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Tuesday, June 3, 2014

खामोशी का अर्थ नहीं हम उनको भूल गए (Can't Forget)



खामोशी का अर्थ नहीं,
हम उनको भूल गए..
उन्होंने कैसे सोच लिया,
कि बागों से फूल गए..

कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं,
जो टूट नहीं सकते...
कुछ दामन ऐसे होते हैं,
जो छूट नहीं सकते..

कुछ लम्हे ऐसे होते हैं,
जो जीवन बन जाते हैं...
कुछ पल ऐसे हैं, जिनको
ये पल लूट नहीं सकते..

कुछ नजरें ऐसी होती हैं,
जो नजरों में उतर जाती हैं..
कभी-कभी कुछ बातें
दिल में, घर कर जाती हैं..

कभी किसी का आना भी,
तनहा कर जाता है..
कभी किसी की यादें दिल
में खुशियाँ भर जाती हैं...

ब्याज तो हर इक रिश्ते
का हम चुकता कर आये...
लेकिन शायद लगता है
हम बिन मूल गए..

खामोशी का अर्थ नहीं,
हम उनको भूल गए..

- अमित तिवारी
दैनिक जागरण

Monday, May 12, 2014

तुम ही तो हो (Priytama)



कभी तुमसे कहा तो नहीं,
कि तुम ही मेरा जीवन हो।
मेरी खुशियों की तुलसी का,
एक तुम ही तो आँगन हो।।
तुम्हें पाना है जग पाना,
तुम्हारा प्यार धड़कन है।
इसी में बंध के जीना है,
ये वो प्यारा सा बन्धन है।।
नहीं दुख सुख की बातें हैं,
कि जो है प्यार ही तो है।
तुम्हारी बांह में सिमटा,
मेरा संसार ही तो है।।
तुम्हारा हूँ तो खुद का हूँ,
तुम्ही से आस पलती है।
लो मैने कह दिया तुमसे,
तुम्ही से सांस चलती है।।

- अमित तिवारी
सीनियर सब एडिटर
दैनिक जागरण

Sunday, May 11, 2014

क्योंकि वो निर्भया नहीं हैं (They are not nirbhaya)



आबरू की कीमत भी हर जगह बराबर नहीं होती. उसमें भी नफा-नुकसान का अलग-अलग गणित लगाया जाता है. यही वजह है कि मोमबत्तियां लेकर कोई जुलूस आगे नहीं बढ़ रहा है. जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे भी नहीं लगाये जा रहे हैं. मीडिया के पास भी ये सब दिखाने का वक़्त नहीं है. सोफेस्टिकेटेड यूथ के पास इनके समर्थन के लिये मोमबत्तियां जलाने का वक़्त नहीं है. क्योंकि ये सब निर्भया नहीं हैं.
ये उन दलित लड़कियों की दास्तान है, जिनके साथ कुछ गलत होना हमें झकझोरता नहीं है. म्हारा देस हरियाणा के नारे लगाने और खुद को बेहद हिम्मती बताने वाले लोगों की इस कायराना हरकत पर बोलने की हिम्मत किसी में नहीं हो रही है. हिसार में दलित परिवार की लड़कियों का बलात्कार कोई घटना नहीं है. उनकी आवाज को दबाने की कोशिश और उनके परिवार वालों की प्रताड़ना कोई खबर नहीं है. पीड़ित लड़कियां दिल्ली में अपने लिये न्याय मांग रही हैं. और मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं है कि उन्हे कभी कोई न्याय मिलेगा. न्याय उनके लिये  और वो न्याय के लिये बनी ही नहीं हैं. क्योंकि ये सब निर्भया नही हैं.

 - अमित तिवारी
सीनियर सब एडिटर
दैनिक जागरण

Tuesday, July 2, 2013

उसका होना, मेरा होना (uska hona)




उसको पाना, उसको खोना,
उस संग हँसना, उस बिन रोना,
उसकी बातें, झिलमिल रातें,
उसकी वो प्यारी सौगातें,
उसका गुस्सा, उसका प्यार,
उसकी जीत उससे हार
क्या-क्या गुजरे, कैसे बीते
जीवन घट ये घुट-घुट रीते,
जीवन सारा उसका हिस्सा,
हर पन्ने पर उसका किस्सा,
कैसे किस्से छोड़ चलूँ,
कैसे मैं मुंह मोड़ चलूँ,
कैसे मैं बदलूं ये सच,
कैसे रिश्ता तोड़ चलूँ
उसका होना, मेरा होना,
उसमे जगना, उसमे सोना,
उसको भी महसूस तो होगा,
अपने दिल में मेरा होना...

