ही पॉवर थे. हमने यूनान, मिश्र, रोम से लेकर चीन और मध्य-एशिया तक को वस्त्र दिया. यहीं से सीखकर यह सभ्यता खुद को शालीन कह पाई.
सिन्धु-घाटी सभ्यता में ही यहाँ बुनकरों के प्रमाण मिलते हैं.
रही बात समाज में बुनकरों की महत्ता की, तो सौंदर्य का मानक बनी आम्रपाली तो बुनकरों की दीवानी ही हुआ करती थी. इन्ही बुनकरों ने तो कवियों के सौंदर्य-बोध को स्थापित किया. यह यदि इस सभ्यता को वस्त्रों से ना सजाते तो शायद तमाम सौंदर्य के काव्य नहीं रचे जा सकते थे.
"तब सूरदास न किसी कंचुकी की सुन्दरता का बखान करते, ना ही कृष्ण किसी का कपडा यमुना किनारे से लेकर भाग पाते ! "
इसी करघे से कबीर जैसा संत भी निकला. कबीर ने करघे को अध्यात्म का मार्ग बना दिया. कबीर ने अपने बिम्बों में करघे को जोड़ा. "झीनी-झीनी भीनी चदरिया" हो या "जस की तस धर दीनी चदरिया" कबीर ने करघे के आध्यात्म को रचा या यह भी कहा जा सकता है कि करघे ने कबीर जैसे संत को रचा.
इतिहास साक्षी है कि बिना किसी पॉवर-लूम के हमारे ढाका का मलमल विश्वप्रसिद्ध था. लेकिन जिस वक़्त में उन मलमल बनाने वाले मजदूरों के हाथ इस बर्बर मशीनी मनुष्य ने काटे थे, जब लाखों कारीगरों को अपाहिज बनाया जा रहा था, तभी इस देश की संस्कृति और सभ्यता का मूल-तत्त्व भी कट गया था.
देश और उसकी आत्मा की उस हत्या को कोई और भले ही नही देख पाया हो लेकिन गांधी ने उसे देखा. कालांतर में यही करघा स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हथियार बना. गाँधी ने चरखे और तकली से भारत को जिन्दा करने की कोशिश की. उन्होंने मैनचेस्टर के कपड़ों की होली इसी चरखे को जिन्दा करने के लिए जलाई थी. बापू ने इसे स्वदेशी की परिभाषा से जोड़ा. इसके सामाजिक और सांस्कृतिक रूप को गढ़ा. गाँधी का स्वदेशी किसी टाटा-बिरला के स्वदेशी उत्पाद को इंगित नहीं करता था. उन्होंने जब कहा था कि "मजबूरी में विदेशी, चाहत में स्वदेशी, दिल में देसी." तब वह किसी "फैब इंडिया" के बने खादी की बात नहीं कर रहे थे. उन्होंने कहा था कि जब साधना शुरू हो तब देश, कुछ और बढे तो प्रदेश, और गहन साधना हो जाए तो जिला, उसके बाद गाँव, फिर पड़ोस, फिर घर और साधना जब सम्पूर्ण हो जाए तब अपने हाथ की बनी चीजों के प्रयोग तक पहुँचो.
गाँधी का स्वदेशी-स्वराज और खादी स्वावलंबन की उस पराकाष्ठा तक जाते हैं. स्वावलंबन के उस हथियार को चलाने वाले हाथ ही काट दिए गए.
एक वक्त में ढाका में हमारे मलमल के कारीगरों के हाथ काटे गए थे और अब पूरी जिंदगी ही काटी जा रही है.
आज खादी का मतलब गाँव का गरीब बुनकर कहाँ रह गया है. अब तो खादी भी स्टेटस सिम्बल है. वो बुनकर जो दुनिया को एक से एक कपडे देता है, इतना भी नहीं कमा पाता है कि खुद अपने लिए एक कपडा बुन सके.

21 वीं सदी में स्वरुप, संकट और संभावनाएं
स्वरूप -
इस सदी में हथ-करघे ने अपना स्वरुप बहुत बदला है. कई मायनों में यह बदला हुआ स्वरुप सुखद है, लेकिन कहीं ज्यादा मायनों में यह स्वरुप अपना मानवीय चेहरा नहीं सिद्ध कर पा रहा है. हथ-करघा महज आर्थिक अभिव्यक्ति नहीं था बल्कि यह जीवन दर्शन रहा है. कबीर के ताना-भरनी और करघे से लेकर महात्मा गांधी के चरखे से होते हुए इसने पॉवर लूम तक की यात्रा की है. बात चाहे विश्वगुरु की हो या सोने की चिड़िया की, इन बुनकरों का उसमे सबसे बड़ा योगदान रहा है.
आज भी भारत के कुल निर्यात में एक बड़ा हिस्सा हस्त-शिल्प का ही है. कृषि के बाद यह सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र है. दसवीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक इसमें 67 .70 लाख रोजगार था. इसे ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक 80 लाख करने का लक्ष्य भी रखा गया है.
इसमें प्रतिवर्ष 3 प्रतिशत की वृद्धि-दर भी चल रही है.
आज खादी का मूल्य बढ़ रहा है. सूती वस्त्र महंगे हो रहे हैं. कॉटन की साडी का दाम आसमान छू रहा है लेकिन प्रश्न यही है कि आखिर इस महंगाई में उस मजदूर बुनकर की क्या हिस्सेदारी है.
बुनकरों की बदहाली इन तमाम बदलावों का अमानवीय पक्ष ही है.