अमित तिवारी
बिज़नेस भास्कर
(चित्र गूगल से साभार)

Thursday, January 31, 2013

फिर मन गया गणतंत्र दिवस (Republic Day Again)




गणतंत्र दिवस फिर मन गया। फिर से राष्ट्रपति ने झंडा फहराया, और फिर शाम ढले किसी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने उसे उतार लिया, और फिर हर रोज़ यही क्रम....वही उसे फहराता रहेगा, उतारता रहेगा... तिरंगे के सम्मान की बातें करने का दिन बीत गया। 'जन गण मन', 'भारत माता की जय', 'झंडा ऊँचा रहे हमारा' सब कुछ गाया गया। 'ऐ मेरे वतन के लोगों', 'कर चले हम फ़िदा' की धुनें भी फिजा में छाई रहीं। पूरा वातावरण देशभक्तिमय हो गया। देशभक्तिमय इसलिए कहना पड़ रहा है कि आजकल 'भारत माता की जय' मतलब देशभक्त होना। थोड़ी देर तिरंगा लेकर दो-चार गाने चला लो, पांच-सात नारे लगाओ और देशभक्ति साबित।
ये सब देखने नहीं गया इस बार... कुछ नया लगता ही  नहीं. एक बात तो आज तक समझ नहीं आई कि आखिर गणतंत्र दिवस की परेड पर बड़ी-बड़ी तोपें किसको दिखाने के लिए चलाई जाती हैं? इन तोपों को देखकर चीन तो डरता नहीं है आपसे। उसने तो आपकी जमीन पर कब्ज़ा किया, पहले भी और आज भी कर रहा है। तब प्रधानमंत्री थे कांग्रेस पार्टी के पं. नेहरू। उन्होंने बेशर्मी भरा बयान दिया था, "उस जमीन पर होता ही क्या है? बंजर है? बर्फ ही बर्फ है। कुछ उपजता थोड़े ही है।" लोहिया ने विरोध किया था बयान का। उन्होंने संसद में कहा, 'वहां का कंकर-कंकर हमारे लिए शंकर है, वो कोई बंजर जमीन नहीं।' बेशर्म सल्तनत को तब भी उनकी आवाज़ नहीं ही सुननी थी। आज भी नहीं ही सुना जाता है ऐसी बातों को। आज फिर मीडिया चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि चीन सीमा का अतिक्रमण कर रहा है, और सरकार बात को टालने में लगी है।
 माफ़ कीजिये मैं थोड़ा भटक गया विषय से। मैं कह रहा था कि आखिर किसके लिए दिखाए जाते हैं ये हथियार। ये हथियार किसी चीन और अमेरिका डराने के लिए नहीं होते, ये हथियार तो इसी देश के लोगों को डराने के लिए होते हैं। सत्ता अपनी ताकत दिखाती है इन हथियारों के प्रदर्शन के जरिये। प्रशासन दिखा देना चाहता है उन लोगों को जो गाहे-बगाहे इसके खिलाफ बोलने की हिम्मत कर बैठते हैं। प्रशासन सन्देश देता है इसके जरिये कि 'देख लो कितनी ताकत है सत्ता के पास, इससे टकराओगे तो टूट जाओगे।' आम जन अपने टेलीविजनों पर बैठा सत्ता के इस खेल को देखता है। अनजाने में ही उसके अन्दर सत्ता का सन्देश घुल जाता है। वो भी बोल पड़ता है 'भारत माता की जय'.
हर साल यही होता है, हर साल वही खेल, राष्ट्रपति का वही रटारटाया भाषण, वही सत्तापक्ष के घोषणापत्र जैसा। जिसकी सत्ता, उसका गान। इस साल नहीं गया ये सब देखने। मन ऊब गया है इन नाटकों को देखते-देखते। असली गण को देखने का मन किया इस बार। देखने की इच्छा हुई कि आखिर कितने देशभक्त हैं आमजन। कम-स-कम इस प्रशासनिक देशभक्ति से तुलना करने का मन हुआ उनकी देशभक्ति का।
बटोही घर बैठा था। पूछा कि क्या बात है? उसका कहना था कि 'छुट्टी है'. एक शब्द का उत्तर। लेकिन इस एक शब्द के भीतर कितनी बड़ी बातें छिप गई। उसने कभी 'भारत माता की जय' नहीं बोला। उसे नहीं पता कि इससे क्या होता है? उसने तिरंगा नहीं लगाया अपने घर के ऊपर, खामखा दो रुपये खर्च करने में रखा भी क्या था उसके लिए। वो इस छुट्टी से खुश नहीं था, कारण कि उसकी दिहाड़ी मारी जा रही थी। रोज कुआं खोदकर पानी पीने वाली ज़िन्दगी है उसकी और उसके परिवार की। एक दिन की दिहाड़ी का मारा जाना उसके और उसके परिवार के लिए उपवास का कारण बन जाता है। आज गणतंत्र दिवस हो ना हो, उसके लिए उपवास दिवस था। एक त्यौहार जिसके देवता का उसे पता नहीं, लेकिन व्रत करना पड़ा।
बटोही इकलौता नहीं है। पूरी जमात है। रेलवे पटरी के किनारे-किनारे उनकी बस्ती बसती है। उन्हें नहीं मतलब कि प्रधानमंत्री ने क्या कहा? राष्ट्रपति ने क्या गुणगान किया? कौन-कौन सी सफलताएं गिनाई? और शायद प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति को भी इनसे कोई मतलब नहीं। उन्हें तो सिर्फ उससे मतलब है जो उनके कहने पर 'भारतमाता की जय' बोलता है। बटोही उस जमात का हिस्सा है जिसके लिए आज़ादी कभी आई ही नहीं, जिसके लिए संविधान समर्पित किया ही नहीं गया। उसके लिए आज़ादी तो आज भी लालकिले के अन्दर रहने वाली कोई सुंदरी ही है, जो सिर्फ उसे ही दिख सकती है जो लालकिले तक जाने की औकात रखता है। उसकी औकात नहीं है, किले की उस सुंदरी 'आज़ादी' को देखने की। वो मजबूरन भारत का नागरिक है। कारण कि उसे ग्रामीण नहीं बने रहने दिया गया।
उसका गाँव छीन लिया गया। सत्तर प्रतिशत खेती वाले देश के सकल घरेलु उत्पाद में खेती का योगदान बीस प्रतिशत  भी कम रह गया है। सरकार इसे घटाकर 10 से भी कम कर देना चाहती है। जाहिर है, सरकार को गाँव और गंवार की जरूरत नहीं है, उसे नगर और नागरिक प्रिय हैं। उसका संविधान 'भारत के नागरिकों' को समर्पित है, (पढ़िए भारतीय संविधान की प्रस्तावना हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक,आर्थिक तथा राजनैतिक ... ). बटोही और उस जैसे तमाम लोग उसी गाँव के गंवार हैं जो अपना गाँव छिन जाने के कारण जबरदस्ती इस नगर और नागरिक सभ्यता में जीने की कोशिश में लगे हैं। तथाकथित सभ्य नागरिकों  को ये गंवार नागरिक अच्छे नहीं लगते। सरकार को भी ये फालतू लगते हैं, क्योंकि ये 'गरीबरथ में चलने वाले गरीब नहीं हैं, क्योंकि ये 'भारतमाता की जय' नहीं बोलते, क्योंकि ये परेड में आकर सत्ता की ताकत नहीं देखते, क्योंकि ये घर पर तिरंगा नहीं लहराते, क्योंकि ये अपने घर पर तथाकथित देशभक्ति के गाने नहीं बजाते, क्योंकि इनके घर टी.वी. भी नहीं है, इसलिए ये टी.वी. पर भी नहीं देखते सत्ता की ताकत को। क्योंकि इनसे नफरत की इतनी सारी वजहें हैं, लिहाजा कहा जा सकता है कि ये असभ्य हैं। इनके अन्दर देशभक्ति नहीं है।