संकट-
इस क्षेत्र के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या इसका संगठित ना होना भी है. एक ऐसा क्षेत्र जिसका वर्ष 2006 -2007 में निर्यात 20963 करोंड का रहा है, जिसमे दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान लगभग 70 प्रतिशत की वृद्धि दर देखी गयी. उस क्षेत्र के मजदूरों का बदहाल होना, उस क्षेत्र का संगठित स्वरूप ना होना सबसे बड़ी चुनौती है.
तमाम बुनकरों को नवीनतम तकनिकी शिक्षा का ज्ञान ना होना, बाज़ार की समझ ना होना, अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के मानकों से अनभिज्ञता इस क्षेत्र से जुड़े हुए लोगों की सबसे बड़ी समस्या है.
इतने बड़े क्षेत्र के मजदूर यदि इस से पलायन करने को मजबूर हो जाएँ तो निस्संदेह ही यह गंभीर संकट है.


संभावनाएं
21 वीं सदी में हथ-करघा क्षेत्र की संभावनाओं को इसमें हो रही वृद्धि से समझा जा सकता है. सभ्यता को वस्त्र पहनाने वाला भारत एक बार फिर पूरे विश्व को संवारने की स्थिति में आ सकता है. आवश्यकता है कि सरकार इस क्षेत्र की अहमियत को समझकर कदम उठाये.
और इस बात से भी इनकार नही किया जा सकता है कि सरकार इस पर ध्यान देने की मनः-स्थिति में आ गयी है. हथ-करघा के क्षेत्र के लिए बजट में वृद्धि का मामला हो या 'बाबा साहेब आंबेडकर हस्त-शिल्प' जैसी योजनायें चलाने का, यह सभी कदम इस क्षेत्र के प्रति सरकार की चिंता और प्रयास को दर्शा रहे हैं.
क्षेत्र को संगठित करने के लिए भी योजनायें बनाये जाने और बनी हुई योजनाओं पर अमल किये जाने की आवश्यकता है. इस से जुड़े मजदूरों के स्वास्थ्य, शिक्षा और उचित सम्मान-धन पर गहन विचार की आवश्यकता है.
हस्त-शिल्पियों ने न सिर्फ कपडे बुने हैं, बल्कि भारत बुनने का काम भी इन्होने ही किया है.
इस बात में कोई संदेह नही है कि यदि इस क्षेत्र पर ध्यान दिया जाए तो भारत एक बार फिर से सोने की चिड़िया बन सकता है. और उस चिड़िया को सजाने के लिए देश के कोने-कोने में लगे हुए बुनकर अपना हाथ आगे करते रहेंगे.
और इसी से बापू के 'स्वदेशी' और 'स्वावलंबन' की अवधारणा को भी जिया जा सकता है.
अंत में बस हमें बापू की कही हुई इस बात को ध्यान में रखना होगा "खादी महज वस्त्र नही, बल्कि एक विचार है".

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

Wednesday, December 1, 2010

मुझमे मैं भी रहती हूँ.. !! ( Where am I ?)





राधा-मीरा की बातों से कब तक मुझको बहलाओगे..?
मेरा भी अस्तित्व है कुछ.. क्या मान कभी ये पाओगे..?

क्या तुम ये स्वीकार सकोगे..मुझमे मैं भी रहती हूँ..?
तुम जब बातों में बहते हो..मुझमे मैं भी बहती हूँ..?

मैं माँ हूँ.. यह भी एक सच है, मैं बेटी भी होती हूँ..!
माना कि मैं मीरा भी हूँ, कृष्ण बिना मैं रोती हूँ !!

मैं प्रेयसी हूँ.. यह भी सच है, मैं भाग तुम्हारा आधा हूँ !
फिर भी तुमको लगता है, मैं स्वयं तुम्हारी बाधा हूँ !!

पहले भी तुमने छला मुझे, तुम अब भी तो छलते हो !
मैं जब भी आगे बढती हूँ, हाथ तभी तुम मलते हो !!

ना हूँ मैं पूजन की प्यासी.. न मात्र किताबी बातों की..!
जो सात वचन देती हूँ तुमको, इच्छित हूँ उन सातों की !!

स्वीकार करो यह सत्य महज, मैं बस इतना कहती हूँ.. !
बस तुम यह स्वीकार करो कि मुझमे मैं भी रहती हूँ.. !!

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद
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