जिसे दो जून की रोटी के लिए हर रोज संघर्ष ही करना है, उसे इस 'भारतमाता' से मतलब भी क्या होना चाहिए? वो तो अपने हिस्से की देशभक्ति सेना में अपने बच्चे को भेजकर निभा लेता है। कितने तथाकथित सभ्य नागरिकों के बच्चे सीमा पर लड़ने जाते हैं, सिपाही बनकर? आंकड़े तस्वीर को साफ़ कर देते हैं। 'भारतमाता की जय' मतलब 'भारत सरकार की जय' नहीं होता।
गणतंत्र मन गया है, अब फिर स्वतंत्रता दिवस की तैयारी शुरू हो जाएगी। ये सब चलता रहेगा। लेकिन बटोही के परिवार का क्या होगा? सरकार के पास कोई इंतजाम नहीं है। निजाम को इनके इंतजाम की कोई चिंता नहीं है। अपने पूरे भाषण में कहीं भी इनका जिक्र करते नहीं दिखता है कोई। इनके जिक्र की फ़िक्र नहीं है किसी को। सोच रहा हूँ, जब इस राजधानी के पास की पटरियों के किनारे की ज़िन्दगी इतनी स्याह है, इतना दर्द है इस पटरी किनारे की ज़िन्दगी में, तब फिर बुंदेलखंड और छत्तीसगढ़ की उन इलाकों की ज़िन्दगी क्या होगी, जहाँ के भूख के आंकड़े डरावना एहसास देते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में ग्रामीण इलाकों के पचपन प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। जबकि शहरों में ये आंकड़ा पैंतालिस प्रतिशत है। बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश के इलाकों में स्थिति और भी भयावह है। भारत में उनतीस प्रतिशत जनता गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करती है, जिसका सत्तर प्रतिशत गाँवों में निवास करता है।
तस्वीर और भी स्याह है इस चौंसठ साल के गणतंत्र की। जो गण विरोध करता है उसे सरकार नक्सली कहकर मार डालती है। उस गण को इनकी 'भारत माता की जय' से क्या मतलब? व्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले गण के लिए सरकार 'सलवा जुडूम' और 'ऑपरेशन ग्रीन हंट' चलाती है। प्रधानमंत्री सरेआम उस गण को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बता देते हैं। कोई इस बात की तफ्तीश नहीं करता कि एक आम और सीधा-सादा गण नक्सली क्यों बन जाता है? क्यों मजबूर किया जाता है उसे ऐसा कदम उठाने के लिए? कौन जिम्मेदार है उसके इस कदम के लिए? सरकार के पास क्या गारंटी है कि कल को बटोही या उसकी जमात का कोई लड़का नक्सली नहीं बन जायेगा? आखिर आमजन को आम की तरह चूसकर कब तक सरकार फेंकती रहेगी? चुनाव के दौरान इलाके में आना और फिर पांच साल के लिए गायब हो जाना। गणतंत्र दिवस पर भले ही सरकार को पटरी किनारे की इस ज़िन्दगी की याद ना आई हो लेकिन चुनाव के दिनों में यहाँ भी इन नेताओं की कतारें देखने को मिल जाती हैं.
तंत्र गण को इसी तरह इस्तेमाल करता रहेगा। विरोध करने वाले गण को नक्सली कहकर मारा जाता रहेगा। हर साल लालकिला पर झंडा फहरता रहेगा। हर साल विकास के नए आयामों की चर्चा होती रहेगी इन भाषणों में। हर साल 'बटोही' और उसके परिवार को इस देवी 'आज़ादी' के लिए व्रत करना पड़ेगा। हर साल उसकी दिहाड़ी मारी जाएगी।
हम भी हर साल इसी शान से नारा लगाते रहेंगे "भारतमाता की जय"



-अमित तिवारी
नेशनल दुनिया 

Tuesday, January 22, 2013

महबूब की तुलना चाँद से ही क्यों? चपाती से क्यों नहीं???(Why Moon)




जबसे होश संभाला, गानों को समझना शुरू किया, तभी से ये गाना भी सुनता आ रहा हूँ, 'चाँद सा रोशन चेहरा, जुल्फों........'. कभी-कभी ये भी सुनाई दे जाता,'चाँद सी हो महबूबा मेरी..'.

तब कुछ ख़ास समझ नहीं थी, 'महबूब और चाँद' के संबंधों के बारे में. हाँ कभी-कभी सोचता जरूर था, कि ये 'चंदा मामा' महबूब कैसे हो जाते हैं. उस वक़्त कन्हैया की ये हठ भी पढता था,'मैया मोहे चन्द्र खिलौना लैहो..'.
ये दोनों विरोधाभाषी बातें मन में कभी-कभी ही उठा करती थीं. जब तक छोटे थे 'चन्द्र-खिलौना' चला, फिर धीरे धीरे 'चाँद सी महबूबा' हो गयी....

समय के साथ-साथ ये प्रश्न मन में आने लगा, कि आखिर ये महबूबा चाँद जैसी ही क्यों है?
चाँद में वो कौन सी खासियत है, जिसकी वजह से उसे सुन्दरता के साथ जोड़ा जाने लगा..

चाँद गोल है, लेकिन गोल तो चपाती भी है. फिर चपाती जैसा चेहरा क्यों नहीं है??

फिर सोचा कि शायद चाँद रौशनी करता है, इसलिए ऐसा कहते होंगे, शायद इसीलिए उसे सुन्दरता का प्रतीक बना दिया गया. लेकिन रौशनी तो सूरज उससे बहुत ज्यादा करता है, तब फिर उसे क्यों नहीं माना गया?
और मान लो सूरज जलता है, लेकिन घर में जो CFL ट्यूब लाईट है, वो तो एकदम चाँद के जैसी रौशनी देता है, तब फिर लेटेस्ट वर्जन में सुन्दरता को CFL क्यों ना कहा जाए.??

फिर सोचा कि चाँद की शीतलता की बहुत चर्चा रहती है, क्या पता इसीलिए उसे सुन्दरता से तुलना करते हों! वैसे भी आजकल सुन्दरता भी आँखों को शीतल करने के काम आने लगी है...!! लेकिन 'बर्फ' तो उससे भी कहीं ज्यादा शीतल है, तब फिर बर्फ की तुलना क्यों ना की जाए सुन्दरता से??? फिर बर्फ तो सफ़ेद भी होता है, एकदम उजला-धप्प..

कोई भी तर्क संतुष्टि नहीं दे पाया. सब के सब यही साबित करते रहे, कि चाँद में ऐसा कुछ खास नहीं है. वो तो बस पुराने कवियों ने कहा, तब से सब लकीर के फ़कीर बने उसी लीक पर चलते जा रहे हैं.

लेकिन ऐसा नहीं है. चाँद में ऐसी ही एक बात है, जो उसके चरित्र को सुन्दरता के चरित्र के पास ले आती है.
चाँद जब पूर्ण हो जाता है, तब उसमे ह्रास होने लगता है. चाँद की सम्पूर्णता ही उसके क्षरण का प्रारंभ बिंदु है. जिस दिन चाँद पूरा हो जाता है, बस अगले ही दिन से वह घटने लगता है.

यही चरित्र सुन्दरता का भी है. जब सुन्दरता पूर्ण हो जाती है, तभी उसमे ह्रास शुरू हो जाता है. सुन्दरता भी चाँद की कलाओं की तरह बढती है, और फिर पूर्ण होते ही उसका भी क्षरण शुरू हो जाता है. पूर्ण सौंदर्य स्थिर नहीं होता...और पूर्ण चन्द्र भी स्थिर नहीं रहता.. जैसे चाँद का आकर्षण उसकी अपूर्णता में है, क्योंकि तारीफ भी 'चौदहवी के चाँद' की या फिर 'चौथ के चंदा' की होती है, कोई पूर्णिमा के चाँद सी महबूबा नहीं खोजता... उसी तरह सौंदर्य का आकर्षण भी उसकी अपूर्णता में ही है.

यही चरित्र फूल का भी है, उसका सारा आकर्षण उसके खिलने की प्रक्रिया में है. जिस दिन वह पूरा खिल जाता है, मुरझाना शुरू हो जाता है. इसीलिए 'फूलों सा चेहरा तेरा..' है. वरना खुशबू तो 'ब्रीज' साबुन में 17 सेंटों की है.

Friday, January 18, 2013

सत्‍य को स्‍वीकार शायद, कर सकूं तो मर सकूं...(Acceptance)




आज फिर से आजकल की, बातें याद आने लगी।
आज फिर बातें वही, रह-रह के तड़पाने लगीं।।

सोचता हूँ आज फिर से मैं कहूँ बातें वही।
दर्द हो बातों में, बातें कुछ अधूरी ही सही।।

फिर करूँ स्‍वीकार मैं, मुझमें है जो भी छल भरा।
है अधूरा सत्‍य, इतना है यहॉं काजल भरा।।

है मुझे स्‍वीकार, मेरा प्रेम भी छल ही तो था।
शब्‍द सारे थे उधारी, हर शब्‍द दल-दल ही तो था।।

जो भी बातें थी बड़ी, सब शब्‍द का ही खेल था।
फूल में खुशबू नहीं, बस खुशबुओं का मेल था।।

हाथ्‍ा जब भी थामता था, दिल में कुछ बासी रहा।
मुस्‍कुराता था मगर, हंसना मेरा बासी रहा।।

साथ भी चुभता था, लेकिन फिर भी छल करता रहा।
जिन्‍दगी में साथ के झूठे, पल सदा भरता रहा।।

मैं सभी से ये ही कहता, 'प्रेम मेरा सत्‍य है',
और सब स्‍वीकार मेरे सत्‍य को करते रहे।
मैंने जब चाहा, किया उपहास खुद ही प्रेम का,
कत्‍ल मैं करता रहा और, सत्‍य सब मरते रहे।।

सोचता हूँ क्‍या स्‍वीकारूँ, सत्‍य कितना छोड़ दूँ?
मन में जितनी भीतियॉं हैं, भीतियों को तोड़ दूँ।।

वह प्रेम मेरे भाग का था, भोगता जिसको रहा।
सब को ही स्‍वीकार थे, मैं शब्‍द जो कहता रहा।।

आज है स्‍वीकार मुझको, मैं अधूरा सत्‍य हूँ।
तट पे जो भी है वो छल है, अन्‍तरा में सत्‍य हूँ।।

सत्‍य को स्‍वीकार शायद, कर सकूं तो मर सकूं।
'संघर्ष' शायद सत्‍य से ही, सत्‍य अपने भर सकूं।।

- अमित तिवारी
नेशनल दुनिया  

Wednesday, January 16, 2013

पल वो सारे बीत गए (Remembrance)

पल पल करते पल वो सारे बीत गए,
चुल्लू भर थे सपने सारे रीत गए।
गीत-ग़ज़ल की बातें खोई-खोई सी,
जब से गुजरे लम्हों के सब मीत गए।।

आहें भर-भर याद करूँ या रोऊ मैं,
कैसे उन सपनो में फिर से खोऊँ मैं।
अब तो उन छंदों के लय, सुर, गीत गए,
जब से गुजरे लम्हों के सब मीत गए।।

आनेजाने उनको खोने-पाने में,
जाने क्या अपराध किया अनजाने में।
कैसे भावों के सारे सुर-संगीत गए,
जब से गुजरे लम्हों के सब मीत गए।।

-अमित तिवारी
नेशनल दुनिया

Saturday, December 29, 2012

जब शहर हमारा सोता है...(Deadly Silence)

दस मेट्रो स्टेशन पर आवाजाही बंद कर दी गयी। कर्फ्यू जैसे हालत बना दिए गए। दिल्ली के लोग दिल्ली में ही बंधक बना दिए गए। जैसे ही खबर आई की दामिनी नहीं रही...
सरकार एकसूत्रीय एजेंडे पर चल रही है 'हम बलात्कार नहीं रोक सकते हैं, लेकिन बलात्कार के विरोध में होने वाले प्रदर्शन तो रोक ही सकते हैं।'
आज दामिनी कोई व्यक्तिवाचक संज्ञा नहीं रह गयी है, वो एक समूहवाचक संज्ञा बन गयी है। लेकिन पता नहीं किस समूह का प्रतीक बनेगी।
जिस दिन यह पैशाचिक कृत्य सामने आया था उस दिन के बाद और भी कई दामिनियाँ नोची जा चुकी हैं। उस से पहले भी अनगिनत दामिनियों के दामन पर घाव लगते रहे हैं...
वाद-विवाद का दौर चल रहा है। हर कोई गुस्से को परिभाषित करने में लगा है। अपराधियों के लिए कड़ी सजा की मांग हो रही है। सरकार, जिसका वैचारिक स्खलन हो चुका है, हमेशा की तरह शिथिल है। शिथिलता भंग होती है तो लोगों पर लाठियां चलती हैं। रास्ते रोक दिए जाते हैं। विरोध का दमन कर दिया जाता है।
लोगों में गुस्से का उबाल है। सबमे है या कुछ में है इसे निर्धारित नहीं किया जा सकता। भावनाओं से उपजे ज्ञान और ज्ञान से उपजी हुई भावना में फर्क होता है। स्वपीडा और परपीड़ा का भेद अभी नहीं मिटा है। शायद इसीलिए विरोध के भी कई प्रकार हैं।
दामिनी की पीड़ा को महसूस कर पाना किसी के लिए संभव नहीं है। ऐसी कामना भी नही है कि फिर कहीं किसी कोने में कोई दामिनी ऐसी पीड़ा को सहने के लिए अभिशप्त हो। आवेश में बहुत से लोग कह रहे हैं कि अपराधियों के घर में ऐसा कुछ होता तो उन्हें अक्ल आ जाती। इसका समर्थन नही किया जा सकता है। स्त्री चाहे जिस घर में हो वह स्त्री है, और उसका सम्मान उतना ही है। अपराधी के अपराध की सजा उसके घर की स्त्रियों को भी नही मिलनी चाहिए। सजा अपराधी को मिलनी चाहिए।
दामिनी की मौत (हत्या) ने सरकार के लिए रास्ता बना दिया है। अपराधियों को फांसी जैसी कठोर सजा दी जानी चाहिए। जितनी जल्दी ऐसा फैसला होगा बेहतर होगा। वैसे भी कहा जाता है की 'भय बिनु होय न प्रीती'. फांसी की सजा को ख़त्म करने की मांग करने वाले लोगों को समझना होगा  कि आज का समाज उस आदर्श स्तर के आसपास भी नही है जहाँ कि फांसी की सजा निरर्थक हो जाती है। शरीर का भी कोई अंग अगर ख़राब हो जाये तो उसे काटकर फेंक देना ही पूरे शरीर के लिए बेहतर होता है। उस स्थिति में अगर उस अंग के अधिकार की चिंता की गयी तो पूरा शरीर सड़ जायेगा। ये और इन जैसे तमाम अपराधी भी समाज रुपी शरीर के ऐसे ही सड़े हुए अंग हैं जिन्हें जितनी जल्दी काट दिया जायेगा, शरीर के बाकी अंगों को बचा पाना उतना ही आसान होगा।
लेकिन यह भी सोचना उतना ही जरुरी है कि क्या इतने मात्र से ही सब ठीक हो सकता है। बिलकुल नहीं। इस बात का प्रयास भी जरुरी है कि जिन अंगों को अभी बीमारी ने पूरी तरह अपने आगोश में नही लिया है, उनका समय रहते इलाज किया जाए। और ऐसे संक्रमित अंगों का एक प्रत्यक्ष उदाहरण तमाम सरकारी, गैर सरकारी स्कूलों से निकलने वाले बच्चों की बेहया होती जा रही भीड़ है। छुट्टी के बाद किसी स्कूल के सामने से बिना टिका-टिपण्णी के किसी लड़की का निकलना जितना दुष्कर है, उसकी कल्पना भी नही की जा सकती है।
छुट्टी के बाद सरकारी बसों में सवार बच्चों की बेहूदगी और बेशर्मी पर लगाम लगाने का प्रयास भी इतना ही जरुरी है। यही संक्रमित अंग कल समाज के सड़े हुए अंग बन जायेंगे और तब इन्हें भी काटने की जरुरत पड़ेगी। सारा शरीर कट जाए इस से बेहतर है कि समय रहते इलाज हो।
सोचना ये भी है की 'दामिनी' किसका प्रतीक बनती है? बलात्कृत होकर मर जाने वाली तमाम पाकिजाओं का, या फिर किसी नयी चेतना का, जो इसके बाद हर पाकीजा के दामन को सुरक्षित होने का विश्वास दे सके।

-अमित तिवारी
नेशनल दुनिया
 

Sunday, December 9, 2012

मेरे सब सपने उसमे ही रहते हैं...(Mere sapne)

माना कि शब्दों का दामन छूटा है,
माना अल्फाजों का धागा टूटा है.
माना कुछ पल बीत गए बिन छंदों के,
माना नाम नहीं लिखे खग वृन्दों के.
लेकिन यह न सोचो सच कुछ बदला है,
रिश्तों का वो आसमान अब धुंधला है.
कुछ कोहरे मौसम के छाये हैं तो क्या!
कुछ पल गीत नहीं गा पाए हैं तो क्या!
यादों की बरसात कहाँ कब थमती है?
वो प्यारी सी बात कहाँ कब थमती है?
उसका आना-जाना, हंसना-खिलना हो,
उससे मिलना जैसे खुद से मिलना हो.
उसके लब भी मेरी बातें कहते हैं,
उसके गम मेरी आँखों से बहते हैं.
मेरे सब सपने उसमे ही रहते हैं..
मेरे सब सपने उसमे ही रहते हैं....

-अमित तिवारी (Amit Tiwari)
नेशनल दुनिया  
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